१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें१४४ ] [ पंचम अध्याय
परप्रयुक्तेन चिरं प्रयत्नेनावबोधनम् ।
पदार्थभावना नाम षष्टी भवति भूमिका ॥३३
भूमिषट्कचिराभ्यासाद्भेदस्यानुपलम्भनात् ।
यत् स्वभावैकनिष्ठत्वं सा ज्ञेया तुर्यगा गतिः ॥३४
एषा हि जीवन्मुक्तेषु तुर्यावस्थेति विद्यते ।
विदेहमुक्तविषयं तुर्यातीतमतः परम् ॥३५
ये निदाघ महाभागाः सप्तमी भूमिमाश्रिताः ।
श्चात्माऽऽरामा महात्मानस्ते महापद्मागताः ॥३६
जीवन्मुक्ता न मज्जन्ति सुखदुःखरसस्थिते ।
प्रकृतेनाथ कार्येण किंचित् कुर्वन्ति वा न वा ॥३७
पार्श्वस्थबोधिताः सन्तः पूर्वाचारक्रमागतम् ।
आचारमाचरन्त्येव सुप्तबुद्धवदुत्थिताः ॥३८
भूमिकासप्तकं चैतद्धीमतामेव गोचरम् ।
प्राप्य ज्ञानदशामेतां पशुम्लेच्छाऽऽदयोऽपिये ॥३९
सदेहा वाप्यदेहा वा ते मुक्ता नात्र संशयः ।
ज्ञप्तिर्हि ग्रन्थिविच्छेदस्तस्मिन् सति विमुक्तता ॥४०
योग-भूमिकाओं के अनेकानेक भेद ज्ञानियों ने कहे हैं, परन्तु
मैं तो इन सात भूमिकाओं को ही अत्यन्त कल्याणमयी मानता हूँ।
इन सात भूमिकाओं द्वारा प्रकट होने वाला अवबोध ही ज्ञान कहा जाता
है। इन भूमिकाओं के अनन्तर होने वाली मुक्ति को ज्ञेय कहा गया
है। प्रथम ज्ञान-भूमिका का नाम शुभेच्छा है। दूसरी विचारणा, तीसरी
तनुमानसी, चौथी सत्त्वापत्ति और पांचवीं असंसक्ति कही जाती है।
छठवीं को पदार्थभावना और सातवीं को तुर्यगा कहते हैं। इन भूमि-
काओं में पुनः शोक उत्पन्न न होने देने वाली मुक्ति विद्यमान है। मैं
इनका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ। वैराग्य धारण से पूर्व सांसारिक
भ्रमजाल के प्रति ग्लानि उत्पन्न होना और शास्त्रादि के प्रति जिज्ञासा