सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

महोपनिषत् ] [ १४५

का उदय होना, श्रेष्ठ कर्मों की इच्छा आदि को ही ज्ञानियों ने शुभेच्छा
कहा है । इसके पश्चात् साधु-सङ्ग और शास्त्रों के अध्ययन आदि के
द्वारा अभ्यास वैराग्य से युक्त सदाचरण की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, उसे
ही विचारणा कहा गया है । जब यह अवस्था प्राप्त हो जाती है, तब
विषयों के प्रति अनुराग क्षीण हो जाता है, वह अवस्था तनुमानसी कही
जाती है । जब इन तीनों भूमिकाओं का पूर्ण अभ्यास हो जाता है तब
वैराग्य के प्राबल्य से चित्त शुद्ध सत्व स्वरूप में अवस्थित होता है । उस
अवस्था को ही सत्वापत्ति कहा गया है । इन सब भूमियों का अभ्यास
होने पर जो संसर्गहीन कला सत्वारूढ़ होती है, वही 'असक्ति' है । इन
पाँचों भूमियों का अभ्यास होने पर अपने आत्मा में रमते रहने से और
बाह्याभ्यांतरिक पदार्थों की भावना का नाश होने पर पदार्थ-भावना
होती है। इन छः भूमिकाओं के पूर्ण अभ्यास के अनन्तर भेद-बुद्धि मिट
जाती है और आत्मभाव में ही साधक एकनिष्ठ हो जाता है । उसकी
यह अवस्था तुर्यगा कही गई है । इस अवस्था को जीवन्मुक्त पुरुष ही
प्राप्त होते हैं। इसके पश्चात् विदेह मुक्ति वाली तुर्यातीत अवस्था प्राप्त
होती है । जो अत्यन्त भाग्यशाली तुर्यगा भूमिका को ग्रहण कर लेते हैं,
वे आत्मा में ही रमण करते हैं । ऐसे सन्त महान् पद को प्राप्त हो चुके
हैं, जो जीवन्मुक्त हो गये हैं वे सुख दुःख के अनुभव से नितान्त दूर
रहते हैं । वे कर्तव्य कर्मों में लगकर भी उनमें दूर रहते हैं, उनमें लिप्त
नहीं होते । जैसे अपने साथियों द्वारा जगाये जाने पर मनुष्य सोकर उठ
पड़ता है, वैसे ही वह श्रेष्ठ कर्मों में रत रहकर सनातन आचरण करते
हैं । इन सात भूमिकाओं को मेधावीजन ही जानते हैं । यदि पशु और
म्लेच्छ आदि भी ज्ञान की इन भूमिकाओं को प्राप्त कर लें तो वे भी
देह त्याग के पश्चात् मुक्त हो जाते हैं । हृदयग्रन्थियों का उद्घाटन ही
ज्ञान है, जब इसकी प्राप्ति हो जाती है, तभी मुक्ति प्राप्त हो सकती है
॥२२-४०॥
मृगतृष्णास्बुदद्यादिशान्तिमात्रात्मकसवसौ ।