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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

• दस वर्ष का कारावास- योगेश चन्द्र चटर्जी, मुकुन्दी लाल, गोविन्द
चरमकर, राम कुमार सिन्हा, रामकृष्ण खत्री
• सात वर्ष का कारवास- विष्णु शरण दुब्लिस, सुरेश भट्टाचार्य
• चार वर्ष का कारवास - प्रणवेश चटर्जी
• पांच वर्ष का कारवास- भूपेन्द्र नाथ सन्याल, प्रेमकृष्ण खन्ना, राम
दुलारे द्विवेदी¹
काकोरी काण्ड के अभियुक्तों की सुनवाई रिंग थियेटर में होती थी।
सरकारी पक्ष के वकील जगत नारायण शुक्ला थे। जिन पर कटाक्ष करते
हुए अशफाक ने एक शेर कहा कि- 'चलो-चलो यारो रिंग थियेटर दिखाएं
तुमको, जो चन्द टुकड़ों पर सीमोजर के, नया तमाशा दिखा रहे हैं।²
निर्णय के विरुद्ध पूरे देश में प्रतिक्रिया हुई। ठा० मनजीत सिंह
(एम०एल०सी०) ने इस मामले को कौंसिल के आगामी अधिवेशन में उठाने
का प्रयत्न किया। वे फांसी की सजा को कम से कम काले पानी में
बदलवाना चाहते थे। इस हेतु उन्होंने गर्वनर को प्रार्थना पत्र भी दिया
और अन्य सदस्यों से सम्पर्क भी किया। लाभ सिर्फ यह हुआ कि सजा
की तिथि 16 सितम्बर से अक्टूबर कर दी गयी। पं० गोविन्द बल्लभ पंत ने
भी इसकी आलोचना की। मदन मोहन मालवीय तथा असेम्बली के अन्य
सदस्यों ने वायसराय से मुलाकात की और मृत्युदण्ड को बदलने की
प्रार्थना की। लेकिन कोई परिणाम न निकला। अशफाक को फैजाबाद
जेल भेज दिया गया। इस निर्णय के विरुद्ध चीफ कोर्ट में अपील की
गयी, लेकिन यहां भी निराशा ही हाथ लगी।³

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-115
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-114
  3. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-116-117
    140

काकोरी काण्ड के क्रांतिकारी शिक्षित और सभ्य परिवारों के युवक
थे, लेकिन उनके साथ जेल में उचित व्यवहार नहीं किया जाता था।
संयुक्त प्रांत की कौंसिल के कुछ सदस्यों ने इस मामले को उठाया किन्तु
सरकार द्वारा कोई संतोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। गोविन्द बल्लभ पंत
ने तारांकित प्रश्न नं0 75 दिनांक 29 अक्टूबर, 1927 के माध्यम से जानना
चाहा कि - काकोरी षड़यंत्र केस में दोष सिद्ध व्यक्तियों की सामाजिक
और शैक्षिक स्थिति क्या है? उनमें से कौन लोग भूख हड़ताल पर गये
और कितने दिन रहे हैं? वे कितने कारागारों में हैं।¹
संयुक्त प्रान्त की ओर से इसकी जानकारी प्रस्तुत की गयी थी।
तमाम विरोधों, असंतोषों के बावजूद अन्ततः अशफाक को 19 दिसम्बर,
1927 को फांसी पर (फैजाबाद जेल) लटका दिया गया।² 18 दिसम्बर को
अशफाक को पुराने कपड़े मिले, जिसे अशफाक ने धोया और सुखाया।
19 दिसम्बर की सुबह (प्रातः चार बजे) उठे गये, नहाया और नमाज अदा
की। सज-धजकर तैयार हो गये। इसके बाद वे एक नज़्म गाने लगे : -
बुजदिलों को सदा मौत से डरते देखा,
गो कि सौ बार उन्हें रोज ही मरते देखा।
मौत से वीर को हमने नहीं डरते देखा,
तख्त ए मौत पे भी खेल ही करते देखा।
तंग आकर हम भी अपने जुल्म से बेदाद से,
चल दिये सूये अमन जिन्दाने फैजाबाद से।

  1. शब्द (गोविन्द बल्लभ पंत के भाषणों का संकलन) 1924-1929, पृष्ठ 27
  2. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त
    141

19 दिसम्बर को खुशी के साथ कुरान-शरीफ का बस्ता कंधे से टांगे
हाजियों की भांति 'लवेक' कहते और कलाम पढ़ते फांसी के तख्ते के
पास गये। तख्ते को उन्होंने बोसा दिया और फिर उपस्थित जनता से
कहा - ''मेरे हाथ इन्सानी खून से कभी नहीं रंगे, मेरे ऊपर जो इल्जाम
लगाया गया, वह गलत है, खुदा के यहां मेरा इंसाफ होगा।'' इसके बाद
उनके गले में फंदा पड़ा और खुदा का नाम लेते हुए वह इस दुनिया से
कूच कर गये। अशफाक के रिश्तेदार उनकी लाश को शाहजहांपुर ले जाना
चाहते थे। इसके लिए काफी प्रयास हुआ, तब जाकर इजाजत मिली।
शाहजहांपुर ले जाते समय जब उनकी लाश लखनऊ स्टेशन पर उतारी
गई, तब कुछ लोगों को देखने का मौका मिला। चेहरे पर 10 घण्टे बाद
भी बड़ी शांति थी और मधुरता थी। चेहरा ऐसा कि मानो अभी-अभी नींद
आई है, यह नींद अनन्त थी।¹
काकोरी काण्ड में मृत्युदण्ड प्राप्त अन्य क्रांतिकारियों में राजेन्द्र नाथ
लाहिड़ी को 17 दिसम्बर को गोण्डा जेल और पं० राम प्रसाद बिस्मिल को
गोरखपुर जेल में, ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद जेल में 19 दिसम्बर,
1927 को फांसी दे दी गयी ................और इस प्रकार भारत मां के सपूत
सदैव के लिए चिरनिद्रा में सो गये।

  1. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -215
    142

अध्याय-आठ

अध्याय-आठ
काकोरी काण्ड का प्रभाव
काकोरी षड़यंत्र, असहयोग आन्दोलन के बाद सब षड़यन्त्रों का
जनक है क्योंकि इसी षड़यंत्र के लोगों ने बिहार, पंजाब, मध्य प्रान्त,
बम्बई तक में अपनी शाखाएं स्थापित की थी।¹
काकोरी काण्ड में सरकारी खजाना रेल डकैती द्वारा लूटा गया था।
सरकार इस घटना से कुपित थी। घटना में शामिल क्रांतिकारी पकड़े गये
और फांसी, काला पानी, कठोर दण्ड की सजाएं हुई थी। चन्द्रशेखर
आजाद फरार ही थे। उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के लिए काकोरी काण्ड
एक बड़ा आघात था, पर ऐसा नहीं था कि, जो क्रांतिकारी आन्दोलन के
लिए मौत साबित हों। इस घटना का प्रभाव इतना हुआ कि क्रांति हेतु
अन्य युवा भी तैयार हो गये। युवाओं में समाजवादी विचारधारा जो ऊर्जा
का काम कर रही थी, पूरी तरह प्रभावित थी। काकोरी काण्ड के
क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी के बाद दल छिन्न-भिन्न हो गया, इसे
संभालने का कार्य चन्द्रशेखर ने उठाया। साधन उपयुक्त न होने से कुछ
खास नहीं कर पाये। हां इतना अवश्य था कि 1926 में पंजाब में संगठन
जोर-शोर से बनने लगा।²
उ०प्र०, पंजाब, बिहार में संगठन था, किन्तु इसमें कोई आपसी
घनिष्ठ सहयोग नहीं था। 8 दिसम्बर, 1928 को समस्त भारत के प्रमुख
क्रांतिकारियों की सभा हुई। इस सभा में जय देव, शिव वर्मा, विजय
कुमार सिंह, सुखदेव, ब्रहमदत्त, सुरेन्द्र नाथ पाण्डेय, भगत सिंह, भगवती चरण
वोहरा, चन्द्रशेखर आजाद, फणीन्द्रनाथ घोष प्रमुख थे।
1.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -217
2.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -225
143

इन सदस्यों ने चन्द्रशेखर आजाद को अध्यक्ष चुना और उनके नेतृत्व में
केन्द्रीय समिति (एच०आर०ए०) बनाई।¹
क्रांतिकारी युवाओं ने समाजवादी विचारधारा से प्रभावित होकर हिंसा
का मार्ग धीरे-धीरे छोड़ने का मन बनाया। भगत सिंह और उनके
साथियों ने पहली बार क्रांतिकारियों के समक्ष क्रांतिकारी दर्शन रखा।
काकोरी काण्ड के बाद संगठन का उद्देश्य था कि जहां भी एक व्यक्ति
दूसरे का शोषण करता था, उसे व्यवस्था का उन्मूलन करना होगा। जेल
की कोठरी में अशफाक उल्ला खां ने लिखा कि - 'हिंसा के मार्ग को
छोड़कर आन्दोलन मूल धारा में आ जाए और हिन्दू-मुसलमान एकता
बनाये रखने का प्रयास करें। क्योंकि इन्हीं जातियों में अंग्रेज फूट डालने
की भरपूर कोशिश करते थे।' अशफाक को भी लालच देकर सरकार द्वारा
गवाह बनाने का प्रयास किया गया था।
काकोरी काण्ड भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में पहला ऐसा ठोस प्रयास
था कि जिसके प्रतिफल के रूप में हमें क्रांतिकारी गतिविधियों की
बारम्बारता दिखाई पड़ती है। इन क्रांतिकारी गतिविधियों में मुख्यतया
एच०एस०आर०ए० संगठन के माध्यम से अनेक प्रयास किये गये।
काकोरी काण्ड के पश्चात् अंग्रेजी सरकार की खिलाफत करने के
लिए भारी संख्या में युवा वर्ग सामने आया। क्रांतिकारी युवा व्यक्तिगत
आतंकवाद और हत्या की राजनीति छोड़कर संगठित क्रांतिकारी कार्यवाही
में विश्वास करने लगे थे। साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान
लाला लाजपतराय पर लाठीचार्ज और उसके बाद उनकी मौत ने युवा
क्रांतिकारियों को एक बार फिर व्यक्तिगत आतंकवाद और हत्या की राह
पकड़ने पर मजबूर कर दिया।
1.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -226
144

देशभर में इस मृत्यु से बहुत खलबली मची। युवा क्रांतिकारियों ने इसे
अपने पौरुष के लिए चुनौती समझा और स्वीकार किया। 17 सितम्बर,
1928 को भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राज गुरु ने लाठी बरसाने वाले
एक पुलिस अधिकारी सैण्डर्स की हत्या कर दी। काकोरीकाण्ड में शहीद
युवाओं का बलिदान खाली नहीं गया। यही नहीं भगत सिंह ने
एच०एस०आर०ए० के माध्यम से सरकार द्वारा किये जा रहे दमन कार्यों के
विरुद्ध विरोध जताने के लिए असेम्बली में बम फेंका। यह विरोध की
आवाज थी। काकोरी काण्ड का प्रभाव केवल क्रांतिकारी आन्दोलन में
ऊर्जा के रूप में ही नहीं, वरन् राजनीतिक आन्दोलन में भी प्रतिस्पर्धा की
भावना को लेकर अनेक नेताओं ने राष्ट्रीय आन्दोलन में कार्य किया।
अंग्रेजी सरकार ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन में जब अनेक नेताओं को
आमंत्रित किया, तो कांग्रेस ने भाग नहीं लिया। यह राष्ट्रीय आन्दोलन
पहली बार क्रांतिकारियों के लिए जनक्रांति के रूप में दिखाई पड़ता है।
महात्मा गांधी अपने सिद्धान्तों से समझौता न कर पाने की स्थिति में
प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लेते हैं परन्तु भगत सिंह को
क्रांतिकारियों और जनता का व्यापक समर्थन मिला। इस समय भगत
सिंह एक महान ख्यातिलब्ध व्यक्तित्व के रूप में उभरे।
काकोरी काण्ड का राजनीतिक रूप से पहली बार अंग्रेजों के खजाने
पर किए गये लूटपाट का परिणाम यह हुआ कि देश में विभिन्न संगठनों
का निर्माण हुआ। अंग्रेजी सरकार का भय बढ़ गया। स्वराज्य
कार्यकर्ताओं को कांग्रेस से हटकर एक नयी पार्टी बनाकर चुनाव में भाग
लेने और अपने संविधान निर्माण की बात सूझी। सुभाष चन्द्र बोस जैसे
बड़े क्रांतिकारी नेता को नेहरू रिपोर्ट निर्माण की समिति में रखना पड़ा।
नेहरू रिपोर्ट आने के पश्चात् भारत की क्रांतिकारी गतिविधियों में इजाफा
दिखाई पड़ता है। सर्वप्रथम एच०एस०आर०ए० के सदस्यों में से एक
महत्वपूर्ण सदस्य भगत सिंह ने क्रांतिकारी दर्शन देते हुए अनेक कार्यों को
परिणाम तक पहुंचाया जो पहली बार क्रांतिकारी आन्दोलन में दिखाई
145

पड़ा। 1925 के एच०एस०आर०ए० के घोषणा पत्र में कहा गया कि संगठन
का उद्देश्य उन तमाम व्यवस्थाओं का उन्मूलन करना है, जिसके तहत
एक व्यक्ति दूसरे का शोषण करता था। क्रांतिकारियों ने रेल, परिवहन,
इस्पात और जहाज जैसे निर्माणकारी उद्योगों के राष्ट्रीयकरण का भी
प्रस्ताव रखा। बिस्मिल ने जेल से एक संदेश भेजा कि वे पिस्तौल व
रिवाल्वर रखने की इच्छा छोड़ दें। क्रांतिकारी षड़यंत्रों में हिस्सा न लें।
खुला आन्दोलन चलाएं। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता बनाए रखने की
अपील की। यही नहीं उन्होंने साम्यवाद में अपनी आस्था व्यक्त की। वे
यह भी कहते हैं कि प्रकृति की हर सम्पदा पर प्रत्येक इंसान का बराबर
का हक है।
काकोरी काण्ड के पश्चात् बंगाल में धीमी पड़ चुकी क्रांतिकारी
कार्यवाहियों में तेजी आ गयी। पुरुषों तक सीमित क्रांतिकारी आन्दोलन में
1925 आते-आते महिलाएं भी शामिल हो गयीं। प्रीतिलता वाडेदार, कल्पना
राव आदि अनेक महिलाएं प्रमुख रूप से भाग लेती थीं। स्पष्ट था कि
अंग्रेजी सरकार सर्तक हो गयी। 1925 के आसपास चटगांव विद्रोह के रूप
में एक महत्वपूर्ण घटना दृष्टिगत होती है। काकोरी काण्ड के बाद हमें
क्रांतिकारी संगठनों के विचारों में तेजी से हुए परिवर्तन भी स्पष्ट होते हैं।
पूर्व के विचारों में हिंसा का बाहुल्य था। हिंसा के द्वारा ही जनता में
अपनी पैठ बनाना उद्देश्य था। परन्तु काकोरी काण्ड में हुई फांसी से यह
प्रश्न आया कि इतना कैडर कहां से आयेगा कि इतने लोग घर-बार
छोड़कर जनता के बीच पूरे समय के लिए काम कर सकें। उनका मानना
था कि कुछ चमत्कारिक एवं बहादुरी के कार्यों द्वारा प्रचार होगा। आगे
चलकर एच०एस०आर०ए० ने भी युवकों से अनुरोध किया कि क्रांतिकारी
आतंकवाद का रास्ता छोड़ दें। ब्रिटिश सरकार की कूटनीतियों के कारण
क्रांतिकारी आन्दोलन का पराभव होता गया। तत्कालीन सरकार ने इन
क्रांतिकारियों को छोटे से दोष के लिए बड़े से बड़ा कड़ा दण्ड देकर समाज
में एक प्रकार का भय पैदा कर दिया, जिससे युवा वर्ग इन कार्यों से दूर रहें।
146

काकोरी काण्ड के मूल में युवाओं की विचारधारा में क्रांतिकारी
परिवर्तन आया। देश में एक भावना आई कि अंग्रेजों की सत्ता को
चुनौती दी जा सकती है, जो पहले असम्भव प्रतीत होती थी। समय-समय
पर पूरे देश में अनेक गतिविधियों का घटित होना अंग्रेजों के लिए एक
गम्भीर समस्या ही नहीं चुनौती भी बन गयी थी। युवाओं के आदर्श के
रूप में काकोरी काण्ड के शहीद राम प्रसाद, रोशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी,
अशफाक उल्ला खां हो गये थे। फांसी से बचे और सजाएं काटने वाले या
फरार क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद, शचीन्द्र नाथ सन्याल, राम कृष्ण खत्री
इत्यादि ने भी आगे चलकर अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों को गति प्रदान
की। युवा क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार की क्रूर नीतियों के बावजूद
आगामी युवा पीढ़ी को भारत माता की सौगन्ध देकर एवं भावनात्मक रूप
से समझाकर अनेक घटनाओं की पूर्णाहुति की। परन्तु दमनात्मक नीतियों
से फरवरी 1931 में इलाहाबाद के एक पार्क में चन्द्रशेखर आजाद के मारे
जाने के बाद पंजाब, उ०प्र० और बिहार में क्रांतिकारी आन्दोलन खत्म हो
गया। अनेक क्रांतिकारी एच०एस०आर०ए० के प्रभाव के कारण मार्क्सवादी
हो गये और जनता सामाजिक क्रांति में विश्वास करने लगी। इनमें से
कुछ कम्युनिस्ट पार्टी में हो गये, कुछ सोशलिस्ट पार्टी और कुछ वामपंथी
दलों में और बहुत से उदारवादी पार्टी में शामिल हो गये।
यह सच था कि हिंसात्मक आन्दोलन की एक सीमा होती है क्योंकि
शहादत एक सीमित समय का युवाओं का उद्गार था। गांधी जी के
आन्दोलन में जनसहभागिता थी, क्योंकि वे अहिंसा को आधार मानकर
अपना आन्दोलन चला रहे
थे। अहिंसा को गांधी जी ने इतना मजबूत अस्त्र माना कि चौरी-चौरा
काण्ड में हिंसा हो जाने से असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया। ये
घटनाएं आम जनता में सहज रूप से इतना विश्वास पैदा करने में सफल
हुई कि आम सहभागिता उदारवादी आन्दोलन में अधिसंख्य हो गयी।
147

इस घटना के दो वर्ष बाद काकोरी ट्रेन डकैती की घटना हुयी, यह
अपने में एक साहसिक कदम था। परन्तु जिस भावना से यह कार्य किया
गया, उसे लम्बे समय तक बरकरार नहीं रखा जा सकता था। क्योंकि वे
जनता को राजनीतिक रूप से उद्वेलित करने या राजनीतिक संघर्ष में
शरीक करने में विफल रहे।
बावजूद इसके काकोरी काण्ड का राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष में अमूल्य
योगदान है। इन क्रांतिकारियों का अनन्य राष्ट्र प्रेम, अटूट प्रतिबद्धता,
अदम्य साहस और गौरवमय बलिदान भारतीय जनता के लिए प्रेरणा स्रोत
बने। उन्होंने अपनी गतिविधियों से राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।
युवाओं के प्रेरणास्रोत बने क्रांतिकारियों में मुख्यतः अशफाक उल्ला खाँ ने
सामाजिक एकता की वह मिसाल कायम की जो अद्वितीय है। अभी तक
मुस्लिम समुदाय का योगदान समाज में आलोचना का विषय था, लेकिन
अशफाक के शहीद होने के पश्चात् गौरवमयी अध्याय के रूप में लोगों
द्वारा याद किया जाने लगा। निश्चित ही अशफाक का बलिदान
अतुलनीय है।

148

अध्याय-नौ

अध्याय-नौ
अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ : पत्र कविताएँ, रचना....
(एक रचनात्मक अध्ययन)
किसी के कृतित्व और व्यक्तित्व को समझने के लिए उसके द्वारा
लिखे गये शब्द-अभिव्यक्ति किसी गवाह की तरह आवश्यक हो जाते हैं,
यदि वह व्यक्ति रचनाकार है। अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ एक सतर्क और
संघर्षशील क्रांतिकारी सदस्य थे। अशफ़ाक एक कवि थे, जिनकी कविताएँ
(गीत, गजल, नज़्म) निश्चित ही एक मानवीय संवेदना की यात्रा हैं।
अशफ़ाक उल्ला के वैचारिक पहलू का ज्ञान हमें उनकी कविताओं और
पत्रों से ही मिलता है।
अशफ़ाक के पत्र : - पत्रों के माध्यम से अशफ़ाक ने स्वयं को व्यक्त किया
है। ये पत्र एक बंदी व्यक्ति के हैं। एक क्रांतिकारी के पत्र हैं, एक देशभक्त
युवा के पत्र है, जिसके अपने स्वप्न हैं, अपना सम्मान है, अपनी
मानसिकता है, जहाँ किसी प्रकार की बुनावट या बनावट नहीं है। बिना
किसी छिपाव या दुराव के, आडम्बर के बगैर और ऐसा भी नहीं कि कोई
चीज बेवजह बढ़ा चढ़ाकर कही गयी हो, पत्र पूरी गवाही देते हैं। अशफ़ाक
के पत्र देश के प्रति उनकी कर्तव्य भावना की हार्दिकता को भली प्रकार
समझने में सहायक हैं। सुधीर विद्यार्थी ने कहा है कि, "अशफ़ाक के पत्र
उनके विचारों पर बखूबी रोशनी डालते हैं। यह पत्र स्वतंत्रता संग्राम के
इतिहास का जीवन्त दस्तावेज और राष्ट्र की बहुमूल्य निधि हैं।¹ अशफ़ाक
के पत्रों के आइने में हम अपने अतीत की ओर झाँक कर देख सकते हैं
और नई पीढ़ी इनसे अवश्य ही दिशा लेकर आगे का रास्ता भी साफ कर
सकती है।

  1. अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ, उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -117
    149

अशफाक ने बनारसी लाल को एक पत्र लिखा था जो काकोरी के
मुकदमें में सबूत के तौर पर प्रयोग किया गया - "मैं इस बार कुछ
महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श करना चाहता हूँ। मैंने उर्दू में पत्र
लिखना ठीक समझा। मुझे लेनिन का पता आपके पत्र से मालूम हुआ।
मैं आज ही उन्हें पत्र लिखने का विचार कर रहा हूँ। राम का क्या हाल
है? उनसे मुलाकात होती है या नही? तुम्हें आशिक का जो पत्र मिला है
उसे तुरन्त राम तक पहुँचा दो। राम जितनी जल्दी हो सके मुझे उत्तर दें।
तुम्हें ज्ञात है कि मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है। जिससे मैं काम चला
सकूँ। नौकरी का अर्थ है कि मैं अपनी भावनाओं का खून करूँ। तुम्हें
अच्छी तरह याद है कि मैं स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहता हूँ। मैं तो
स्वतंत्रता का पुजारी हूँ और उसकी एक झलक देखने के लिए प्राण तक
निछावर कर सकता हूँ। दासता की माला चाहे वह किसी प्रकार की हो मैं
उसे अपने गले में पहिनना नहीं चाहता। मैं उसके विचार से ही घंटों
रोता रहता हूँ। लेकिन संबंधियों की इच्छा है कि मैं कोई नौकरी कर लूँ
और अपनी वृद्धा माँ की सेवा करूँ। बात एक हद तक ठीक भी है और
हमारा धर्म भी यही आदेश देता है, परन्तु मुझे मातृभूमि की सेवा का
अवसर न मिलेगा।
यदि आज मैं भोपाल में नौकरी करना चाहूँ तो सर असरार हसन
खाँ साहब मुझे कोई-न-कोई नौकरी दिला देंगे। मेरे भाई ने मुझे उनसे
मिलने के लिए कहा है और उनकी सिफारिश से मुझे फौज में सुबेदारी
तुरन्त मिल सकती है। लेकिन इससे मेरी तमाम योजनाओं पर पानी फिर
जायेगा। मैं केवल इसीलिए तो अपने जीवन से प्यार नहीं करता कि खूब
रूपया कमाऊँ और मौज करूँ, बल्कि मैं तो इसलिए जीवित रहना चाहता
हूँ कि मातृभूमि के लिए स्वतंत्रता प्राप्त करूँ। मैं बड़े से बड़े खतरे की भी
कोई चिन्ता नहीं करता और न मुझे इस बात की फिकर है कि दुनिया
मुझे दीवाना या पागल कहती है।
150

यह मेरा विश्वास है कि मैं इसी के लिए जीऊँगा और इसी के लिए
मरूँगा। यही मैं अनुभव करता हूँ। शाहजहाँपुर की गलियों में घूमते-घूमते
थक गया हूँ।
तुम जानते हो कि मैं गाँव का मालिक हूँ, मेरी माँ जमींदार है
इसलिए मैं जितनी जमीन चाहूँ मुझे मिल सकती है। मैं खेती-बाड़ी करना
चाहता हूँ। लेकिन उसके लिए मेरे पास आवश्यक धन नहीं है। यदि तुम
भी खेती-बाड़ी पसन्द करो तो इस कार्य में कुछ पैसा लगाओ और आओ
हम तुम दोनों वहाँ चलकर रहें। इस तरह हम अपने किसान भाइयों के
बीच रहेंगे और अपनी योजनाओं को कार्य रूप में परिणत करेंगे और
इस तरह कुछ ही वर्षों में हमारे पास धन भी एकत्र हो जायेगा। तब हम
बड़े पैमाने पर प्रचार कर सकेंगे और दूसरे मित्रों से कहेंगे कि वे भी हमारे
साथ आकर रहे और काम करें। तात्पर्य यह है कि यदि संसार में कोई
पवित्र और लाभदायक काम हो सकता है तो वह खेती ही है लेकिन यदि
तुम न करना चाहो और अगर अस्वीकार कर दिया तो उससे मेरा दिल
टूट जायेगा। तुम्हें हर हालत में अपने बाल-बच्चों के लिए कुछ न कुछ
करना ही पड़ेगा। तब फिर क्यों न खेती ही शुरू कर दी जाय। पूँजी
तुम्हारी, भूमि मेरी और श्रम हम दोनों का। हम दोनों सांसारिक बाधाओं
का सामना करने के लिए गाँव में सगे भाइयों की तरह रहेंगे और संसार
को दिखा देंगे कि संसार में नवयुवकों के लिए कौन सा काम सम्भव
नहीं। परन्तु यह आवश्यक है कि उसका दिल एक हो, इरादा एक हो और रास्ता
एक हो। नंदिया और सालपुर की जमीनें हमारे लिए गोद पसारे हुए है और
फिर प्रेम से हमारी बाट जोह रही हैं। वहाँ के किसान हमारे स्वागत के
लिए तैयार है। इसलिए प्यारे भाई, उन जमीनों को निराश न करो,
किसानों के दिल न तोड़ो और मुझे अपने निर्णय से सूचित करो। क्या
तुम इसके लिए तैयार हो। यदि मेरे पास पूँजी होती तो मैं फौरन काम
शुरू कर देता और तुम्हें अपना भागीदार बना लेता। परन्तु खेद है कि
मेरे पास पाई भी नहीं।
151

मेरे सम्बन्धी किसी भी प्रकार की सहायता करने के बजाय मुझे
दासता के गड्ढे में ही ढकेलना चाहते हैं। वे खेती के महत्व को समझते
ही नहीं कि भारत की स्वतंत्रता किसानों पर निर्भर है। अतः आओ हम
तुम खेती-बाड़ी शुरू कर दें। देखो, देवनारायण और गंगा सिंह खेती-बाड़ी
से कितना लाभ उठा रहे हैं। दो साल बाद बहुत से लोग हमारे साथ आकर
मिलने को तैयार हो जायेंगे। तब हम अपनी योजनाओं को कार्य रूप में
परिपक्व करने योग्य हो जायेंगे।''¹ - वारसी
वारसी कोई और नहीं अशफाक उल्ला खाँ ही हैं जो उपनाम
'वारसी' से रचनाएँ लिखते थे। अशफाक का व्यक्तित्व उक्त पत्र के
माध्यम से स्पष्ट होता है। वे कर्म प्रधान व्यक्ति थे। क्रांति को कर्म से
जोड़ने में उनका विश्वास था। कृषि कार्य को महान कर्म समझना भी
अशफाक को जमीनी सच्चाइयों से जोड़ता है। अशफाक चाहते थे कि वे
अपनी बात आम जनता तक ले जायें। खेती-बाड़ी से एक लाभ तो यह
होगा कि वे किसानों के बीच रहेंगे, अपनी बात कहेंगे, देश प्रेम की
भावनाएं भरेंगे और किसान की सच्चाई जानेंगे। वे आम आदमी की
गहरी पीड़ाओं से परिचित होंगे, समस्याओं पर बहस करेंगे और इसे वे
क्रांतिकारी नेताओं के माध्यम से सत्ता तक अपनी आवाज बुलंद करेंगे।
शायद यही कारण है कि वे किसान के करीब जाना चाहते हैं। पत्र यह
भी कहता है कि हिन्दू-मुसलमान की एकता के लिए अशफाक संकल्पित
थे। बनारसी को अपना सगा भाई समझते थे।
काकोरी काण्ड में अशफाक पर मुकदमा चला। उन्हें लखनऊ से
फाँसी की सजा सुना दी गयी। अशफाक को फैजाबाद जेल में डाल दिया
गया।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 117से119 तक
    152

जिला जेल लखनऊ या फैजाबाद जेल (फाँसी घर) से लिखे गये पत्र से
अशफाक के महान क्रांतिकारी जीवन और मातृभूमि के लिए त्याग की
भावना का परिचय मिलता है।
<u>बड़े भाइयों को पत्र</u>
डिस्ट्रिक्ट जेल, लखनऊ
26 फरवरी, 1927
बनाम रियासत उल्ला खाँ साहब!
बसद अदब गुजारिश है कि कल 25 माह हाल को स्पेशल मजिस्ट्रेट
साहब ने तलब किया था कि गवाहों के सफाई की फेहरिस्त वजाहत के
साथ पेश करो ताकि यह मालूम हो सके कि हर एक चार्ज के मुतल्लिक
गवाह पेश करना है? और गवाहान की फेहरिस्त में इख्तसार की जरूरत
है। मैंने इनकार कर दिया कि बगैर भाई से मशविरा किये हुए मैं कोई
राय कायम नहीं कर सकता। लिहाजा 11 मार्च, फिर पेशी की मुकर्रर है।
इस दरम्यान में आप मुझसे जरूर मिल लीजिए मय उन गवाहान की
मुकम्मिल फेहरिस्त, मय बलदियत व सकूनत, जिनका आप ने जिक्र
किया था और जब आप जेल पर आयें, हजेला साहब को हमराह
लाइएगा। उस रोज के वास्ते वक्त आध घंटे से ज्यादा दिया जायेगा और
भी सबको साथ लाइएगा।
खादिम
अशफाक.....1

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -132
    153

बड़े भाई रियासत उल्ला खाँ के नाम दूसरा पत्र
डिस्ट्रिक्ट जेल, लखनऊ
19 जून 1927
खत बनाम रियासत उल्ला खाँ,
भाई साहब किबलाबाद, आदाब अर्ज है कि इस इतवार को हस्बे
वायदा आं जनाब का सख्त इन्तजार रहा। आपकी इस इतवार को सख्त
जरूरत थी। खैर अगली इतवार को जरूरत बिल जरूर मय वालिदा
साहिबा वगैरह आइएगा। अब सिर्फ तीन इतवार दरम्यान में हैं। क्योंकि
13 जुलाई को फैसला हो जायेगा। मैंने जो लिफाफा वालिदा साहिबा को
लिखा था, जिसकी बावत आपने कहा था, लेते आइएगा। बख्शी के
वालिदा कानपुर जाने वाले थे। आपका इन्तजार करते रहे, मगर वह
गालिबन आजकल में चले जायेंगे। आप भी ठीक करा लीजिए। मेरी
गजल भी हमराह भेज दीजिएगा, जिसको आपने दरयाफ्त किया था।
बहार आई है शोरिश जनूने सामां की। मगर मुझसे मिलकर जाइएगा।
अलीगढ़ का जाने का इरादा ही रहा, या जाइएगा भी? फैजाबाद भी जरूर
चले जाइएगा। वक्त कम है, लम्बे चौड़े खत लिखने की अब जरूरत नहीं
है। यूँ कार्ड लिख दिया। आप खुद अक्लमन्द हैं। जो मुनासिब समझें
करें। दवा हो चुकी, अब दुआ बाकी है। बब्बन व आशिक वगैरह से
सलाम कह दीजिए। मुलाकात के बारे में भी कह दीजिएगा। फोटो की एक
कापी बख्शी के वालिद को दे दीजिएगा। बख्शी की ख्वाहिश है। मगर
अपने हमराह लाइएगा ताकि हम भी देख लें। ज्यादा क्या लिखूँ।$^1$

  • अशफाक वारसी
  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -133
    154

<u>जिला जेल फैजाबाद से लिखा गया पत्र</u>
डिस्ट्रिक्ट जेल, फैजाबाद
21 जुलाई 1927
बनाम रियासत उल्ला खाँ,
जनाब भाई साहब क़िबला बसद अदब गुजारिश है कि मैं बखैरियत
हूँ और व आफियत आप लोगों की बदरगाहे रब्बे बेनियाज
नेक-मतलूब-कार्ड मुरसिला पहुँचा- हालात से आगाही हुई। ऐनुद्दीन साहब
के बारे में जो लिखा है उनके लिए मुझे किसी का एक शेर याद आ
गया। लिखे देता हूँ -
‘‘की मेरे कत्ल के बाद उसने जफा से तौबा
हाय उस ज़ूद यशेमाँ का यशेमाँ होना।’’
जिस-जिस ने मुझे फँसाने की कोशिश की उन सबका शुक्रिया।
अगर मेरी जान की कुर्बानी उन लोगों के मुफीदकार हो तो जहे किस्मत।
मैं भला कहाँ तक काबिल था कि मैं दुनिया में किसी तरक्की व नामवरी
का बाइस होता। जिन्दगी और मौत यह तो दुनिया में चला ही जाता है।
अगर मौत और जिन्दगी का साथ न होता तो न तो जिन्दगी का ही
मजा रहता और न कोई मौत का ख्याल करता और न खुदा की खुदाई
मानता। जो पैदा हुआ और कुरये आलम की हवा में साँस ली, उसके
लिए मौत जरूरी हो गयी। अज़आदम ताईदम। बड़े-बड़े अंबिया औलिया
व अतकिया पहलवानानेतुहमतन हसीनानेदहर गर्ज की सभी किस्म के
आदमी आए और अपना-अपना पार्ट दुनिया के स्टेज पर खेल खेलकर
चले गये। अब न मूसा हैं, न फिरऔन, न यूसुफ है न अजीजे मिस्त्र, न
कृष्ण हैं न कंस, न राम हैं न रावण, न कारून हैं न उनका खजाना
और न इमामहुसैन है न यजीद।
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हाँ अगर उनकी याद, उनके कारनामे, उनके आमाल व अकवाल दुनिया
के सामने मौजूद हैं और वह उनसे अच्छा या बुरा नतीजा निकालती है।
दुनिया में आज मुझ पर इन डकैतियों के इलजाम में फाँसकर सजा दे दी
जाए, दे लें, हम बेवश हैं। हाँ मगर हाँ, मुंसिफेहकीकी के यहाँ फैसला
जरूर होगा, वहाँ न सी०आई०डी० की चालबाजी और न पब्लिक
प्रासीक्यूटर के ही आरगूमेंट चलेंगे। दूध का दूध और पानी का पानी
होगा, मुझे इत्मीनान है, मुझे सुकून है, मैं खुश हूँ। मेरा फर्ज और क्या
है, राजी बरजाए मौला रहना।
‘’फैज़े मुहब्बत से है, कैदे मेहन
मेरे लिए एक बलाए हुस्न।’’
खुदा का खुद कौल है दुनिया में कुछ होता है मिनजानिब अल्लाह
होता है। यह हमारा ईमान है।...यह भी खुदा की मर्जी है कि मैं फाँसी
की कोठरी में बन्द किया गया और इसमें भी कोई भलाई योशीदा है जो
बादी उन नजर में हम लोगों को नहीं मालूम होती। आप लोगों को
सब्रो-शुक्र से काम लेना चाहिए और जनाबे वालिदा साहिबा को अपनी
नजर खुदा की तरफ करनी चाहिए।
‘’अजब क्या है जो बेड़ा गर्क होकर फिर उभर आये,
कि हमने इनकलाबे चर्खे गरदूँ यूँ भी देखे हैं।’’
खुदा में बड़ी ताकत है, वह सबकुछ कर सकता है। दुआ करना
इनसान का काम है, कबूल करना उनका। अगर जिन्दगी की रस्सी दराज़
है, तो फैजाबाद से एक दिन दूसरी जगह जरूर जायेंगे। वरना यहीं से
जिन्दगी की आखिरी साँस लेकर दुनिया को खैरबाद कहेंगे और फिर
रोजेकयामत ज़मीने फैजाबाद ही से उठकर खुदायेरब्बेजलील से फरयारी
होंगे। बहरहाल अभी तो कुछ महीने उम्मीदे जीस्त है, यह भी बहुत काफी
है। आप सबको मेरा समझाना बेकार है, क्योंकि मैं आप सबका छोटा हूँ।
आप लोग खुद अक्लमन्द है। मेरे मुकदमें की अपील की समायत शुरू
हो गयी होगी। न मालूम कैसा रंग है।
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आप हजेला साहब और गुप्ता साहब को लिख दीजिएगा कि मुझको
बराबर मुत्तिला करते रहेंकि रंग क्या है। और नतीजे से मुफस्सिल तौर
पर इत्तला दें। बख्शी के वालिद का क्या रहा? और उनकी बहन वगैरह
गई या अभी नहीं? सब मुफस्सिल लिखियेगा। बख्शी के वालिद के
मुकदमें का फैसला जो भी हो लिखिएगा। अपील यहाँ भेज दी है। कल
नकले-फैसला भी थी। वह खुद वहाँ वापस हो जायेगी। देखिए वकील कौन
लिया जायेगा।
आप लखनऊ चौधरी साहब से आकर मिलिएगा और मेरा सलाम
कह दीजिएगा कि मेरे केस को आप करें और दीगर कार्यवाहियों से
गाफिल न हों। अपील में चौधरी साहब का नाम, हजेला साहब का नाम
लिख दिया है। अब देखिये कौन मिले। मगर आप कौंसिल के मुतालिक
गाफिल न रहिएगा। अपना आदमी चीफ कोर्ट के अन्दर होना जरूरी है।
हजेला साहब से सलाम कह दीजिएगा, ज्यादा क्या लिखूँ। भाई साहब
अगर आएँ और फल लाएँ तो वह गालिबन मुझको मिल सकते हैं।
लखनऊ जेल में बनिस्बत यहाँ के ज्यादा आराम था। आज तक तो वही
खाना मिलता है जो एक अख़लारी मुजरिम को मिलता है। मगर आज
से शायद सुपरिटेंडेंट साहब कुछ बेहतर दें। मगर कहाँ लखनऊ जेल और
कहाँ फैजाबाद -
‘‘हजार शेख़ ने दाढ़ी बढ़ाई सन की-सी,
वलै वह बात कहाँ मौलवी मदन की-सी’’
खैर फीअमानिउल्ला बुजुर्गों की खिदमत में आदाब दस्तबस्ता कुबूल हो।
बच्चों को प्यार, छोटो को दुआ-
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