सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 166

१५८ ] [महोपनिषत्
ईदृशी भूतसायेयं या स्वनाशेन हर्षदा ॥१११
न लक्ष्यते स्वभावोऽस्या वीक्ष्यमाणैव नश्यति ।
नास्त्येषा परमार्थेनेत्येवं भावनयेद्धया ॥११२
सर्वं ब्रह्मेति यस्यान्तर्भाविना सा हि मुक्तिदा ।
भेदद्रष्टिरविद्येयं सर्वथा तां विसर्जयेत् ॥११३
श्रेष्ठ अविद्या स्वार्थ को नष्ट करने के लिये ही उद्यत है,
उसी के द्वारा सर्वदोषनाशिनी विद्या प्राप्त होती है । अस्त्र ही अस्त्र
को काटता है और मल से ही मल घुलता है । विष ही विष को नष्ट
करने वाला है, शत्रु ही शत्रु का संहार करता है । इसी प्रकार यह भूत
माया अपने ही नाश द्वारा प्रसन्न होती है । इसका स्वरूप दृष्टिगोचर
नहीं होता । जब यह दिखाई देती है, तभी नाश को प्राप्त होती है ।
परन्तु इसे माया न मानकर सब कुछ ब्रह्म मानना ही मोक्ष प्राप्ति का
साधन है । भेद का दिखाई देना ही अविद्या है, इसलिए भेद-दृष्टि का
त्याग करना ही श्रेयस्कर है ॥१०८-११३॥
मुने नासाद्यते तद्धि पदमक्षयमुच्यते ।
कुतो जातेयमिति ते द्विज माऽस्तु विचारणा ॥११४
इमां कथ महं हन्मीत्येषा तेऽस्तु विचारणा ।
अस्तं गतायां क्षीणायामस्यां ज्ञास्यसि तत् पदम् ॥११५
यत एषा यथा चैषा यथा नष्टेत्यखण्डितम् ।
तदस्या रोगशालाया तत्नं कुरु चिकित्सने ॥११६
यथैषा जन्मदुःखेषु न भूयस्त्वां नियोक्ष्यति ।
स्वात्मनि स्वपरिस्पन्दैः स्फुरत्यच्छेश्चिदर्णवः ॥११७
एकात्मकमखण्डं तदित्यन्तर्भाव्यतां दृढम् ।
किंचित्क्षुभितरूपा सा चिच्छक्तिश्चिन्महार्णवे ॥११८
तन्मयैव स्फुरत्यच्छा तत्रैवोर्मिरिवार्णवे ।
आत्मन्येवात्मना ऽम्भोरित्न यथा सरति मारुतः ॥११९॥