१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 572 में से
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बिना रङ्ग आदि के और कर्त्ता के आकाश चित्रित हो रहा है। दृष्टा
बिना, निद्रारहित स्वप्न दिखाई देता है। यह चिदात्मा समान रूप से
स्वच्छ, निर्विकल्प, साक्षिरूप तथा दर्पण के समान निर्मल है, उसमें इच्छा
के बिना ही तीनों लोक प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। ब्रह्म सर्व स्वरूप, चिदा-
काश स्वरूप, अखण्डित तथा एक है। ऐसी भावना करने से ही चित्त
की चञ्चलता शान्त होती है। जैसे एक मोटी पाषाण शिला पर रेखा
उपरेखाएँ खिंची होती है, वैसे ही तीनों लोकों से युक्त ब्रह्म के दर्शन
करने चाहिये। किसी अन्य कारण के अभाव में इस विश्व की उत्पत्ति
ही नहीं हुई। चिन्मात्र के सिवा और कुछ नहीं है। ऐसा जानकर इस
सम्पूर्ण सांसारिक माया से विरक्त होकर तथा संशय-रहित होकर केवल
चिन्मात्र के दर्शन करो। अब जो जानना था, वह मैंने जान लिया, जो
देखना था, उसे देख लिया और चिरकाल का थका मांदा मैं अब विश्राम
को प्राप्त हुआ हूँ ॥ ४८—५६॥
निरस्तकल्पनाजालमचित्तत्वं परं पदम् ।
त एव भूमतां प्राप्ताः संशान्ताशेषकिल्विषा ॥६०
महाधियः शान्तधियो ये याता विमनस्कताम् ।
जन्तोः कृतविचारस्य विगलद्वृत्तिचेतसः ॥६१
मननं त्यजतो नित्यं किंचित् परिणतं मनः ।
दृश्यं संत्यजतो हेयमुपादेयमुपेयुषः ॥६२
द्रष्टारं पश्यतो नित्यमद्रष्टारमपश्यतः ।
विज्ञातव्ये परे तत्त्वे जागरुकस्य जीवतः ॥६३
सुप्तस्य घनसंमोहमये संसारवर्त्मनि ।
अत्यन्तपक्ववैराग्यादरसेषु रसेष्वपि ॥६४
संसारवासनाजाले खगजाल इवाखुना ।