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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१४२ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ पंचम अध्याय
इस प्रकार मोह के चार भेद हैं। परन्तु यह परस्पर मिल मिलकर
अनेक रूप वाले हो जाते हैं। अब मैं इन सबके पृथक-पृथक लक्षण
तुम्हारे प्रति कहता हूँ। प्रथम बीज जाग्रत अवस्था वह है जो नाम
रहित, विकारहीन चेतन में चित् की होने वाली चित्त, जीव नाम
शब्द और अर्थ की दृष्टि वाली अवस्था होती है। ज्ञाता की यह नवीन
अवस्था है। इस अवस्था के पश्चात् जाग्रत अवस्था होती है। अपने
अन्तर में तेरा मेरा के भावों की स्थिति ही मोह की यह द्वितीय अवस्था
है। यह अतिरिक्त भावनाओं से पूर्व होती है। महा जाग्रत अवस्था
वह है जिसमें 'यह वह है' 'मैं यह हूँ अथवा यह वस्तु मेरी है' आदि
पूर्व जन्मों के संस्कार सहित भावनाएं उत्पन्न होती हैं। जाग्रत स्वप्न
अवस्था चौथी है। रूढ़ारूढ़ एवं मनोमय सृष्टि की अपना ही इसका
रूप है। इसमें एक चन्द्रमा के स्थान पर दो चन्द्रमाओं का आभास,
सीप में चाँदी का आभास और मृग तृष्णा में जल का आभास होता है।
इस प्रकार जाग्रत स्वप्न के अनेक प्रकार हैं। स्वप्नावस्था वह है जिसमें
देखा हुआ दृश्य फिर दिखाई न दे और जागने पर मनुष्य को उस दृश्य
की स्मृति मात्र ही रह जाय। इस स्वप्नावस्था के पश्चात् जो अवस्था
होती है उसमें पूर्ण विकसित न हुआ स्वप्न जो विभिन्न कार्य कलापों
के साथ देर तक टिके तथा जो जाग्रत के समान ही प्रकट हो अथवा
जाग्रत अवस्था में ही स्वप्न दिखाई दे उसे ज्ञानीजन, स्वप्न जाग्रत
कहते हैं। जब प्राणी इन छः अवस्थाओं को पार कर सकता है और
जड़ात्मक स्थिति में अवस्थित होता है, उस विगत दुःख बोध वाली
अवस्था को ही सुषुप्ति कहते हैं। ऐसी अवस्था में यह विश्व आंतरिक
अन्धकार में छुप जाता है। हे ब्रह्मन् ! हे पुत्र ! मैंने तुम्हारे प्रति
अज्ञान की यह सात भूमिकायें बतलाई हैं। इनमें से प्रत्येक भूमिका
विविध ऐश्वर्यों वाली, विभिन्न अवस्थाओं के रूप में असंख्य रूप धारण
करने वाली है। अब मैं तुम्हें ज्ञान की सात भूमिकाओं की बात सुनाता
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

महोपनिषत् ] [ १४३
हूँ, उनका ज्ञान होने पर मनुष्य मोह रूपी कीचड़ में बारम्बार नहीं
फँसता ॥ ८-२१ ॥
वदन्ति बहुभेदेन वादिनो योगभूमिकाः ।
मम त्वभिमता नूनमिमा एव शुभप्रदाः ॥२२
अवबोधं विदुर्ज्ञानं तदिदं साप्तभूमिकम् ।
मुक्तिस्तु ज्ञेयमित्युक्ता भूमिका सप्तकात्परम् ॥२३
ज्ञानभूमिः शुभेच्छाऽऽख्या प्रथमा समुदाहृता ।
विचारणा द्वितीया तु तृतीया तनुमानसी ॥२४
सत्त्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात् ततोऽसंसक्तिनामिका ।
पदार्थभावना षष्ठी सप्तमी तुर्यगा स्मृता ॥२५
आसामन्तः स्थिता मुक्तिर्यस्यां भूयो न शोचति ।
एतासां भूमिकानां त्वमिदं निर्वचनं शृणु ॥२६
स्थितः किं मूढ एवास्मि प्रेक्षेऽहं शास्त्रसज्जनैः ।
वैराग्यपूर्वमिच्छेति शुभेच्छेत्युच्यते बुधैः ॥२७
सास्त्रसज्जनसंपर्कवैराग्याभ्यासपूर्वकम् ।
सदाचारप्रवृत्तिर्या प्रोच्यते स विचारणा ॥२८
विचारणाशुभेच्छाभ्यामिन्द्रियार्थेषु रक्तता ।
यत्र सा तनुतामेति प्रोच्यते तनुमानसी ॥२९
भूमिकात्रितयाभ्यासाच्चित्ते तु विरतेर्वशात् ।
सत्त्वात्मनि स्थिते शुद्धे सत्त्वापत्तिरुदाहृता ॥३०
दशाचतुष्टयाभ्यासादसंसर्गकला तु या ।
रूढ़सत्त्वचमत्कारा प्रोक्ताऽसंसक्तिनामिका ॥३१
भूमिकापञ्चकाभ्यासात् स्वात्मारामतया दृढ़म् ।
आभ्यन्तराणां बाह्यानां पदार्थानामभावनात् ॥३२

१४४ ] [ पंचम अध्याय

१४४ ] [ पंचम अध्याय
परप्रयुक्तेन चिरं प्रयत्नेनावबोधनम् ।
पदार्थभावना नाम षष्टी भवति भूमिका ॥३३
भूमिषट्कचिराभ्यासाद्भेदस्यानुपलम्भनात् ।
यत् स्वभावैकनिष्ठत्वं सा ज्ञेया तुर्यगा गतिः ॥३४
एषा हि जीवन्मुक्तेषु तुर्यावस्थेति विद्यते ।
विदेहमुक्तविषयं तुर्यातीतमतः परम् ॥३५
ये निदाघ महाभागाः सप्तमी भूमिमाश्रिताः ।
श्चात्माऽऽरामा महात्मानस्ते महापद्मागताः ॥३६
जीवन्मुक्ता न मज्जन्ति सुखदुःखरसस्थिते ।
प्रकृतेनाथ कार्येण किंचित् कुर्वन्ति वा न वा ॥३७
पार्श्वस्थबोधिताः सन्तः पूर्वाचारक्रमागतम् ।
आचारमाचरन्त्येव सुप्तबुद्धवदुत्थिताः ॥३८
भूमिकासप्तकं चैतद्धीमतामेव गोचरम् ।
प्राप्य ज्ञानदशामेतां पशुम्लेच्छाऽऽदयोऽपिये ॥३९
सदेहा वाप्यदेहा वा ते मुक्ता नात्र संशयः ।
ज्ञप्तिर्हि ग्रन्थिविच्छेदस्तस्मिन् सति विमुक्तता ॥४०
योग-भूमिकाओं के अनेकानेक भेद ज्ञानियों ने कहे हैं, परन्तु
मैं तो इन सात भूमिकाओं को ही अत्यन्त कल्याणमयी मानता हूँ।
इन सात भूमिकाओं द्वारा प्रकट होने वाला अवबोध ही ज्ञान कहा जाता
है। इन भूमिकाओं के अनन्तर होने वाली मुक्ति को ज्ञेय कहा गया
है। प्रथम ज्ञान-भूमिका का नाम शुभेच्छा है। दूसरी विचारणा, तीसरी
तनुमानसी, चौथी सत्त्वापत्ति और पांचवीं असंसक्ति कही जाती है।
छठवीं को पदार्थभावना और सातवीं को तुर्यगा कहते हैं। इन भूमि-
काओं में पुनः शोक उत्पन्न न होने देने वाली मुक्ति विद्यमान है। मैं
इनका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ। वैराग्य धारण से पूर्व सांसारिक
भ्रमजाल के प्रति ग्लानि उत्पन्न होना और शास्त्रादि के प्रति जिज्ञासा

महोपनिषत् ] [ १४५

का उदय होना, श्रेष्ठ कर्मों की इच्छा आदि को ही ज्ञानियों ने शुभेच्छा
कहा है । इसके पश्चात् साधु-सङ्ग और शास्त्रों के अध्ययन आदि के
द्वारा अभ्यास वैराग्य से युक्त सदाचरण की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, उसे
ही विचारणा कहा गया है । जब यह अवस्था प्राप्त हो जाती है, तब
विषयों के प्रति अनुराग क्षीण हो जाता है, वह अवस्था तनुमानसी कही
जाती है । जब इन तीनों भूमिकाओं का पूर्ण अभ्यास हो जाता है तब
वैराग्य के प्राबल्य से चित्त शुद्ध सत्व स्वरूप में अवस्थित होता है । उस
अवस्था को ही सत्वापत्ति कहा गया है । इन सब भूमियों का अभ्यास
होने पर जो संसर्गहीन कला सत्वारूढ़ होती है, वही 'असक्ति' है । इन
पाँचों भूमियों का अभ्यास होने पर अपने आत्मा में रमते रहने से और
बाह्याभ्यांतरिक पदार्थों की भावना का नाश होने पर पदार्थ-भावना
होती है। इन छः भूमिकाओं के पूर्ण अभ्यास के अनन्तर भेद-बुद्धि मिट
जाती है और आत्मभाव में ही साधक एकनिष्ठ हो जाता है । उसकी
यह अवस्था तुर्यगा कही गई है । इस अवस्था को जीवन्मुक्त पुरुष ही
प्राप्त होते हैं। इसके पश्चात् विदेह मुक्ति वाली तुर्यातीत अवस्था प्राप्त
होती है । जो अत्यन्त भाग्यशाली तुर्यगा भूमिका को ग्रहण कर लेते हैं,
वे आत्मा में ही रमण करते हैं । ऐसे सन्त महान् पद को प्राप्त हो चुके
हैं, जो जीवन्मुक्त हो गये हैं वे सुख दुःख के अनुभव से नितान्त दूर
रहते हैं । वे कर्तव्य कर्मों में लगकर भी उनमें दूर रहते हैं, उनमें लिप्त
नहीं होते । जैसे अपने साथियों द्वारा जगाये जाने पर मनुष्य सोकर उठ
पड़ता है, वैसे ही वह श्रेष्ठ कर्मों में रत रहकर सनातन आचरण करते
हैं । इन सात भूमिकाओं को मेधावीजन ही जानते हैं । यदि पशु और
म्लेच्छ आदि भी ज्ञान की इन भूमिकाओं को प्राप्त कर लें तो वे भी
देह त्याग के पश्चात् मुक्त हो जाते हैं । हृदयग्रन्थियों का उद्घाटन ही
ज्ञान है, जब इसकी प्राप्ति हो जाती है, तभी मुक्ति प्राप्त हो सकती है
॥२२-४०॥
मृगतृष्णास्बुदद्यादिशान्तिमात्रात्मकसवसौ ।

१४६ ] पंचम अध्याय

१४६ ] पंचम अध्याय
ये तु मोहार्णवात्तीर्णास्तैः प्राप्तं परमं पदम् ॥४१॥
ते स्थिता भूमिकास्वासु स्वात्मलाभपरायणाः ।
मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते ॥४२॥
सप्तभूमिः स विज्ञेयः कथितास्तश्च भूमिकाः ।
एतासां भूमिकानां तु गम्यं ब्रम्हाभिधं पदम् ॥४३॥
त्वत्ताऽहन्ताऽऽत्मता यत्र परता नास्ति काचन ।
न क्वचिद्भावकलना न भावाभावगोचरा ॥४४।
सर्वं सान्तं निरालम्ब व्योमस्थं शावश्वतं शिवम् ।
अनामयमनाभासमनामकमकारणम् ॥४५॥
न सन्नासन्न मध्यं तन्न सर्वं सर्वमेव च ।
मनोवचोभिरग्राह्यं पूर्णात् पूर्णं सुखात् सुखम् ।
असंवेदनमाशान्तमात्मवेदनमाततम् ।
सत्ता सर्वपदार्थानां नान्या संवेदनादृते ॥४७॥
परम पद उन्हीं को मिलता है जो मोह रूप समुद्र से पार हो
चुके हैं । जैसे मृगतृष्णा में जल का भ्रम उत्पन्न होता है वैसे ही अनात्म
में आत्म बुद्ध का प्रादुर्भाव होता है, इसी को अविद्या कहा गया है
और अविद्या नष्ट होना ही मुक्ति है । इन भूमिकाओं में वे पुरुष
ही स्थित होते हैं जो आत्म साक्षात्कार के प्रयत्न में लगे हैं ! मन की
पूर्ण शान्ति के उपाय को योग कहा है । योग की सातों भूमिकाओं
का वर्णन किया जा चुका है । इन भूमिकाओं का उद्देश्य ब्रह्मपद की
प्राप्ति है । ब्रह्मपद वह है जिसमें मेरा-तेरा रूप अपने पराये का भेद-भाव
नहीं होता । उस समय भगवान का न तो चिन्तन होता है और न
भावात्मक बुद्धि ही शेष रहती है क्योंकि सांसारिक पदार्थों का
अस्तित्व आत्म-संवेदन मात्र है, इससे भिन्न कुछ नहीं । आकाशस्वरूप
शिव, शाश्वत, दोष-शून्य, आलम्बन-शून्य, कारण-रहित, अनिर्वचनीय,
सत्-असत् से रहित, मध्य-अन्त से रहित, सम्पूर्ण और सम्पूर्ण भी,

महोपनिषद् ] [ १४७
मन-वाणी से ग्रहण करने के अयोग्य, पूर्ण शान्त, सुख से भी अत्यन्त सुख-
रूप तथा आत्मसाक्षात्कार रूप वह व्यापक ब्रह्म है। वह कभी संवेदन
में नहीं आता ॥ ४१—४७ ॥
संबंधे द्रष्टृदृश्यानां मध्ये द्रष्टर्हि यद्वपुः ।
द्रष्टृदर्शनदृश्यादिवर्जितं तदिदं पदम् ॥४८
देशाद्देशं गते चित्ते मध्ये यच्चेतसो वपुः ।
अजाड्यसंविन्मननं तन्मयो भव सर्वदा ॥४९
अजाग्रत्स्वप्ननिद्रस्य यत्तं रूपं सनातनम् ।
अचेतनं चाजडत्वं तन्त्यो भव सर्वदा ॥५०
जडतां वर्जयित्वैकां शिलाया हृदयं हि तत् ।
अमनस्कस्वरूपं तत् तन्मयो भव सर्वदा ।
चित्तं दूरे परित्यज्य योऽसि सोऽसि स्थिरो भव ॥५१
पूर्वं मनः समुदितं परमात्मतत्त्वात् ।
तेनाततं जगदिदं सविकल्पजालम् ।
शून्येन शून्यमपि विप्र यथाऽम्बरेण ।
नीलत्वमुल्लसति चारुतराभिधानम् ॥५२
संकल्पसंक्षयवशाद्गलिते तु चित्ते
संसारमोहमिहिका गलिता भवन्ति ।
स्वच्छं विभाति शरदीव खमागतायां
चिन्मात्रमेकमजमाद्यमनन्तमन्तः ॥५३
अकर्तृ कमराङ्ग चं गगने चित्तमुत्थितम् ।
अदृष्टृ कं स्वानुभवमनिद्रस्वप्नदर्शनम् ॥५४
साक्षिभूते समे स्वच्छे निर्विकल्पे चिदात्मनि ।

१४८ ] [ पंचम अध्याय

१४८ ] [ पंचम अध्याय
निरिच्छं प्रतिबिम्बन्ति जगन्ति मुकुरे यथा ॥५५
एकं ब्रह्म चिदाकाशं सर्वात्मकमखण्डितम् ।
इति भावय यत्नेन चेतश्चाञ्चल्यशान्तये ॥५६
रेखोपरेखावलिता यथैका पीवरी शिला ।
यथा त्रैलोक्यवलितं ब्रह्मैकमिह दृश्यताम् ॥५७
द्वितीयकारणाभावादनुत्पन्नमिदं जगत् ।
ज्ञातं ज्ञातव्यमधुना दृष्टं द्रष्टव्यमद्भुतम् ॥५८
विश्रान्तोऽस्मि चिरं श्रान्तश्चिन्मात्रान्नास्ति किंचन ।
पश्य विश्रान्तिसंदेहं विगताशेषकौतुकम् ॥५९
दृष्टा और दृश्य से सम्बन्धित मध्य में जो दृष्टि का स्वरूप होता
है, वह द्रष्टा, दृश्य और दर्शन से पृथक साक्षात्कार रूप से ही
अवस्थित होता है। एक देश से दूसरी ओर जाने वाले चित्त के मध्य
में जो स्थिति होती है, उसी में सतत तन्मय रहना चाहिये तुम्हारा
सनातन स्वरूप जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे जड़ चेतन से शून्य में
स्थित है, उसी में लीन रहो। जड़ता ही पाषाणरूपता है, उसके त्यागने
पर जो अमनस्क स्थिति प्राप्त है, उसी में अवस्थित रहो। चित्त
के दूरस्थ त्याग पर जो अवस्था हो वह ग्रहणीय है। परमात्मतत्व से
मन का ही पहले आविर्भाव हुआ है। उसी मन के विकल्प रूप यह
संसार प्रकट हुआ। शून्य भी शून्य को उत्पन्न करने वाला है। शून्य
आकाश से ही सुन्दर दिखाई पड़ने वाली नीलिमा प्रकट होती है। जब
संकल्प का नाश हो जाता है तब चित्त की वृत्तियाँ गल जाती हैं और
उसके परिणाम स्वरूप जगत का मोह रूप कुहरा भी गल जाता है। तब
शरदागमन पर निर्मल आकाश के समान वह जन्मरहित, सभी प्राणी-
पदार्थों का आदि और अनन्त एक चिन्मात्र रूप ही भासित होता है।

महोपनिषत् ] [ १४१

बिना रङ्ग आदि के और कर्त्ता के आकाश चित्रित हो रहा है। दृष्टा
बिना, निद्रारहित स्वप्न दिखाई देता है। यह चिदात्मा समान रूप से
स्वच्छ, निर्विकल्प, साक्षिरूप तथा दर्पण के समान निर्मल है, उसमें इच्छा
के बिना ही तीनों लोक प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। ब्रह्म सर्व स्वरूप, चिदा-
काश स्वरूप, अखण्डित तथा एक है। ऐसी भावना करने से ही चित्त
की चञ्चलता शान्त होती है। जैसे एक मोटी पाषाण शिला पर रेखा
उपरेखाएँ खिंची होती है, वैसे ही तीनों लोकों से युक्त ब्रह्म के दर्शन
करने चाहिये। किसी अन्य कारण के अभाव में इस विश्व की उत्पत्ति
ही नहीं हुई। चिन्मात्र के सिवा और कुछ नहीं है। ऐसा जानकर इस
सम्पूर्ण सांसारिक माया से विरक्त होकर तथा संशय-रहित होकर केवल
चिन्मात्र के दर्शन करो। अब जो जानना था, वह मैंने जान लिया, जो
देखना था, उसे देख लिया और चिरकाल का थका मांदा मैं अब विश्राम
को प्राप्त हुआ हूँ ॥ ४८—५६॥

निरस्तकल्पनाजालमचित्तत्वं परं पदम् ।
त एव भूमतां प्राप्ताः संशान्ताशेषकिल्विषा ॥६०
महाधियः शान्तधियो ये याता विमनस्कताम् ।
जन्तोः कृतविचारस्य विगलद्वृत्तिचेतसः ॥६१
मननं त्यजतो नित्यं किंचित् परिणतं मनः ।
दृश्यं संत्यजतो हेयमुपादेयमुपेयुषः ॥६२
द्रष्टारं पश्यतो नित्यमद्रष्टारमपश्यतः ।
विज्ञातव्ये परे तत्त्वे जागरुकस्य जीवतः ॥६३
सुप्तस्य घनसंमोहमये संसारवर्त्मनि ।
अत्यन्तपक्ववैराग्यादरसेषु रसेष्वपि ॥६४
संसारवासनाजाले खगजाल इवाखुना ।

१५० ] [ पंचम अध्याय

१५० ] [ पंचम अध्याय
त्रुटिते हृदयग्रन्थौ श्लथे वैराग्यरंहसा ॥६५
कातकं फलमासाद्य यथा वारि प्रसीदति ।
तथा विज्ञानवशतः स्वभावः संप्रसीदति ॥६६
नीरागं निरूपासङ्गं निर्द्वन्द्वं निरुपाश्रयम् ।
विनिर्याति मनो मोहाद्विहगः पञ्जरादिव ॥६७
शान्तसंदेहदौरात्म्यं गतकौतुकविभ्रमम् ।
परिपूर्णान्तरं चेतः पूर्णेन्दुरिव राजते ॥६८
जो चित्तत्वहीन परम पद को पा चुके हैं और जो संकल्प जाल
को व्यर्थ कर चुके हैं, वे दोषों से मुक्त हो जाते हैं और ब्रह्म को प्राप्त
करते हैं। जो मन को त्यागकर विमनस्क हो गये हैं, उनका शान्त चित्त
उनकी मेधा को प्रवृद्ध करता है। जिनके मन की वृत्तियां नष्ट हो चुकी
हैं और मानसिक संकल्पों के त्याग का अभ्यास करने से जिनका मन
परिपक्व हो चुका है तथा जो वेदान्त के विचार में मननपूर्वक लगे
रहते हैं, जो मुमुक्षुरूप से देय और उपादेय दोनों प्रकार के पदार्थों का
त्याग करते हैं, जो नित्य द्रष्टा और प्रपंच को न देखने वाले अद्रष्टा हैं,
जो जानने योग्य परम तत्व में लगे रहकर जीवित हैं, जो रसमय तथा रस-
हीन पदार्थों के प्रति अत्यन्त वैराग्य धारणपूर्वक मोहात्मक जगत के पथ
में सुषुप्त बने हुये हैं, जिन्होंने वैराग्य की प्रबलता के कारण सांसारिक
वासनाओं का सुनहरा पाश छिन्न-भिन्न कर डाला है और जिनके हृदय
की गाँठ ढीली हो गई हैं, ऐसे ज्ञानी अपने स्वभाव के द्वारा उसी प्रकार
शुद्ध हो जाते हैं, जैसे निर्मली फल से जल शुद्ध हो जाता है। जब वह मन
पिंजड़े से मुक्त हुये पक्षी के समान मोह पाश से मुक्त हो जाता है तब
अनासक्त, द्वन्द्वातीत, निरालम्ब और राग-रहित हो जाता है। जिनका
दुरात्मभाव शान्त हो चुका है और जो प्रपंचात्मक विचार से विरक्त हो

महोपनिषत् [ १५१
चुके हैं, उनका चित्त पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान सब प्रकार से शोभा
पाता है ॥ ६०-६८ ॥
नाहं न चान्यदस्तीह ब्रह्मैवास्मि निरामयम् ।
इत्यं सदसतोर्मध्यं यः पश्यति स पश्यति ॥६९
अयत्नोपनतेष्वक्षिहग्द्रव्येषु यथाः मनः ।
नीरागमेव पतित तद्वत् कायषु धीरधोः ॥७०
परिज्ञायोपमुक्तो हि भोगो भवति तुष्टये ।
विज्ञाय सेवितश्चोरो मैत्रीमेयि न चोरताम् ॥७१
अशङ्किताऽपि संप्राप्ता ग्रामयात्रा यथाऽध्वगैः ।
प्रेक्ष्यते तद्वदेव ज्ञैर्भोगश्रीरवलोक्यते ॥७२
मनसो निगृहीतस्य लीलाभोगोऽल्पकोऽपि यः ।
तमेबालब्धविस्तारं क्लिष्टत्वाद्बहुमन्यते ॥७३
बन्धमुक्तो महीपालो ग्रासमात्रेण तुष्यति ।
परैरबद्धो नाक्रान्तो न राष्ट्रं बहु मन्यते ॥७४
हस्तं हस्तेन संपीज्य दन्तैर्दन्तान् रिचूर्ण्य च ।
अङ्गान्यङ्गैरिवाक्रम्य जयेदादौ स्वकं मनः ॥७५
मनसो विजयान्नान्या गतिरस्ति भवार्णवे ।
महानरकसाम्राज्ये मत्तदुष्कृतवारणाः ।
आकाशरशलाकाढ्या दुर्जया हीन्द्रियारयः ॥७६
प्रक्षीणचित्तदर्पस्य निगृहीतेन्द्रियद्विषः ।
पद्मिन्य इव हेमन्ते क्षीयन्ते भोगवासनाः ॥७७
तावन्निशीव वेताला वल्गन्ति हृदि वासनाः ।
एकतत्त्वदृढाभ्यासाद्यावन्न विजितं मनः ॥७८
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

१५२ ] [ पंचम अध्याय

१५२ ] [ पंचम अध्याय
भृत्योऽभिमतकर्तृत्वान्मन्त्री सर्वार्थकारणात् ।
सामन्तश्चेन्द्रियाक्रान्तेर्मनो मन्ये विवेकिनः ॥७९
लालनात् स्निग्धललना पालनात् पालकः पिता ।
सुहृदुत्तमविन्यासान्मनो मन्ये मनीषिणः ॥८०
स्वालोकितः शास्त्रदृशा स्वबुद्ध्या स्वानुभावितः ।
प्रयच्छति परां सिद्धिं त्यक्त्वाऽऽत्मानं मनः पिता ॥८१
सुदृष्टः सुहृदः स्वच्छः सुक्रान्तः सुप्रबोधितः ।
स्वगुणोनोजितो भाति हृदि हृद्यो मनोमणिः ॥८२
एनं मनोमणिं ब्रह्मन् बहुपङ्ककलङ्कितम् ।
विवेकवारिणा सिद्ध्यै प्रक्षाल्यालोकवान् भव ॥८३
विवेकं परमाश्रित्य बुद्ध्या सत्यमवेक्ष्य च ।
इन्द्रियारीनलं छित्त्वा तीर्णो भव भवार्णवात् ॥८४
जो मनुष्य सत् असत् के मध्य से इस प्रकार देखता है कि न
मैं यहाँ हूँ तथा अन्य कुछ भी यहाँ नहीं है, मैं सम्पूर्ण दोषों से रहित
ब्रह्म हूँ वही यथार्थ देखने वाला है। जैसे दर्शन, दृष्टा और दृश्यों की
ओर बिना राग के ही मन खिंच जाता है, वैसे ही ज्ञानीजन बिना राग
के ही कर्तव्य-कर्म करते रहते हैं। जैसे अनुगृहीत चोर चौर्यकर्म को
त्यागकर मैत्री निभाहता है, वैसे ही भले प्रकार विचार कर भोगा हुआ
भोग संतुष्टि का कारण बनता है। जिस गाँव में जाने की कभी इच्छा
भी नहीं की थी, उस गाँव के मार्ग पर अकस्मात आ जाने पर जिस
प्रकार राहगीर उस मार्ग को देखता हुआ आश्चर्यान्वित होता है, उसी
प्रकार ज्ञानी पुरुष भोगात्मक ऐश्वर्यों को आश्चर्य से देखते हैं। नियंत्रित
मन थोड़े से भोग को ही बहुत अधिक समझता हुआ उसे क्लेशप्रद
मानकर पीछा छुड़ाना चाहता है। जिस राजा के लिए शत्रु द्वारा आक्रांत
न होने पर राज्य के सभी भोग तुच्छ बने रहते हैं, वही राजा शत्रु के

बन्धन से छूटने पर भोजन के एक ग्रास से ही तृप्त हो जाता है। हाथ से
हाथ को मलकर, दांत से दांत को चबाकर और अङ्गों से अङ्गों को
भींचकर पूर्ण पराक्रम द्वारा मन को जीतने का यत्न करो। इस विश्व
रूप सागर में मन को जीतने से बढ़कर अन्य कोई उपाय नहीं है। इस
घोर नरक में दुष्कर्म रूपी मदोन्मत्त गजराज विचरण कर रहे हैं। आशा
-रूपी अस्त्रों से सुसज्जित इन्द्रियरूप शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना
अत्यन्त कठिन है। जो चित्त के अहङ्कार का दमन करते हैं और इन्द्रिय-
रूप शत्रुओं को जीत चुके हैं उनकी भोगलिप्सा हेमन्त में कमल क्षुप के
नष्ट होने के समान ही नष्ट हो जाती है। वेतालरूपी वासना हृदय में
तभी तक टिक सकती है, जब तक मन की एकाग्रता के अभ्यास द्वारा
उस पर नियन्त्रण नहीं कर लिया जाता। विवेकी पुरुष अपने मन को
भृत्य के समान आज्ञाकारी बना लेते हैं, वह उनके सभी प्रयोजनों का
मन्त्री के समान पालन करते हैं। मैं समझता हूँ कि वह सम्पूर्ण इन्द्रियों
को वशीभूत कर लेता है इसलिए सामन्त के समान भी है। मनन करने
वाले पुरुष का मन लालन करने से स्नेहमयी ललना के समान और
पालन करने से पिता के समान है। शास्त्र की अनुकूलता से और आत्मा-
नुभव से प्राप्त प्रकाश और बुद्धि के द्वारा मन रूपी पिता परम सिद्धि का
देने वाला है। आत्म गुणों से तेजस्विता को प्राप्त हुआ मन रूपी मणि
हृदय में शोभा पा रहा है। यह सुदृढ़, स्वच्छ, अत्यन्त हृष्ट, भले प्रकार
चैतन्य तथा भली भांति नियन्त्रित है। यह विभिन्न प्रकार के कीचड़ों
से मलीनता को प्राप्त हो रहा है। हे पुत्र ! इस मन रूपी मणि को
विवेक रूपी जल से स्वच्छ कर डालो। यही तुम्हें तेजस्विता प्रदान
करेगी। विवेक के आश्रय से बुद्धि को सत्य का साक्षात् करने में
लगाओ, इस उपाय से तुम्हारे इन्द्रिय रूपी शत्रु पूर्णतः छिन्न-भिन्न हो
जायेंगे और इसके फलस्वरूप तुम इस विश्व समुद्र से पार हो
पाओगे ॥ ६१–८४ ॥

१५४ ] [ पंचम अध्याय

१५४ ] [ पंचम अध्याय
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
आस्थामात्रमनन्तानां दुःखानामाकरं विदुः ।
अनास्थामात्रमभितः सुखानामालयं विदुः ॥८५
वासनातन्तुबद्धोऽयं लोको विपरिवर्तते ।
सा प्रसिद्धाऽतिदुःखाय सुखायोच्छेदमागता ॥८६
धीरोऽप्यतिबहुज्ञोऽपि कुलजोऽपि महानपि ।
तृष्णया बध्यते जन्तुः सिंहः शृङ्खलया यथा ॥८७
परमं पौरुषं यत्नमास्थायादाय सूक्ष्मम् ।
यथाशास्त्रमनुद्वेगमाचरन् को न सिद्धिभाक् ॥८८ .
अहं सर्वमिदं विश्वं परमात्माऽहमच्युतः ।
नान्यदस्तीति संवित्त्या पर [ प्रथ ] मा सा ह्यहंकृतिः ॥८९
सर्वस्माद्व्यतिरिक्तोऽहं वालाग्रादप्यहं तनुः ।
इति या संविदो ब्रह्मन् द्वितीयाऽहंकृति शुभा ॥६०
मोक्षायैषा न बन्धाय जीवन्मुक्तस्य विद्यते ॥६१
पाणिपादादिमात्रोऽयमह मित्येष निश्चयः ।
अहंकारस्तृतीयोऽसौ लौकिकस्तुच्छ एव सः ॥६२
वर्ज्य इव दुरात्माऽसौ कन्दः संसारदुस्तरोः ।
अनेनाभिहतो जन्तुरधोऽधः परिधावति ॥६३
अनया दुरहंकृत्या भावात् संत्यक्तया चिरम् ।
शिष्टाहङ्कारवान् जन्तुः शमवान् याति मुक्तताम् ॥६४
प्रथमो द्वावहङ्कारावङ्गीकृत्य त्वलौकिकौ ।
तृतीयाऽहंकृतिस्त्याज्या लौकिकी दुःखदायिनी ॥६५
अथ ते अपि संत्यज्य सर्वाहंकृतिवर्जितः ।
स तिष्ठते तथाऽत्युच्चैः परमेवाधिरोहति ॥६६
संसार में आशा ही अनन्त दुःखों को उत्पन्न करने वाली है,
केवल अनास्था ही सुख का सदन समझना चाहिए । वासना के सूत्र-
बन्धन में बँधा हुआ यह विश्व पुनः-पुनः प्रकट होता है । वह वासना

महोपनिषत् ] [ १५५
अत्यन्त दुःखदायिनी होती हुई समस्त सुखों को समूल नष्ट करने वाली
होकर आती है। वासना के पाश में अत्यन्त धीर, वीर कुलीन, महान्
अथवा बहुश्रुत भी वैसे ही बंध जाते हैं, जैसे जंजीरों में सिंह बँध जाता
है। ऐसा कौन-सा पुरुष है जो शास्त्रानुकूल आचरण और श्रेष्ठ कामों को
करता हुआ भी सिद्धि को प्राप्त नहीं होता ? मैं सम्पूर्ण विश्वस्वरूप हूँ,
अच्युत परमात्मा हूँ, मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है, इस प्रकार का
ज्ञानात्मक अहंभाव श्रेय माना गया है। 'मैं बाल के अग्रभाग से भी
अत्यन्त सूक्ष्म हूँ और सम्पूर्ण प्रपंच से परे हूँ' इस प्रकार का अहङ्कारयुक्त
भाव मुक्ति देने वाला है, बन्धन प्राप्त कराने वाला नहीं। जीवन्मुक्त
पुरुष ही ऐसे अहंभाव से युक्त होते हैं। 'मैं हाथ-पांव आदि सहित
शरीर वाला हूँ' यह लौकिक अहंकार अत्यन्त तुच्छ श्रेणी का है।
अहङ्कार से ओत-प्रोत दुरात्मभाव वाला प्राणी ही दुःखदायी संसार-वृक्ष
की जड़ है। इसके द्वारा ताड़ित जीव नीचे गर्त की ओर ही जाता है।
इस तृतीय प्रकार के दुःखदायी अहङ्कार को छोड़कर श्रेष्ठ अहंभाव में
लगने वाला प्राणी शमवान् होता हुआ कल्याण को पाता है। प्रारम्भ
में प्रथम दो अहंभावों में लगकर तीसरे प्रकार के अहंभाव का त्याग
करे और जैसे ही साधन शक्ति बढ़े, वैसे ही उन दोनों का भी त्याग
कर निरहंकार वृत्ति धारण करे, इससे ही उच्च पद की प्राप्ति
सम्भव है ॥८५-६६॥
भोगेच्छामात्र को बन्धस्तत्त्यागो मोक्ष उच्यते ।
मनसोऽभ्युदतो नाशो मनोनाशो महोदयः ।
ज्ञमनो नाशमभ्येति मनोऽज्ञस्य हि शृंखला । ६७
नानन्दं ननिरानन्दं नचलं नाचलं स्थिरम् ।
नसन्नासन्न चैतेषां मध्यं ज्ञाननिमनो विदुः ॥६८
यथा सौक्ष्म्याच्चिदाभास्य आकाशो नोपलक्ष्यते ।
तथा निरंशश्चिद्भावः सर्वगोऽपि न लक्ष्यते ॥६६

१५६ ] [ पंचम अध्याय

१५६ ] [ पंचम अध्याय
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सर्वसंकल्परहिता सर्व संज्ञाविवर्जिता ।
सैषा चिदविनाशात्मा स्वात्मेत्यादिकृताभिधा ॥१००
आकाशशतभागाच्छा ज्ञेषु निष्कलरूपिणी ।
सकलाऽमलसंसारस्वरूपैकात्मदर्शिनी ॥१०१
नास्तमेति न चोदेति नोत्तिष्ठति न तिष्ठति ।
न च याति न चायाति न च नेह न चेह चित् ॥१०२
सैषा चिदमलाकारा निर्विकल्पा निरास्पदा ॥१०३
आदौ शमदमप्रायैर्गुणैः शिष्यं विशोधयेत् ।
पश्चात् सर्वमिदं ब्रह्म शुद्धस्त्वमिति बोधयेत् ॥१०४
अज्ञस्यार्ध प्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत् ।
महानरकजालेषु स तेन विनियोजितः ॥१०५
प्रबुद्धबुद्धेः प्रक्षीणभोगेच्छस्य निराशिषः ।
नास्त्यविद्या मलमिति प्राज्ञस्तूपदिशेद्गुरुः ॥१०६
सति दीप इवालोकः सत्यर्क इव वासरः ।
सति पुष्प इवामोदश्चिति सत्यां जगत्तथा ॥१०७
किसी प्रकार की भी भोगेच्छा हो, वह बन्धन स्वरूप ही है और
भोगेच्छा का त्याग ही मुक्ति है। मन का नाश ही मनोन्नति का कारण
है। मन का नाश भाग्यवान पुरुषों का ही होता है। ज्ञानी पुरुषों का
मन नष्ट हो जाता है। ज्ञानी जन मन को न तो आनन्द मानते हैं
और न आनन्दरहित । वे उसे चल, अचल, स्थिर, सत्, असत् अथवा
उसके मध्य की अवस्था वाला भी नहीं मानते, परन्तु अज्ञानी जन मन
के बन्धन में पड़े रहते हैं। सभी संकल्पों से परे और सब संज्ञाओं से
रहित इस चिदात्मा को अविनाशी एवं स्वात्मा आदि कहा गया है।
यह अखण्ड चेतन सत्ता सर्वव्याप्त होते हुए भी उसी प्रकार दिखाई नहीं
देती जिस प्रकार चित् में स्थित आकाश सूक्ष्मता के कारण परिलक्षित
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

महोपनिषत् ] [ १५७
नहीं होता। ज्ञानी जन जिस चित्, चेतन सत्ता को आकाश से भी
शतशः स्वच्छ और अवयवरहित देखते हैं, वह सम्पूर्ण निर्मल विश्व
के रूप में केवल स्वयं को ही दिखाती है। वह सत्ता कभी उदय या
अस्त को प्राप्त नहीं, वह गमनागमन से रहित है, न स्थिर रहती
है और न उठती-बैठती है। वह वहां है न यहाँ है। वह तो अवलम्ब-
रहित और विकल्परहित है। उसका स्वरूप निर्मल है। शम-दम आदि
गुणों के द्वारा शिष्य के अन्तःकरण को शुद्ध करना गुरु का कर्तव्य है।
फिर उसे ब्रह्मस्वरूप का बोध कराना चाहिए कि 'यह सब कुछ और
तुम भी ब्रह्म रूप हो।' जो ज्ञान रहित तथा अर्द्ध विकसित बुद्धि वाला
है उसके समक्ष 'सब कुछ ब्रह्म है' ऐसा कहना उसे नरक रूप में ही
धक्का देने के समान है। वेदान्त का उपदेश तो उसे ही देना चाहिए
जिसकी भोगेच्छा नष्ट होकर बुद्धि जाग्रत हो गई है। जैसे दीपक से
प्रकाश सम्भव है, सूर्योदय होने पर ही दिन की स्थिति है और पुष्प
से ही सुगन्ध निकल सकती है वैसे चित्-चेतन से संसार स्थित है।
यथार्थ में तो इस संसार का अस्तित्व है ही नहीं, यह तो केवल आभास
मात्र है। जब तुम्हारी दृष्टि आवरण रहित हो जायेगी और उसमें ज्ञान
का प्रकाश भर जायगा, तब तुम स्वयं ही अपने रूप में स्थित हो
जाओगे। उसी समय तुम्हें मेरे उपदेश की सार-असारता का भले प्रकार
ज्ञान हो सकेगा ॥६७-१०७॥
प्रतिभासत एवेदं न जगत् परमार्थतः ।
ज्ञानदृष्टौ प्रसन्नायां प्रबोधे विततोदये ॥१०८
यथावज्ज्ञास्यसि स्वस्थो मद्वाग्वृष्टिबलाबलम् ।
अविद्ययैवोत्तमया स्वार्थनाशोद्यमार्थया ॥१०६
विद्या संप्राप्यते ब्रह्मन् सर्वदोषापहारिणी ।
शाम्यति ह्यस्त्रमस्त्रेण मलेन क्षाल्यते मलम् ॥११०
शमं विषं विषेणैति रिपुणा हन्यते रिपुः ।

१५८ ] [महोपनिषत्
ईदृशी भूतसायेयं या स्वनाशेन हर्षदा ॥१११
न लक्ष्यते स्वभावोऽस्या वीक्ष्यमाणैव नश्यति ।
नास्त्येषा परमार्थेनेत्येवं भावनयेद्धया ॥११२
सर्वं ब्रह्मेति यस्यान्तर्भाविना सा हि मुक्तिदा ।
भेदद्रष्टिरविद्येयं सर्वथा तां विसर्जयेत् ॥११३
श्रेष्ठ अविद्या स्वार्थ को नष्ट करने के लिये ही उद्यत है,
उसी के द्वारा सर्वदोषनाशिनी विद्या प्राप्त होती है । अस्त्र ही अस्त्र
को काटता है और मल से ही मल घुलता है । विष ही विष को नष्ट
करने वाला है, शत्रु ही शत्रु का संहार करता है । इसी प्रकार यह भूत
माया अपने ही नाश द्वारा प्रसन्न होती है । इसका स्वरूप दृष्टिगोचर
नहीं होता । जब यह दिखाई देती है, तभी नाश को प्राप्त होती है ।
परन्तु इसे माया न मानकर सब कुछ ब्रह्म मानना ही मोक्ष प्राप्ति का
साधन है । भेद का दिखाई देना ही अविद्या है, इसलिए भेद-दृष्टि का
त्याग करना ही श्रेयस्कर है ॥१०८-११३॥
मुने नासाद्यते तद्धि पदमक्षयमुच्यते ।
कुतो जातेयमिति ते द्विज माऽस्तु विचारणा ॥११४
इमां कथ महं हन्मीत्येषा तेऽस्तु विचारणा ।
अस्तं गतायां क्षीणायामस्यां ज्ञास्यसि तत् पदम् ॥११५
यत एषा यथा चैषा यथा नष्टेत्यखण्डितम् ।
तदस्या रोगशालाया तत्नं कुरु चिकित्सने ॥११६
यथैषा जन्मदुःखेषु न भूयस्त्वां नियोक्ष्यति ।
स्वात्मनि स्वपरिस्पन्दैः स्फुरत्यच्छेश्चिदर्णवः ॥११७
एकात्मकमखण्डं तदित्यन्तर्भाव्यतां दृढम् ।
किंचित्क्षुभितरूपा सा चिच्छक्तिश्चिन्महार्णवे ॥११८
तन्मयैव स्फुरत्यच्छा तत्रैवोर्मिरिवार्णवे ।
आत्मन्येवात्मना ऽम्भोरित्न यथा सरति मारुतः ॥११९॥

महोपनिषत् ] [ १५६
तथैवात्माऽऽत्मशक्त्यैव स्वात्मन्येवेति लोलताम् ।
क्षणं स्फुरित सा देवी सर्वशक्तितया तथा ॥१२०
देशकालक्रियाशक्तिं यस्याः संप्रकर्षति ।
स्वस्वभावं विदित्वोच्चैरप्यनन्तपदे स्थिता ॥१२१
रूपं परिमितेनासौ भावयत्यविभाविता ।
यदैवं भावितं रूपं तया परमकान्तया ॥१२२
तदैवैनामनुगता नामसंख्यादिका दृशः ।
विकल्पकलिताकारं देशकालक्रियाऽऽस्पदम् ॥१२३
चितो रूपमिदं ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कथ्यते ।
वासनाः कल्पयन् सोऽपि यात्यहंकारतां पुनः ॥१२४
अहङ्कारो विनिर्णॆता कलङ्की बुद्धिरुच्यते ।
बुद्धिः सङ्कल्पितकारा प्रयाति मननास्पदम् ॥१२५
मनो घनविकल्पं तु गच्छतीन्द्रियतां शनैः ।
पाणिपादमयं देहमिन्द्रियाणि विदुर्बुधाः ॥१२६
एवं जीवो हि संकल्पवासनारज्जुवेष्टितः ।
दुःखजालपरीतात्मा क्रमादायाति नोचताम् ॥१२७
इति शक्तिमयं चेतो घनाहंकारतां गतम् ।
कोशकारक्रमिरिव स्वेच्छया याति बन्धनम् ॥१२८
स्वसंकल्पिततन्मात्रजालाभ्यन्तरवर्ति च ।
परां विवशतामेति शृंखलाबद्धसिंहवत् ॥१२९
क्वचिन्मनः क्वचिद्बुद्धिः क्वचिज्ज्ञानं क्वचित् क्रिया ।
क्वचिदेतहंकारः क्वचिच्चित्तमिति स्मृतम् ॥१३०
क्वचित् प्रकृतिरित्युक्तं क्वचिन्मायेति कल्पितम् ।
क्वचिन्मलमिति प्रोक्तं क्वचित् कर्मेति स स्मृतम् ॥१३१॥
क्वचित्बन्ध इति ख्यातं क्वचित् पुर्यष्टकं स्मृतम् ।
प्रोक्तं क्वचिदविद्येति क्वचिदिच्छेति संमतम् ॥१३२

१६० ] [ ... अध्याय

१६० ] [ ... अध्याय
इमं संसारमखिलमाशापाशविधायकम् ।
दधदन्तः फलैर्हीनं वटधाना वटं यथा ॥१३३
हे पुत्र ! जो प्राप्त नहीं होता वह अक्षयपद कहा जाता है । माया
की उत्पत्ति किसके द्वारा हुई, तुम्हें इसका विचार नहीं करना है । तुम्हें
तो इस पर विचार करना चाहिये कि मैं इस माया को कैसे नष्ट करूँ ?
जब यह क्षीण होकर नष्ट हो जाय, तभी अक्षय पद का ज्ञान पा सकोगे ।
यह जहाँ से प्रकट होती है, इसका जैसा स्वरूप है, जैसे यह नष्ट होगी
इसका विचार करते हुये इस रोग के मूल की ही चिकित्सा करनी चाहिए,
जिससे यह तुम्हें बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में न डाले और चित् रूपी
समुद्र स्वयं में विभासित हो उठे । अपने अन्तर में यह दृढ़ भावना करे
कि यह चित् सत्ता एक अखण्ड रूप की है । वह चित्-शक्ति चिन्मय रूप
सागर में स्वल्प क्षोभ युक्त हो रही है । समुद्र में निर्मल चिन्मय तरंग ही
लहरों के समान उठ रही हैं । वायु जैसे स्वयं ही आकाश सरोवर में
लहरें मारता है, वैसे ही स्वात्मा में आत्मा तरङ्गित होता है । सर्व
शक्ति सम्पन्नता के कारण ऐसी दिव्य स्फुरण क्षण भर के लिये होती
है । जिस आत्मशक्ति को चलायमान करने में देश-काल और क्रियाशक्ति
असमर्थ रहती है, वह आत्मशक्ति उच्च अनन्त पद में अवस्थित है । वह
चित्-शक्ति जानी नहीं जाने से परिमित-सी होकर रूप-भावना वाली
होती है । उस परम शक्ति में जब रूप की भावना होती है, तब उसके
साथ नाम और संख्या आदि लग जाती है । चित् शक्ति का वह रूप देश,
काल और क्रिया का आधार भूत है तथा विकल्प के रूप का धारण करने
वाला है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है । फिर वह भी वासनाओं की कल्पना
से अहंकार का धारक होता है । निश्चयात्मक एवम् दोषयुक्त हुआ
अहंभाव ही बुद्धि कहा जाता है । वही बुद्धि जब सङ्कल्प का रूप धारण
करती है तब मन रूप हो जाती है और मन जब घोर विकल्प में पड़
जाती है, तब धीरे-धीरे इन्द्रिय रूप को प्राप्त होता है । मेधावी जन

महोपनिषद् [ १६१

हाथ-पांव युक्त देह को ही इन्द्रिय बताते हैं। इस प्रकार सङ्कल्प और
वासना की रस्सी में बँध जाने पर प्राणी दुःख-पास में फँस कर अधोगति
को पाता है। जैसे रेशम बनाने वाला कीड़ा अपनी इच्छा से बन्धन में
पड़ता है, वैसे ही शक्तिमय चित् घोर अहम्भाव को प्राप्त होकर बन्धन में
पड़ जाता है। जंजीर में जकड़े हुये सिंह के समान अपने द्वारा ही
कल्पित तन्मात्र रूपी पाश में रहकर यह चित्-शक्ति नितांत विवश हो
जाती है। यह आत्मा ही कहीं अहंकार रूप से और कहीं चित् के नाम
से जाना जाता है। उसे ही कहीं मन, कहीं बुद्धि और कहीं ज्ञान कहा
गया है। वही कहीं क्रिया है, कहीं प्रकृति और मन कहा जाता है।
इसे कहीं पुर्यष्टक और कहीं बन्धन कहा गया है। यह कहीं इच्छा है
तो कहीं अविद्या। यही आशारूप पाश का निर्माता सम्पूर्ण जगत को
वैसे ही धारण करता है, जैसे बिना फल का वट बीज वट के वृक्ष को
धारण करता है ॥ ११४-१३३ ॥

चिन्तानलशिखादग्धं कोपाजगर चर्वितम् ।
कामाब्धिकल्लोलरतं विस्मृतात्मपितामहम् ॥१३४
समुद्धर मनो ब्रह्मन् मातङ्गमिव कर्दमात् ।
एवं जीवाश्चितो भावा भवभावनयाऽऽहिताः ॥१३५
ब्रह्मणा कल्पिताकारा लक्षशोऽप्यथ कोटिशः ।
संख्याऽतीताः पुरा जाता जायन्तेऽद्यापि चाभितः ॥१३६
उत्पत्स्यन्तेऽपि चैवान्ये कणौघा इव निर्झरात् ।
केचित् प्रथमजन्मानः केचिज्जन्मशताधिकाः ॥१३७
केचित् च्चासंख्यजन्मानः केचित् द्वित्रिभवान्तराः ।
केचित् किन्नरगन्धर्वविद्याधरमहोरगाः ॥१३८
केचिदर्केंदुवरुणास्यक्षाधोक्षपद्मजाः ।
केचिद्ब्राह्मणभूपालवैश्यशूद्रगणाः स्थिताः ॥१३९