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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 208 में से

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पृष्ठ 6

( vi )

इसकी गुजराती व्याख्या में श्रीधराचार्य के महत्त्व को प्रकट करने वाला एक सुन्दर
श्लोक इस प्रकार है-
उत्तरतो सुरनिलयं दक्षिणतो मलयपर्वतं यावत्।
प्रागपरोदधिमध्ये नो गणकः श्रीधरादन्यः।।
अर्थात् उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में मलय पर्वत तक तथा
पूर्व तथा पश्चिम समुद्र के बीच श्रीधर से बड़ा कोई दूसरा गणितज्ञ नहीं है।
यह अकेला श्लोक श्रीधराचार्य के प्रचार तथा प्रभाव को आमलय,
आहिमालय सम्पूर्ण भारत में प्रकट करने के लिए पर्याप्त है।
पाटी-गणित के बृहत्काय होने से उसमें स्वभावतः त्रिशतिका के श्लोकों के
अलावा अन्य अनेक सूत्रों तथा अतिरिक्त उदाहरणों का वर्णन है। फिर भी इससे
'त्रिशतिका' का अपना महत्त्व कम नहीं होता। क्योंकि इसमें कुछ ऐसे विषयों का
निरूपण है, जो पाटी-गणित में उपलब्ध नहीं होते। उदाहरणतः, वृत्त-खण्ड का
क्षेत्रफल, गोले का आयतन, शंकु का आयतन आदि रेखा-गणित के अनेक सूत्र
इसमें ही उपलब्ध हैं, पाटी-गणित में नहीं। साथ ही त्रिशतिका उदा. 26, 27, 28
जैसे बहुत से उदाहरण भी केवल इसमें ही प्राप्त होते हैं। ये उदाहरण बहुत
लोकप्रिय हुए हैं। आगे चलकर अनेक गणितज्ञों ने इन्हें उद्धृत किया है।
त्रिशतिका में ऐसे सूत्र भी उपलब्ध हैं, जो पाटी-गणित से अन्य शब्दों में
प्रस्तुत किये गए हैं। प्रस्तुत व्याख्या में ऐसे सूत्रों को तुलना के लिये टिप्पणी में
उद्धृत कर दिया गया है।
त्रिशतिका की प्रस्तुत संस्कृत व्याख्या का भी विषय के निरूपण तथा
तुलना के लिये अपना अलग महत्त्व है।
ग्रन्थ का नामकरण-प्रस्तुत ग्रन्थ का नाम 'त्रिशतिका' है। इसका शाब्दिक
अर्थ 'तीन सौ श्लोकों का समाहार' यह होता है। पर प्रस्तुत ग्रन्थ में इतने श्लोक
नहीं है। अतः एक सम्भावना यह बनती है कि इसके कतिपय श्लोक विलुप्त हो
गए हैं।
इस ग्रन्थ के अन्त में 'त्रिशतिका-पाटी' का समाप्त होना कहा गया है।
बहुत समय से अंक गणित को पाटी गणित कहा जाता रहा है। पाटी अर्थात् तख्ती
पर धूल या अबीर बिछा कर गणित करने की परम्परा रही है। इसीलिये इसे
'धूलि-कर्म' भी कहा जाता रहा है। इन दोनों शब्दों का सर्वप्रथम प्रयोग ब्राह्मस्फुट
सिद्धान्त में तथा पश्चात् लीलावती, सिद्धान्त-शिरोमणि वासना-भाष्य में भी प्राप्त
है। गणित करने की यही पद्धति अरब तथा अन्य देशों में प्रसारित हुई। अतः वहाँ