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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

प्रारंभिक मंगलाचरण एवं परिभाषाएँ (श्लोक १-१०)

श्रीधराचार्यविरचिता
त्रिशतिका
इत्यपराभिधानः
पाटी-गणित-सारः
प्रधान सम्पादक
प्रो० वी० कुटुम्बशास्त्री
कुलपति
राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान मानितविश्वविद्यालय
‘सुक्षेमा’-अनुवाद तथा अनुशीलनकार
डा० सुद्युम्न आचार्य
व्याकरणाचार्य, M.A. (अष्ट-स्वर्णपदक-विजेता) D.Phil.
राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान
(मानित विश्वविद्यालय)
नई दिल्ली

प्रकाशकः
प्रो० वेम्पटि कुटुम्बशास्त्री
कुलपतिः
राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थानम्
(मानितविश्वविद्यालयः)
५६-५७, इन्स्टीट्यूशनल एरिया
जनकपुरी, नवदेहली-११००५८
प्रकाशनव्यवस्थापकः
डॉ० प्रकाश पाण्डेय
सहायकनिदेशकः (शो. एवं प्रका.)
© राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्
प्रथमसंस्करण : २००४
ISBN : 81-86111-09-3
मूल्यम् रु० २२०/-
मुद्रकः
अमर प्रिंटिंग प्रेस
८/२५, विजय नगर, दिल्ली-११०००९

प्ररोचना
प्राचीन भारत के प्रख्यात गणितज्ञ श्रीधराचार्य द्वारा विरचित अङ्कगणित की
पुस्तक पाटीगणित सार के प्रस्तुत संस्करण को विद्वानों विशेषतः आधुनिक शैली
में गणित एवं वाणिज्य के विद्यार्थियों के प्रति समर्पित करते हुए मुझे हार्दिक
प्रसन्नता है। प्राचीन भारतीय विद्वानों की यह विशेषता रही है कि वे पूर्णतः निस्पृह
भाव से बिना अपना विशेष परिचय दिए अपनें चिन्तन, उपलब्धियों एवं ग्रन्थों को
सम्पूर्ण विश्व के उपकारार्थ समर्पित कर देते थे। फलतः आधुनिक इतिहास की
शैली में ठीक-ठीक समय परिचय आदि जानने में बहिरङ्ग प्रमाणों का सहयोग
लेना पड़ता है। श्रीधराचार्य के सम्बन्ध में भी ऐसा ही है। प्रसिद्ध ज्योतिर्विद
शङ्करबालकृष्णदीक्षित ने इनके स्थितिकाल का सम्यक् विवेचन किया एवं ईसवीय
आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध (750) ई० स्थिर किया। इस प्रकार लगभग 1200
वर्ष पूर्व विरचित इस ग्रन्थ की सम्पूर्ण भारत में सभी गणितज्ञों में प्रतिष्ठा रही है।
इस महनीय एवं कालजयी ग्रन्थ के वर्तमान संस्करण को इस प्रकार तैयार किया
गया है जिससे गणित एवं वाणिज्य के विद्यार्थियों को गणित की भारतीय शैली का
सम्यक् परिचय प्राप्त हो कि हमारे पूर्वजों ने कितना गम्भीर कार्य अङ्कगणित के
क्षेत्र में किया है साथ ही उन्हें प्रचलित गणितीय शैली में समझने में सहायता भी
प्राप्त हो।
इस संस्करण के सम्पादक अनुवादक एवं व्याख्याकार डॉ० सुद्युम्न आचार्य
ने परिश्रम पूर्वक गणितीय सूत्रों को हल करते हुए ग्रन्थ को न केवल सुखबोध्य
बनाया है अपितु एक संतुलित एवं अनुसन्धान पूर्ण भूमिका द्वारा ग्रन्थ एवं ग्रन्थकार
का परिचय भी निबद्ध किया है। मैं डॉ० सुद्युम्न आचार्य को साधुवाद देता हूँ।
इस ग्रन्थ की सुन्दर एवं शीघ्र प्रस्तुति के लिए शोध एवं प्रकाशन विभाग
के संचालक डॉ० प्रकाश पाण्डेय एवं अपेक्षित रीति से मुद्रण करने के लिए अमर
प्रिंटिंग प्रैस का वर्धापन करता हूँ।

( iv )
पाठकों से यह अपेक्षा करता हूँ कि वे अपनी प्रतिक्रिया से संस्थान को
अवगत कराएँगे जिससे इस प्रकार के गम्भीर कार्यों की योजनाएँ बनाने में सुविधा
हो तथा विद्वानों को सामग्री उपलब्ध कराने में सहायता प्राप्त हो।
वैशाख शुक्ला पंचमी संस्कृत सेवक
आदि शंकरावतादिवस वेम्पटि कुटुम्बशास्त्री
वैक्रम 2060,
दि० 24 अप्रैल, 2004

भूमिका
प्राचीन भारतीय गणित के आकाश में श्रीधराचार्य एक ज्योतिष्मान् नक्षत्र की
भाँति हैं। इन्होंने गणित-शास्त्र की समृद्धि के लिये प्रथम 'पाटी-गणित' नामक
बृहत् ग्रन्थ की रचना की। तदनन्तर इसकी विषय-वस्तु का संक्षेप करते हुए
'पाटीगणित-सार' अथवा 'त्रिशतिका' का प्रणयन किया। यह तथ्य त्रिशतिका के
प्रथम श्लोक से स्पष्ट है, जिसमें उन्होंने कहा है कि वे स्वविरचित पाटी-गणित
से विषय-वस्तु को लेकर इसके 'सार' की रचना कर रहे हैं।
त्रिशतिका का हस्तलेख अत्यन्त जर्जर, सर्वथा दुरूह तथा भ्रष्ट पाठ की
दशा में म. म. पं. सुधाकर द्विवेदी को प्राप्त हुआ था। इसकी दुरूहता का अनुमान
करने के लिये पृ. 124 में इसके एक पत्रा की छायाप्रति संलग्न की गई है। उन्होंने
अत्यन्त परिश्रम से इस ग्रन्थ का पुनर्लेखन तथा अपनी टिप्पणी आदि से सुसज्जित
करते हुए वर्ष 1899 ई. में इसे प्रकाशित किया। उन्हें बृहत् ग्रन्थ पाटी-गणित का
हस्तलेख प्राप्त नहीं हुआ था।
यह अत्यन्त सौभाग्य का विषय है कि आगे चलकर जम्मू के रघुनाथ
मन्दिर पुस्तकालय से इस बृहत् ग्रन्थ का हस्तलेख भी प्राप्त कर लिया गया। इसे
डा. कृपाशंकर शुक्ल ने वर्ष 1959 ई. में लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा अज्ञातकर्तृक
संस्कृत व्याख्या तथा स्वविरचित इंग्लिश अनुवाद के साथ सुसज्जित करते हुए
प्रकाशित किया। उन्होंने अपनी विस्तृत इंग्लिश भूमिका में ग्रन्थ के विविध पक्षों
पर विस्तार से प्रकाश डाला।
त्रिशतिका का महत्त्व— इसमें कोई सन्देह नहीं कि भारत में ये दोनों ग्रन्थ
सहस्रों वर्षों से पढ़े जाते रहे हैं। फिर भी त्रिशतिका के संक्षिप्त तथा अधिक
सार-गर्भित होने से इसका प्रचार कुछ अधिक ही था। इसीलिये इसके हस्तलेख
भारत के अनेक पुस्तकालयों में उपलब्ध होते हैं। जबकि 'पाटी-गणित' कम
प्रचलित होने से उपरिलिखित एक ही पुस्तकालय में उपलब्ध हुआ है।
त्रिशतिका पर व्याख्याएँ भी अधिक संख्या में लिखी गई थी। इनमें दो
व्याख्याएँ सस्कृत में तथा अन्य तेलगू, कन्नड एवं गुजराती भाषा में परिज्ञात हुई हैं।

( vi )

इसकी गुजराती व्याख्या में श्रीधराचार्य के महत्त्व को प्रकट करने वाला एक सुन्दर
श्लोक इस प्रकार है-
उत्तरतो सुरनिलयं दक्षिणतो मलयपर्वतं यावत्।
प्रागपरोदधिमध्ये नो गणकः श्रीधरादन्यः।।
अर्थात् उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में मलय पर्वत तक तथा
पूर्व तथा पश्चिम समुद्र के बीच श्रीधर से बड़ा कोई दूसरा गणितज्ञ नहीं है।
यह अकेला श्लोक श्रीधराचार्य के प्रचार तथा प्रभाव को आमलय,
आहिमालय सम्पूर्ण भारत में प्रकट करने के लिए पर्याप्त है।
पाटी-गणित के बृहत्काय होने से उसमें स्वभावतः त्रिशतिका के श्लोकों के
अलावा अन्य अनेक सूत्रों तथा अतिरिक्त उदाहरणों का वर्णन है। फिर भी इससे
'त्रिशतिका' का अपना महत्त्व कम नहीं होता। क्योंकि इसमें कुछ ऐसे विषयों का
निरूपण है, जो पाटी-गणित में उपलब्ध नहीं होते। उदाहरणतः, वृत्त-खण्ड का
क्षेत्रफल, गोले का आयतन, शंकु का आयतन आदि रेखा-गणित के अनेक सूत्र
इसमें ही उपलब्ध हैं, पाटी-गणित में नहीं। साथ ही त्रिशतिका उदा. 26, 27, 28
जैसे बहुत से उदाहरण भी केवल इसमें ही प्राप्त होते हैं। ये उदाहरण बहुत
लोकप्रिय हुए हैं। आगे चलकर अनेक गणितज्ञों ने इन्हें उद्धृत किया है।
त्रिशतिका में ऐसे सूत्र भी उपलब्ध हैं, जो पाटी-गणित से अन्य शब्दों में
प्रस्तुत किये गए हैं। प्रस्तुत व्याख्या में ऐसे सूत्रों को तुलना के लिये टिप्पणी में
उद्धृत कर दिया गया है।
त्रिशतिका की प्रस्तुत संस्कृत व्याख्या का भी विषय के निरूपण तथा
तुलना के लिये अपना अलग महत्त्व है।
ग्रन्थ का नामकरण-प्रस्तुत ग्रन्थ का नाम 'त्रिशतिका' है। इसका शाब्दिक
अर्थ 'तीन सौ श्लोकों का समाहार' यह होता है। पर प्रस्तुत ग्रन्थ में इतने श्लोक
नहीं है। अतः एक सम्भावना यह बनती है कि इसके कतिपय श्लोक विलुप्त हो
गए हैं।
इस ग्रन्थ के अन्त में 'त्रिशतिका-पाटी' का समाप्त होना कहा गया है।
बहुत समय से अंक गणित को पाटी गणित कहा जाता रहा है। पाटी अर्थात् तख्ती
पर धूल या अबीर बिछा कर गणित करने की परम्परा रही है। इसीलिये इसे
'धूलि-कर्म' भी कहा जाता रहा है। इन दोनों शब्दों का सर्वप्रथम प्रयोग ब्राह्मस्फुट
सिद्धान्त में तथा पश्चात् लीलावती, सिद्धान्त-शिरोमणि वासना-भाष्य में भी प्राप्त
है। गणित करने की यही पद्धति अरब तथा अन्य देशों में प्रसारित हुई। अतः वहाँ

( vii )
धूलि-कर्म के लिये 'हिसाब-अल्-गुबार' तथा अंकों के लिये 'हरूफ अल् गुबार'
शब्द प्रचलित हुए। यूरोप में भी किसी समय गिनती के लिये छोटे छोटे लट्टू वाली
पाटी का प्रचलन था। इसे इंग्लिश में abacus कहा जाता था। यह शब्द हिब्रू के
धूल अर्थ वाले abak से तथा पाटी अर्थ वाले ग्रीक शब्द abakos से विकसित
हुए थे१।
शब्द बताते हैं कि भारत तथा शेष विश्व के विद्वानों ने कितनी कठिनाइयों
के बीच गणित जैसे शास्त्र का विकास किया था। आधुनिक युग के प्रारम्भ तक
भी असीम विपन्नताओं के मध्य इन विद्वानों ने इन शास्त्रों के विकास का क्रम
जारी रखा था। हींज हैबर द्वारा लिखित 'तारे, मनुष्य और परमाणु' पृ. 73 के
अनुसार- "कैपलर और न्यूटन ने तो प्रकृति के इन नियमों को चिड़ियों के परों से
लिखा था वह भी मोमबत्तियों की रोशनी में। फिर भी इन्हीं के साथ आधुनिक युग
का आरम्भ हुआ था!!"
लेखक का परिचय तथा काल- यह खेद का विषय है कि गणित के
इस विश्रुत लेखक के विषय में हमें अत्यन्त स्वल्प जानकारी प्राप्त है। लेखक ने
स्वयं अपने माता-पिता, जन्म-स्थान आदि के विषय में कुछ नहीं लिखा है।
त्रिशतिका के प्रथम श्लोक से केवल इतना ज्ञात होता है कि वे शैव थे। क्योंकि
उन्होंने शिव को प्रणाम किया है। पाटी-गणित के प्रारम्भ में भी उन्होंने सृष्टि,
स्थिति, संहार के कारण अजन्मा ईश्वर को नमस्कार निवेदित किया है। परवर्ती
लेखकों ने भी श्रीधराचार्य के जीवन-वृत्त के विषय में कोई प्रकाश नहीं डाला है।
इनके काल के विषय में भी अनेक मतभेद हैं। पं. सुधाकर द्विवेदी का
मानना है कि प्रशस्तपादभाष्य के प्रख्यात 'कन्दली' व्याख्याकार श्रीधराचार्य तथा
प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रणेता आचार्य एक ही हैं। कन्दली व्याख्या की रचना उसके
अन्तिम श्लोक के अनुसार 913 शकाब्द में की गई थी। इस प्रकार इसका रचना
काल 991 ई. है।
विश्रुत इतिहासकार डा. ए. बीः कीथ ने बिना किसी परीक्षा या. प्रमाण का
उल्लेख करते हुए यह काल स्वीकार कर लिया है२। डा. ब्रजमोहन आदि विद्वान्
भी इस मत के समर्थक हैं३।


१. देखें Oxford English Dictionary में 'abacus' शब्द
२. History of Sanskrit literature - Dr. A.B.Keith - हिन्दी भाषान्तर पृ. 663.
३. गणित का इतिहास - डा. ब्रजमोहन पृ. 92.

( viii )
पर अन्य अनेक विद्वानों ने इस मत को स्वीकार नहीं किया है। सर्वप्रथम
श्रो शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने सिद्ध किया है कि महावीराचार्य ने गणित
सार-संग्रह में श्रीधर के 'मिश्रक-व्यवहार' से कुछ वाक्य या नियम प्राप्त किये हैं।
इस प्रकार श्रीधर महावीर से पूर्ववर्ती सिद्ध होते हैं¹। आगे चलकर डा. दत्त और
सिंह आदि अनेक विद्वानों ने इस मत का समर्थन करते हुए श्रीधराचार्य को 672
शक या 750 ई. का सिद्ध किया है²। डा. गोरख प्रसाद, डा. सबलसिंह आदि ने
भी इनका यही स्थिति-काल स्वीकार किया है³।
विद्वानों का यह मत युक्तिसंगत प्रतीत होता है। न्याय-कन्दली में व्याख्याकार
ने कुछ स्वरचित ग्रन्थों के नाम बताए हैं। जैसे अद्वय-सिद्धि, तत्त्व-प्रबोध,
तत्त्व-संवादिनी तथा संग्रह-टीका⁴। ये सभी दर्शन-ग्रन्थ हैं। इसमें उनके किसी
गणित के ग्रन्थ का उल्लेख नहीं है।
इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि न्याय-कन्दली के वे विवेचन जहाँ
गणितीय सिद्धान्तों का उल्लेख प्रासंगिक हो सकता है, वहाँ भी व्याख्याकार ने ऐसा
कोई निरूपण प्रस्तुत नहीं किया है। जैसे, परिमाण के उपभेद 'दीर्घ', 'ह्रस्व' आदि
गुणों के प्रसंग में प्रशस्तपादभाष्य की व्याख्या करते हुए कन्दलीकार ने यह सिद्ध
किया है कि द्रव्यों में समवेत दीर्घ, ह्रस्व गुण परस्पर-विरोधी हैं तथा वे अन्य गुणों
की भाँति वस्तुनिष्ठ तथा तत्त्वतः अचर गुण हैं। यदि उसमें प्रेक्षक के भेद से कभी
दीर्घ तथा कभी ह्रस्व की प्रतीति होती है तो वह विरोधी होने से वास्तविक नहीं,
अपितु औपचारिक है⁵। पर गणित में त्रिशतिकाकार ने 'दैर्घ्य' का प्रयोग लम्बाई के
लिये तथा 'विस्तर' का चौड़ाई के लिये किया है⁶। यह दैर्घ्य अन्ततः विस्तर के
सापेक्ष है। 'विस्तर' के बदलने पर दैर्घ्य के प्रयोग में व्यतिक्रम हो सकता है।
उक्त प्रसंग में कन्दलीकार द्वारा गणित के इस तथ्य का उल्लेख हो सकता था।
पर ऐसा न होने से ऐसा नहीं लगता कि कन्दली तथा त्रिशतिका के प्रणेता एक
ही होंगे।
१. भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृ. 230
२. History of Hindu Mathematics, Vol. II
३. भारतीय ज्योतिष का इतिहास - डा. गोरख प्रसाद पृ. 165 तथा Time of Shridharacharya

  • Dr. Sabal Singh, Annals of Bhadarkar O.R.I. Vol. 41, (1950) Page 267
    ४. भारतीय दर्शन-शास्त्र, न्याय वैशेषिक, डा. धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री पृ. 125
    ५. न चैकस्य दीर्घत्वं ह्रस्वत्वं चोभयमपि वास्तवं युक्तम्, विरोधात्-प्रशस्तपादभाष्य, परिमाण-प्रकरण
    पर न्यायकन्दली।
    ६. त्रिशतिका सूत्र श्लोक 53, पृ. 101 उक्त प्रसंग के सभी उद्धरणों के लिये परिशिष्ट 1 में
    'दैर्घ्य' शब्द।

( ix )
उक्त विवेचनाओं के आधार पर प्रायः सभी विद्वान् श्रीधराचार्य को
कन्दलीकार तथा गणितसारसंग्रहकार महावीराचार्य से पूर्ववर्ती मानते हैं। पर
पाटी-गणित के व्याख्याकार डा. कृपाशंकर शुक्ल ने इन्हें कन्दलीकार का पूर्ववर्ती
पर महावीराचार्य का उत्तरवर्ती स्वीकार किया है।
इस विषय में डा. शुक्ल द्वारा प्रस्तुत लगभग सभी तथ्य 'अभाव' प्रमाण पर
अवलम्बित हैं। उनका मानना है कि 'पाटी-गणित' में अनेक रोचक सूत्र वर्तमान
हैं, जो कि गणितसारसंग्रह में उपलब्ध नहीं हैं। यदि महावीर श्रीधर के बाद होते
तो वे उनका उल्लेख अवश्य करते। ऐसा न होने से श्रीधर उत्तरवर्ती सिद्ध होते हैं¹।
पर वास्तव में इस प्रकार के तथ्यों से किसी को पश्चाद्वर्ती प्रमाणित नहीं
किया जा सकता। प्रत्येक लेखक की अपनी शैली होती है। वह अपनी सुविधानुसार
अन्यों के तथ्यों को ग्रहण करता है। महावीर द्वारा श्रीधर के सूत्रों को ग्रहण न
करने से उनकी मौलिकता की प्रवृत्ति सुस्थापित होती है पूर्ववर्तिता नहीं।
`डा. शुक्ल का यह भी मानना है कि श्रीधराचार्य के सूत्र अधिक सही तथा
सूक्ष्मता के अधिक समीप हैं, जबकि महावीर के उतने समीप नहीं हैं। इनसे प्रकट
है कि श्रीधर ने महावीर के सूत्रों के अवलोकन के पश्चात् अपने गम्भीर विचार
के अनन्तर अधिक सूक्ष्मता प्रदान की होगी। इसके लिये उन्होंने गोले के आयतन
के सूत्र का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो इस प्रकार है-
श्रीधराचार्य के अनुसार गोले का आयतन = [(व्यास)³ (1+¹/₁₈)] / 2
⇒ 4 (त्रिज्या)³ (1+¹/₁₈) ⇒ (4.22--) त्रिज्या³
महावीर के अनुसार गोले का आयतन = 9/2 × 9/10 त्रिज्या³ ⇒ 4.05 त्रिज्या³
आधुनिक गणित में गोले का आयतन = (4/3) π त्रिज्या³ ⇒ (4.188) त्रिज्या³
यहाँ स्पष्टतः श्रीधराचार्य का सूत्र आधुनिक मान के अधिक समीप है।
अतः श्रीधर महावीर के पश्चात् हुए होंगे²।
इस विवेचना में कुछ तथ्य सूक्ष्मता से विचारणीय हैं। प्रथम यह कि इस
समय हम आधुनिक मान के साथ तुलना करते हुए किसी पूर्ववर्ती को कम या
अधिक सही सिद्ध कहते हैं। पर उस प्राचीन युग में निश्चय रूप से यह सिद्ध

१. Absence of these interesting rules from an exhaustive work like the Ganit-
Sar-Sangraha cannot be explained unless we assume its preority over the works
of Shridharacharya - Introduction of Pati Ganit by K.S.Shukla. Page 40
२. Ibid Page 18

( x )
करना सम्भव नहीं था कि कौन अधिक परिष्कृत मान है। अतः गणितज्ञ अपने-२
निष्कर्षों के आधार पर अपने मान को अधिक सही समझते थे। हम देखते हैं कि
सबसे पहले आर्यभट ने π का समीपतम मान प्राप्त किया था। पर इनके पश्चात्
श्रीधर तथा महावीर दोनों ने समान रूप से इनकी उपेक्षा करते हुए सुविधा की
दृष्टि से इनसे स्थूल मान √10 को स्वीकार किया है¹। पर इतने मात्र से आर्यभट
को इनसे उत्तरवर्ती तो नहीं कहा जा सकता।
गोले के आयतन के प्रसंग में श्रीधर तथा महावीर में अन्तर इतना कम है
कि उसके आधार पर पूर्ववर्तिता या उत्तरवर्तिता का कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा
सकता। इन दोनों आचार्यों का यह अन्तर भी सूत्र की पद्धति की भिन्नता के कारण
है। प्राचीन गणित में सूक्ष्मतम गणना को ओझल करते हुए अलग-२ पद्धतियों से
मौलिक सूत्र को संकेतित करने की परम्परा रही है। उनका वह संकेतित मौलिक
सूत्र ही पूर्ण महत्त्वशाली होता है। क्योंकि उसकी ही उपपत्ति आदि सम्भव होती
है। इस प्रसंग में मौलिक सूत्र वह है जिसमें पाई अवश्य सम्मिलित हो। इस पाई
के मान को दोनों ही आचार्य समान रूप से √10 स्वीकार करते हैं। इस प्रकार
वे जिस मौलिक सूत्र की ओर संकेत करते हैं, उनमें कोई अन्तर नहीं है। इसे इस
प्रकार प्रकट करते हैं-
श्रीधराचार्य के अनुसार गोले का आयतन = 19/36 × व्यास³
π = √10 = 19/6 = 3.16 का अलग उल्लेख करने पर-
⇒ (3.16 × व्यास³) / 6
गोले के आयतन का मौलिक सूत्र ⇒ (4/3 × 3.16) त्रिज्या³
महावीराचार्य के अनुसार गोले का सूक्ष्म आयतन = 9/10 × 9/2 ( 1/2 व्यास )³
= 9/2 × 9/10 त्रिज्या³
π = √10 = 3.1 का अलग उल्लेख करने पर-
गोले के आयतन का मौलिक सूत्र ⇒ (1.3 × 3.1) त्रिज्या³
इस प्रकार स्पष्टतः दोनों ही आचार्यों के सूत्र एक ही प्रकार की मौलिक
अवधारणा से विकसित हैं। इस प्रकार वे पाई के मान को छोड़कर आधुनिक
गणित के अनुरूप सिद्ध होते हैं। श्रीधर की महनीयता π के सूक्ष्मतम मान को


१. वृत्तक्षेत्रव्यासः दशपदगुणितो भवेत् परिक्षेपः - गणितसारसंग्रह - क्षेत्रगणित व्यवहार, श्लोक
60 यही मान त्रिशतिका सूत्र 45, पृ. 117 में वर्णित है।

अपनाने के कारण है। मौलिक सूत्र में दोनों समान हैं। महावीर ने π के स्थूल
मान को 3 मानते हुए इसके आयतन का स्थूल सूत्र भी विकसित किया है¹। उसमें
भी मौलिक अवधारणा पूर्वोक्त ही है।
त्रिशतिका तथा पूर्ववर्ती गणित- त्रिशतिका से पूर्व भारतीय गणित के
चिन्तन, मनन की एक सुदीर्घ परम्परा रही है। इससे पूर्व वैदिक तथा जैन, बौद्ध
साहित्य में भी अनेक ग्रन्थ निरन्तर विरचित होते रहे थे। त्रिशतिका की इन ग्रन्थों
के साथ तुलना से स्पष्ट विदित होता है कि त्रिशतिकाकार ने इनका अध्ययन किया
था तथा अपनी सुविधा तथा औचित्य के आधार पर इनका उपयोग भी किया था।
उन्होंने एक ओर ईसा पूर्व में विरचित जैन ग्रन्थ स्थानांग सूत्र में वर्णित²गणित के
परिकर्म, व्यवहार आदि विषयों का वर्णन किया है तो दूसरी ओर ब्रह्मगुप्त की
संकलित आदि 20 क्रियाओं तथा 8 व्यवहारों³ को भी यथोचित स्थान दिया है।
संक्षेप में सभी विषयों का प्रतिपादन इनकी अपनी विशेषता है।
त्रिशतिकाकार द्वारा गणित के उज्ज्वल आलोक-स्तम्भ 'आर्यभटीय' के
सूक्ष्म अध्ययन तथा अपने ग्रन्थ में कहीं-२ उसके उपयोग को कुछ शब्दशः
तुलनीय सूत्रों से प्रमाणित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ 'गच्छ' या पद (n) को
ज्ञात करने हेतु सूत्र-
मूलं द्विगुणाद्यूनं स्वोत्तरभाजितं सरूपार्धम्-आर्यभटीय 1.20
तथा-
मूलं द्विगुणमुखोनं सचयद्विचयोद्धृतं गच्छः।
—त्रिशतिका श्लोक 41, पृ. 102
यहाँ आर्यभटीय की शब्दशः छाया देखी जा सकती है। पर उन्होंने सब
जगह आर्यभटीय का अनुकरण नहीं किया है। जैसे आर्यभटीय ने परिधि का
आनुपातिक मान 62832/20,000 अथवा 3.1416 निर्धारित किया है⁴, जो कि
परिशुद्धि के सर्वाधिक समीप मान माना जाता है। पर त्रिशतिकाकार ने 500 ई.
१. व्यासार्धघनार्धगुणा नवगोल-व्यावहारिकं फलम्
तद्दशमांशं नवगुणमशेषसूक्ष्मफलं भवति।। - गणितसारसंग्रह 8.28½
२. परिकम्मं ववहारो रज्जुरासी कलासवत्रे ये
जावन्तावति वग्गो घनो वग्गवग्गो विकप्पोत - स्थानांग सूत्र, 747
३. परिकर्म विंशतिमिमां संकलिताद्यां पृथग्विजानाति।
अष्टौ च व्यवहारान् छायान्तान् भवति गणकः सः।।
४. चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।
अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः। - आर्यभटीय, गणितपाद 1.10

( xii )
पू. में विरचित जैन गणित ग्रन्थ 'सूर्य-प्रज्ञप्ति' से¹ चली आ रही परम्परा के
अनुसार इसका मान √10 निर्धारित किया है। उन्होंने शंकु के आयतन के लिये
इसका मान 3 मानते हुए तथा गोले के आयतन के लिये 3.16 मान स्वीकृत करते
हुए सूत्र विकसित किये हैं। उदा. श्लोक 94 की संस्कृत व्याख्या में बेलन आकार
प्रस्तर-पिण्ड के घनफल को 3.162 मान स्वीकार करते हुए हल किया गया है।
फिर भी हम यह नहीं मान सकते कि त्रिशतिकाकार को आर्यभटीय-प्रोक्त मान
परिज्ञात नहीं था। जब कि D.E. Smith जैसे इतिहासकार अनायास ही इसे मानने
को तैयार हो जाते हैं²। वास्तविकता यह है कि त्रिशतिकाकार आर्यभटीय को
जानकर भी सूत्रों की सुविधा के लिये इससे पूर्व के पारम्परिक मान को स्वीकार
करते हैं।
इस सन्दर्भ में यह भी एक तथ्य है कि त्रिशतिकाकार जिस पूर्ववर्ती सूत्र
को अपनाते हैं, उसे स्वच्छता एवं स्पष्टता प्रदान करते हैं। उदाहरणतः-
(I) 'गच्छ' के प्रसंग में द्विघात समीकरण (quadratic equation) की
विधि की आर्यभटीय से तुलनीयता को अभी ऊपर निरूपित किया गया है। इस
प्रकार इस विधि को मूलतः आर्यभट ने तथा अनन्तर ब्रह्मगुप्त ने प्रस्तुत किया है।
इन सबका अनुशीलन करते हुए त्रिशतिकाकार ने इसे सर्वथा स्पष्ट रूप प्रदान
किया है। अतएव परवर्ती भास्कराचार्य ने लीलावती में इनके ही आधार पर अपना
सूत्र प्रस्तुत किया है³। साथ ही उन्होंने भास्करीय बीजगणित में श्रीधराचार्य के एक
अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'बीज-गणित' (वर्तमान में अनुपलब्ध) से द्विघात-समीकरण
के सम्पूर्ण सूत्र को अविकल उद्धृत करते हुए⁴ उनके ऋण को स्पष्ट रीति से
स्वीकार किया है। अतएव गणित के आधुनिक इतिहासकारों द्वारा वर्ग-समीकरण
के साथ श्रीधराचार्य का नाम जोड़ दिया गया है। स्पष्ट सूत्र प्रदान करने के लिये
श्रीधराचार्य का अवदान अनमोल है। फिर भी वर्ग-समीकरण सूत्र के मौलिक
अन्वेष्टा के रूप में आर्यभटीय, गणितपाद श्लोक 20 में आर्यभट के मूल्यवान्
योगदान को भुलाया नहीं जाना चाहिये।
१. सूर्य प्रज्ञप्ति सूत्र 20
२. As to the ratio of the circumference to the diameter, both ब्रह्मगुप्त and महावीराचार्य
used the old sementic value 3, both giving also √10 as a closer approxima-
tion, and neither one was aware of the works of Archemedes or of Heron.
३. ब्रह्मगुप्त तथा भास्कर के सूत्र के लिये देखें परिशिष्ट 2 में 'गच्छ' शब्द
४. चतुराहतवर्गसमै रूपैः पक्षद्वयं गुणयेत्।
अव्यक्तवर्गरूपैर्युक्तौ पक्षौ ततो मूलम् - भास्करीय बीजगणित पृ. 229 में उद्धृत श्रीधराचार्य
का सूत्र। .

( xiii )
(II) त्रिशतिकाकार ने मूलतः आर्यभटीय से स्पष्ट प्रेरणा प्राप्त करके<sup>१</sup>
त्रिभुज के क्षेत्रफल के लिये सर्वथा स्पष्ट तथा सही सूत्र प्रदान किया है<sup>२</sup>। इसे
आधुनिक गणित में ठीक उसी रूप में स्वीकार किया जाता है। इन्होंने वर्ग तथा
आयत के क्षेत्रफल के लिये भी आर्यभटीय से प्रेरणा प्राप्त करते हुए<sup>३</sup> स्वच्छ तथा
सर्वमान्य नियम विकसित किये<sup>४</sup>।
इन्होंने मूलतः ब्रह्मगुप्त से प्रभावित होकर<sup>५</sup> त्रिभुज तथा चतुर्भुज के क्षेत्रफल
के लिये एक सामान्य सूत्र प्रस्तुत किया है<sup>६</sup>। ब्रह्मगुप्त ने इसे दोनों प्रकार की
आकृतियों के सूक्ष्म क्षेत्रफल के लिये लागू होने वाला सामान्य सूत्र बताया था।
श्रीधर ने इसे स्वीकार करते हुए अपनी पाटी-गणित में विस्तार से यह बताया कि
यह सूत्र समलम्ब तथा सभी विषमलम्ब चतुर्भुज (quadrilaterals with unequal
altitudes) के लिये भी समान रूप से समन्वित होता है<sup>७</sup>।
आगे चलकर इस सूत्र के प्रतिबन्धों का अनुभव कर लिया गया था।
सर्वप्रथम आर्यभट द्वितीय ने इस सूत्र की सभी प्रकार के चतुर्भुजों के प्रति
व्यापकता का स्पष्ट प्रतिषेध किया तथा ऐसा मानने वालों के प्रति बड़े कठोर शब्दों
का प्रयोग किया।<sup>८</sup>
बाद में भास्कराचार्य ने भी इस सूत्र से चतुर्भुज के अस्फुट या अवास्तव
क्षेत्रफल की बात कही<sup>९</sup>। उन्होंने बताया कि भुजाओं की नाप एक समान होने पर
भी उनमें अलग-२ नाप के विकर्ण खींचने से अनेक अनियत आकार के चतुर्भुज
तथा उनके अलग-२ क्षेत्रफल प्राप्त होते हैं<sup>१०</sup>। ऐसी दशा में पूर्वोक्त सूत्र से चक्रीय
तथा अचक्रीय सभी प्रकार के आकारों वाले चतुर्भुज के लिये प्राप्त एक निश्चित
१. त्रिभुजस्य फलं शरीरं समदलकोटी भुजार्धसंवर्गः - आर्यभटीय, गणितपाद 1.6
२. कुदलं च लम्बहतम् - त्रिशतिका सूत्र 43, पृ. 86
३. वर्गः समचतुरश्रः फलं च सदृशद्वयस्य संवर्गः - आर्यभटीय, गणितपाद 1.3
४. समचतुरस्रायतयोर्भुजकोटिहतिः प्रजायते गणितम् - त्रिशतिका सूत्र 42
५. भुजयोगार्धचतुष्टयभुजोनघातात् पदं सूक्ष्मम्। - ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त 12.21
६. त्रिशतिका सूत्र 43।
७. सदृशासमलम्बानामसदृशलम्बे विषमबाहौ - पाटी गणित श्लोक 116
८. कर्णज्ञानेन विना चतुरश्रे लम्बकं फलं यद् वा।
वक्तुं वाञ्छति गणको योऽसौ मूर्खः पिशाचो वा। -महासिद्धान्त 14.70
९. मूलमस्फुटफलं चतुर्भुजे - लीलावती, क्षेत्रव्यवहार श्लोक 19
१०. चतुर्भुजस्यानियतौ हि कर्णौ कथं ततोऽस्मिन्नियतं फलं स्यात्। - लीलावती, क्षेत्रव्यवहार
श्लोक 20

( xiv )
क्षेत्रफल अवास्तव ही होगा। इसलिये आधुनिक गणित में भी इस सूत्र को केवल
चक्रीय चतुर्भुज (cyclie quadrilaterals) के लिये ही समुचित माना जाता है।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि श्रीधर ने अपने सूत्र में किसी प्रतिबन्ध का
उल्लेख तो नहीं किया है। पर उन्होंने सावधानीपूर्वक ऐसे उदाहरण तथा उसके ऐसे
फल का निरूपण किया है, जो चक्रीय चतुर्भुज के लिये सर्वथा सुसंगत है। विषम
लम्ब-चतुर्भुज ब्रह्मगुप्त-प्रमेय द्वारा प्राप्त विकर्णों का प्रयोग करने पर चक्रीय होता
है। श्रीधर ने अपने उदाहरण में अपने सूत्र से जो क्षेत्रफल बताया है, वह उस प्रमेय
से प्राप्त विकर्ण का प्रयोग करने से प्राप्त क्षेत्रफल के ठीक समतुल्य बैठता है।
इससे यह संकेत मिलता है कि श्रीधर अपने सूत्र में प्रतिबन्धों का उल्लेख न करते
हुए भी एक निश्चित नियम द्वारा विकर्ण बनाकर तथा इस प्रकार चक्रीय चतुर्भुज
बनाकर अपने सूत्र को समन्वित करने के प्रति सतर्क थे।
श्रीधराचार्य के मौलिक सूत्र— गणित के क्षेत्र में श्रीधर के ग्रन्थ अत्यन्त
मूल्यवान् हैं। गणित-शास्त्र का विशाल सौध जिन इष्टकाओं से निर्मित है उनमें
इनके ग्रन्थों की चमत्कारी इष्टकाएँ भी यत्र तत्र फैली हुई हैं। उन्होंने ऐसे अनेक
सूत्र प्रदान किये, जो इनसे पहले अपरिज्ञात थे।
उदाहरणतः, गोले के आयतन के लिये उन्होंने सर्वप्रथम सूत्र विकसित
किया। इससे पूर्व आर्यभट ने आर्यभटीय गणितपाद में इसके लिये जो सूत्र प्रस्तुत
किया१, वह आधुनिक गणित के अनुसार सही नहीं है। उन्होंने गोलपाद 3.22 में
ऐसे गोल-काष्ठ का भी वर्णन किया है, जो पारा आदि भरकर निर्मित होने पर
स्वतः सदा गतिशील रहता था। मध्ययुग में विश्व के अनेक देशों में ऐसे शाश्वत
चलित्र के निर्माण में अपार परिश्रम किया गया२। आधुनिक विज्ञान में 'ऊर्जा
संरक्षण नियम' की स्थापना द्वारा यह सिद्ध कर दिया गया है कि कोई भी चक्र
वायु आदि के अवरोध तथा घर्षण-बल आदि की उपस्थिति में स्वतः सदा
गतिशील नहीं रह सकता। अतः ऐसा गोल-काष्ठ काल्पनिक है। पर श्रीधराचार्य
का गोले के आयतन का सूत्र सर्वथा वास्तविक एवं प्रामाणिक है।
श्रीधर ने पूर्ववर्ती विद्वानों का अनुसरण करते हुए अर्धवृत्त के क्षेत्रफल के
सूत्र के सामान्यीकरण द्वारा प्रत्येक वृत्त-खण्ड के लिये सूत्र विकसित किया है।
साथ ही वे इस तथ्य से सर्वथा अवगत थे कि अर्धवृत्त में जीवा तथा शर का जो
अनुपात है, वह अन्य वृत्त-खण्डों का नहीं है। उन्होंने उदा. श्लोक 86 में ब्रह्मगुप्त
के सूत्र के अनुसार 13 जीवा पर 3 शर का बिल्कुल सही प्रमाण बताया है।
१. तन्निजमूलेन हतं घनगोलफलं निरवशेषम्।। —आर्यभटीय, गणितपाद, श्लोक 7
२. द्रष्टव्य-मनोरंजक भौतिकी या.इ.पेरेलमान पृ. 72 तथा आगे

( xvi )
के अन्य प्रसंग में स्तम्भ को आधार बनाकर और भी कठिन प्रश्न विकसित किये
गए हैं।
इनके पश्चात् आर्यभट द्वितीय के 'महा-सिद्धान्त', श्रीपति के 'गणित-तिलक'
तथा नारायण के गणित-कौमुदी आदि में श्रीधर के अनेक सूत्र तथा उदाहरण
शब्दशः प्रस्तुत किये गए हैं। भास्कराचार्य ने तो उनका नाम लेकर अनेक सूत्र और
उदाहरणों में उनका ऋण स्वीकार किया है। उदाहरणतः लीलावती इष्टकर्म के
उदा. 1 के अन्तर्गत 'षड्भागः पाटलासु....' के लिये उन्होंने स्पष्ट कहा है कि यह
श्लोक त्रिशतिका का है। भास्करीय बीजगणित में श्रीधर के वर्ग-समीकरण के
सूत्र को इस भूमिका के पृ.7 में दिखाया जा चुका है।
भास्कराचार्य ने श्रीधर के गणित के इन सूत्रों के आलोक में गणित का
पर्याप्त विकास किया। अभी श्रीधर के जिस वर्ग-समीकरण की चर्चा की गई है,
उसे द्विपद के गुणनफल तथा उसके गुणनखण्डन के बिना भली प्रकार नहीं समझा
जा सकता। अतः उन्होंने इनके लिए स्पष्ट सूत्र प्रस्तुत किये, जो आधुनिक गणित
में खूब प्रचलित हैं।२
त्रिशतिकाकार ने शून्य-परिकर्म के प्रसंग में कहा है कि शून्य को किसी
राशि से गुणा आदि करने पर उसका फल शून्य होता है। आगे तुरत ही यह भी
कहा है कि शून्य से किसी राशि को गुणित करने पर उसका फल भी शून्य होता
है३। इस प्रकार उन्होंने 0 × a तथा a × 0 इन दोनों स्थितियों की परिकल्पना की
है। गुणन के क्रम-विनिमेय गुण के कारण इन दोनों का परिणाम एक ही बताया
है।
उन्होंने पूर्वोक्त प्रथम नियम के साथ 'आदि' का प्रयोग करते हुए यह भी
ध्वनित किया है कि शून्य को किसी राशि से भाग करने पर उसका फल भी शून्य
होता है। अतः 0/a भी सही है। पर उन्होंने गुणन की दोनों स्थितियों के समान भाग
की दोनों स्थितियों की कल्पना नहीं की है। उन्होंने शून्य से किसी राशि को भाग
देने पर उसके परिणाम के विषय में सावधानीपूर्वक कुछ नहीं कहा है। सम्भव है
उन्हें a/0 के अपरिभाष्य होने का आभास रहा है!!
१. वही, प्रकीर्णक व्यवहार, भागसंवर्गजाति में श्लोक 60 तथा भिन्न दृश्य जाति में श्लोक 70
२. खण्डद्वयस्याभिहतिर्द्विनिघ्नी तत्खण्डवर्गैक्ययुता कृतिर्वा - लीलावती, अभिन्नपरिकर्माष्टक
श्लोक 9
३. खस्य गुणनादिके खं संगुणने खेन च खमेव - त्रिशतिका सूत्र 8, पृ. 11

( xv )

उन्होंने इस तथ्य के आलोक में पूर्ववर्ती सूत्र को परिष्कृत करते हुए अधिक सही
सूत्र प्रदान किया है।
इसी प्रकार समलम्ब चतुर्भुज (traperium) के क्षेत्रफल के लिये इन्होंने
सर्वथा मौलिक सूत्र प्रदान किया है। यहाँ 'लम्ब' का प्रयोग भी इनका अपना है।
इसके लिये त्रिशतिका तथा 'पाटी गणित' में कुछ शाब्दिक भिन्नता के साथ सूत्र
प्रदान किये गए हैं१। पर दोनों का भाव एक ही है। आगे चलकर भास्कराचार्य
आदि ने इनसे प्रेरणा प्राप्त करके अपने-२ शब्दों में सूत्र प्रदान किये हैं२। आधुनिक
गणित में इनका यह सूत्र पूरी तरह मान्य है।
केवल त्रिशतिका में प्राप्त कुछ सूत्रों का संक्षिप्त निरूपण इस भूमिका के
IV में किया गया है। सूचीखात का घनफल या शंकु के आयतन के लिये उनका
सूत्र ब्रह्मगुप्त आदि से विलक्षण है३। यद्यपि उनका सूत्र अन्ततः ब्रह्मगुप्त के सूत्र
में ही पर्यवसित होता है। उन्होंने यह सूत्र π=3 मानकर प्रस्तुत किया है। यह
उल्लेख रोचक है कि इस सूत्र को सुविधा जनक मानते हुए भास्कराचार्य ने भी
यहाँ पाई के इस मान को स्वीकार कर लिया है४। यद्यपि वे अन्य सभी जगह इस
का मान 22/7 स्वीकार करते हैं। भास्कराचार्य ने ब्रह्मगुप्त का अनुसरण करते हुए
अन्य सूत्र भी प्रस्तुत किया है५, जो आधुनिक गणित में सर्वथा मान्यता प्राप्त है।
श्रीधर से परवर्ती गणित के लिये प्रेरणाएँ- श्रीधराचार्य के ग्रन्थ ऐसे
आलोक-स्तम्भ की भाँति रहे, जिनके प्रकाश में परवर्ती विद्वानों ने अपनी रचनाएँ
प्रस्तुत कीं। महावीर ने उनसे भाव प्राप्त करके अनेक उदाहरण अपने शब्दों में
प्रस्तुत किये। त्रिशतिका श्लोक 26 की गणितसार-संग्रह 5, 17-22 से तुलना की
जा सकती है। त्रिशतिका उदा. श्लोक 23, 24 तथा 25 में स्तम्भ के आधार पर
गणित के उदाहरण दिये गए हैं। ये भी महावीर के ग्रन्थ से तुलनीय हैं६। इस ग्रन्थ
१. चतुरस्त्रेष्वन्येषु च लम्बगुणं कुमुखयोगार्धम् - त्रिशतिका सूत्र 42, पृ. 83
तथा ⇒ भूवदनसमासार्धं मध्यमलम्बेन संगुणितम् - पाटी गणित सूत्र 115, पृ. 161
२. चतुर्भुजेऽन्यत्र समानलम्बे लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डम्। - लीलावती, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक
23, पृ. 225
३. समभुवि विकीर्णराशेः परिधिषडंशस्य यो भवेद् वर्गः।
सोऽभ्युदयहतो गणितं घनहस्तेऽवस्थितिः खार्याः।। - त्रिशतिका सूत्र 61, पृ. 115
तथा ⇒ क्षेत्रफलं वेधगुणं समखातफलं त्रिभिः सूच्याः - ब्रा.स्फु.सि. 12.44
४. भवति परिधिषष्ठे वर्गिते वेधनिघ्ने घनगणितकराः स्युर्मागधास्ताश्च खार्यः। - लीलावती,
राशिव्यवहार, श्लोक 15, पृ. 31
५. समखातफलत्र्यंशः सूचीखाते फलं भवति - लीलावती, खातव्यवहार श्लोक 3, पृ. 31
६. दृष्टोऽष्टमं पृथिव्यां स्तम्भस्य त्र्यंशको मया तोये।
पादांशः शैवाले कः स्तम्भः सप्त हस्ता खे।। -गणितसारसंग्रह, प्रकीर्णक व्यवहार श्लोक 5

( xvii )
भास्कराचार्य ने इस सम्पूर्ण स्थिति के गहन अध्ययन के पश्चात् a/0 = ∞
बताया है तथा इसे ‘खहर’ यह विशिष्ट नाम दिया है¹। निश्चय ही उन्हें इस
परिणाम तक पहुँचने के लिये ब्रह्मगुप्त के तच्छेद तथा त्रिशतिका की इस
अपरिभाष्यता से प्रेरणा प्राप्त हुई होगी।
परवर्ती गणित के लिये श्रीधर की देन के सन्दर्भ में यह उल्लेख सुखद है
कि उनकी सम्पूर्ण त्रिशतिका में वृत्त-खण्ड के क्षेत्रफल तथा π के मान को
छोड़कर सभी सूत्रों को आधुनिक गणित के सूत्रों के समकक्ष सिद्ध किया जा
सकता है। उनका वृत्त-खण्ड के क्षेत्रफल का सूत्र भी पूर्ववर्ती जैन-गणित तथा
पश्चाद्वर्ती महावीर आदि से अधिक सही है। पर वह त्रिज्या-खण्ड के क्षेत्रफल
के समावेश के बिना सर्वथा सही सिद्ध नहीं हो पाया है। श्रीधर ने पाई के मान
√10 को भी सूक्ष्मतम स्तर तक प्राप्त किया है। पर वह आधुनिक गणित के
सर्वथा समतुल्य नहीं है।
त्रिशतिका के रोचक सूत्र- (I) त्रिशतिकाकार ने गणितीय संक्रियाओं के
मध्य अनेक रोचक परिणाम प्राप्त किये हैं। उन्होंने 1+2+3---+ अन्तिम पद तक
के योग के लिये एक रोचक सूत्र प्रस्तुत किया है। इस विषय में आधुनिक युग
के महान् गणितज्ञ गॉस (Karl Freidrich gauss) के बचपन की एक कहानी
बहुत प्रसिद्ध है। छह वर्ष के गॉस से उसके अध्यापक ने पूछा कि 1+2+3-- इस
क्रम से 10 तक संख्याओं का जोड़ सबसे पहले कौन बता सकता है। अन्य छात्र
इन्हें संख्या के क्रम से जोड़ में व्यस्त हो गए, तभी गॉस ने हाथ उठाकर कहा,
‘मैंने कर लिया'। अध्यापक ने पूछा, 'तूने इतनी जल्दी कैसे कर लिया, शैतान'।
गॉस ने क्या उत्तर दिया, यह तो पता नहीं। पर 'वास्तव में उसे गणित का एक
महत्त्वपूर्ण प्रमेय सूझ गया था²।
यह बिल्कुल संयोग (chance) की बात है कि त्रिशतिका में ठीक यही
प्रश्न तथा इसे हल करने का सूत्र ग्रन्थ के सबसे प्रारम्भ में प्रस्तुत किया गया है।
कौन जानता है कि त्रिशतिकाकार को यह प्रमेय किस प्रकार सूझा होगा। संक्षेप
के आवेग में उन्होंने सूत्र की उपपत्ति भी नहीं लिखी। पर सूत्र से प्रकट है कि
वे उपपत्ति जानते रहे होंगे। प्रस्तुत ग्रन्थ की व्याख्या में इसे निरूपित कर दिया गया
है।
(II) त्रिशतिकाकार ने एक रोचक नियम स्थिर किया कि 1 से लेकर कहीं
तक की भी क्रमिक विषम संख्याओं का जोड़ अवश्य ही वर्ग संख्या होती है तथा
१. खभाजितो राशिः खहरः स्यात्।। लीलावती अभिन्नपरिकर्माष्टक सूत्र 1, पृ. 71
२. Productive thinking - Verdaemir - 1945

( xviii )
वह उस संख्या का वर्ग होती है, जितने पद (number) उस जोड़ में प्रयुक्त हुए
हैं। इस प्रकार 1+3+5---99 तक का जोड़ 50²= 2500 होगा। क्योंकि यहाँ कुल
50 विषम संख्याओं को जोड़ा गया है। यह परिणाम क्रमिक संख्याओं के जोड़
‘सर्वधन’ के सूत्र से प्राप्त होता है। इसे व्याख्या में समीकरण की पद्धति से प्रकट
कर दिया गया है¹।
(III) त्रिशतिकाकार ने सूत्र 15 में किसी संख्या का घनफल प्राप्त करने के
लिये एक नियम बताया है। इसके आधार पर उन्होंने यह रोचक परिणाम प्राप्त
किया कि किसी भी संख्या (a) का घन उससे 1 कम संख्या (b) के घन से
3×a×b+1 अधिक होता है। जैसे-
8³= (7³) + (3×8×7+1) = 343+169 = 512
इसके सूक्ष्म निरीक्षण से महावीराचार्य ने यह परिणाम प्राप्त किया कि इस
a संख्या से 1 कम संख्या से नीचे वाली संख्याओं में भी ठीक यही नियम लागू
है²। अतः उन्होंने इससे यह मनोरंजक श्रेढ़ी विकसित की-
8³ = (6³) + (3×7×6)+1 + 169 = 512
अथवा 8³ = (5³) + (3×6×5) +1+169+127= 512
अथवा 8³ = (4³) + (3×5×4) +1+169+127+91 = 512 इत्यादि
अन्य रीति से-
4³ = 3 (4×3+3×2+2×1) + 4
त्रिशतिका के कुछ भाषा-वैज्ञानिक तथ्य- त्रिशतिका-शब्दों के
भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन से उनके उद्भव तथा विकास पर प्रकाश पड़ता है। भारत
में दूरियों को नापने के लिये मूलतः उँगलियों तथा हाथ का उपयोग किया गया
था। यह दूरियों के मात्रक के रूप में ‘अंगुल’ तथा ‘हस्त’ शब्दों से प्रमाणित है।
नापने के लिये ‘अंगुल’ का प्रयोग वेद में भी प्राप्त है³। हाथ से नापने की पद्धति
विदेशों में भी प्रचलित रही। यह इसी ‘हस्त’ अर्थ में लैटिन से निःसृत cubit शब्द
से प्रमाणित है। वहाँ मूलतः पैर अर्थ वाले foot शब्द के दूरी के मात्रक के रूप
१. त्रिशतिका सूत्र 11, पृ. 14 तथा उसकी व्याख्या।
२. इष्टाद्विगुणेषुप्रचयेष्टपदान्वयोऽथवेष्टकृतिः।
व्येकेष्टहृतैकादिद्विचयेष्ट-पदैक्ययुक्ता वा। - गणित सार संग्रह, परिकर्मव्यवहार, श्लोक 43
तथा आगे
३. एतावानस्य महिमाऽतो ज्यायाँश्च पुरुषः।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशांगुलम्॥ - यजुर्वेद 31.2

( xix )
में प्रयुक्त होने के कारण पैरों से नापने की पद्धति भी विकसित सिद्ध होती है।
काल के मात्रकों में 'घटी' का प्रयोग किया गया है। काल के मापने वाले
के लिये 'घटी-यन्त्र' तथा केवल 'घटी' शब्द भी प्रचलित रहा है। इस शब्द से
प्रकट होता है कि उस समय यह यन्त्र छोटे घड़े के आकार का बनता था। आज
कलाई में पहने जाने वाले यन्त्र के लिए 'घड़ी' का प्रयोग करने वाले कितने लोग
जानते हैं कि यह मूलतः घड़े के आकार का था।
त्रिशतिका के गणितीय शब्द देश के विभिन्न भागों से प्राप्त किये गए हैं।
इससे प्रकट होता है कि इतिहास के विशाल काल-खण्ड में विविध स्थानों में
निरन्तर गणितीय चिन्तन जारी था। त्रिशतिका में जहाँ वैदिक शब्दों के आधार पर
सहस्र, अयुत आदि का प्रयोग किया गया है, वहीं बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर पहली
बार नियुत के स्थान पर 'लक्ष' शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है।
विनिमय के मात्रकों में मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित पण आदि का
उल्लेख है। साथ ही दक्षिण भारत के 'काकिणी' का भी वर्णन है, जिसका
सर्वप्रथम उल्लेख दक्षिण भारत के वार्तिककार कात्यायन ने किया है।¹
प्राचीन भारतीय गणित में वृत्त तथा गोल दोनों प्रकार के आकारों के लिये
'वृत्त' का प्रयोग होता रहा है। ब्राह्मण ग्रन्थों में वृत्त के लिये 'परिमण्डल' का
प्रयोग किया गया है² तथा बौद्धग्रन्थ धम्मसंगनी आदि में अण्डाकार के लिये इस
शब्द को प्रचलित किया गया। फिर भी गणित में काफी समय तक वृत्त तथा गोल
के अर्थों में घालमेल की सम्भावना बनी रही। अतः आर्यभट ने दक्षिण भारत से
प्राप्त 'गोल' शब्द को प्रचलित किया। यह अपने इस विशिष्ट अर्थ में मूलतः
तेलगू, कन्नड आदि का शब्द है³। आर्यभटीय गोलपाद श्लोक ६ में इस 'भूगोल'
को आकाश में लटके गोल पिंजरे के समान बताया गया है। सूर्य सिद्धान्त १२.५३
में कहा है कि इस विशाल 'महीगोल' में तात्त्विक दृष्टि से कौन स्थान 'ऊपर'
या 'नीचे' कहा जा सकता है। त्रिशतिकाकार ने भी इस शब्द को यथावत् अपनाते
हुए इसके आयतन का सर्वप्रथम वर्णन किया। आज हम 'भूगोल शास्त्र' का प्रयोग
करते हुए मूलतः दक्षिण भारतीय शब्द का प्रयोग करते हैं।
त्रिशतिका में जैन, बौद्ध ग्रन्थों से प्राप्त अनेक प्राकृत शब्द भी हैं। यहाँ
वस्तु-विनिमय के लिये 'भाण्ड-प्रतिभाण्ड' का प्रयोग किया गया है। यह प्राकृत
१. काकिण्याश्चोपसंख्यानम्-अ.सू. ५.१.३३ के महाभाष्य पर वार्तिक।
२. परिमण्डल उ वा अयं पृथिवीलोकः -शतपथ ब्राह्मण ७.१.१.३७
३. तेलगू - गुडुसु (वृत्त, गोला), गुड्डु (आँख की पुतली), गोइड (गोल पत्थर) कन्नड -
गुडसु (कोई गोल चीज़) - Sanskrit language - T.Burrow Page 462

( xx )
प्रभावित संस्कृत शब्द है। इससे ज्ञात होता है कि मुख्यतः पात्रों के विनिमय द्वारा
वस्तु-विनिमय की परम्परा जारी थी। इसी प्रकार पदों की संख्या के लिये
पारिभाषिक ‘गच्छ’ का प्रयोग है। यह स्पष्टतः प्राकृत है। संस्कृत व्याकरण की
दृष्टि से संज्ञावाचक ‘गच्छ’ अशुद्ध शब्द है। क्रमिक संख्याओं के लिये ‘श्रेढ़ी’ का
प्रयोग है। यह वेद में प्राप्त ‘श्रेणी’ शब्द से निःसृत है। पर व्यापक प्रचलन के
कारण यहाँ ‘श्रेढ़ी’ का ही प्रयोग है।
इससे प्रकट है कि त्रिशतिका में अनेक परम्पराओं से प्राप्त शब्दों तथा
विधियों का उपयोग किया गया है।
त्रिशतिका में प्रतिबिम्बित सामाजिक आर्थिक जीवन- यों तो त्रिशतिका
मूलतः अंकगणित का ग्रन्थ है। पर इसके सूत्रों, उदाहरणों में प्रसंगवश तत्कालीन
जीवन की झाँकी प्राप्त हो जाती है। त्रिशतिकाकार के समय पशु-पक्षि-संकुल,
मधुर-मयूर-विरुत रमणीय अरण्यों का बाहुल्य था। अतः ऐसे अनेक उदाहरण
प्राप्त होते हैं।
समाज में मुख्यतः निम्न वर्ग तथा स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। दास,
दासियों की खरीद बिक्री इतनी प्रचलित थी कि इसमें अलग से जीव-विक्रय के
उदाहरण प्रस्तुत किये गए हैं¹। यह परम्परा लम्बे काल तक प्रचलित थी। क्योंकि
त्रिशतिका से लेकर लीलावती तथा 1039 ई. के गणित-तिलक तथा 1356 ई. के
गणित-कौमुदी तक में भी ऐसे ही उदाहरण वर्तमान हैं। पाटी-गणित की अज्ञातकर्तृक
व्याख्या में सहज ही कहा है कि जैसे कपड़ों आदि का उपयोग करने पर उनका
मूल्य घटता है, उसी प्रकार उम्र बढ़ने के व्युत्क्रमानुपात में इनका मूल्य कम होता
जाता है। (देखें इस ग्रन्थ में त्रिशतिका प्रस्तुत सूत्र पर उद्धृत टिप्पणी)। वास्तव
में यह उस समय की सामाजिक हीन दशा को स्पष्ट प्रकट करता है।
इस समय सामान्य लोगों की आर्थिक दशा भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी।
आम आदमी ‘सूदखोरी’ की प्रथा से बहुत पीड़ित था। यों तो इस प्रथा का वर्णन
वेद, निरुक्त, अष्टाध्यायी, धर्मशास्त्र आदि ग्रन्थों में वर्तमान है। अथर्ववेद के एक
मन्त्र में प्रार्थना है कि मैं जिससे ऋण लूँ तथा जिसका स्त्री के पास जाऊँ, वह
मुझसे उलटी, पुलटी बातें कहते हुए डाँटे, फटकारे नहीं²!!
त्रिशतिकाकार के समय इस समस्या में जरा भी कमी नहीं आई थी।
त्रिशतिका के एक उदाहरण के अनुसार ऋणी को 5% ऋणदाता के लिये, 1%
१. त्रिशतिका उदा. 56 पृ. 60
२. यस्मा ऋणं यस्य जायामुपैमि यं याचमानो अभ्यैमि देवाः।
ते वाचं वादिषुर्मोत्तरां महैवपत्नी अप्सरसावधीताम्।। - अथर्ववेद 6.118.3