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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 208 में से

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पृष्ठ 9

( ix )
उक्त विवेचनाओं के आधार पर प्रायः सभी विद्वान् श्रीधराचार्य को
कन्दलीकार तथा गणितसारसंग्रहकार महावीराचार्य से पूर्ववर्ती मानते हैं। पर
पाटी-गणित के व्याख्याकार डा. कृपाशंकर शुक्ल ने इन्हें कन्दलीकार का पूर्ववर्ती
पर महावीराचार्य का उत्तरवर्ती स्वीकार किया है।
इस विषय में डा. शुक्ल द्वारा प्रस्तुत लगभग सभी तथ्य 'अभाव' प्रमाण पर
अवलम्बित हैं। उनका मानना है कि 'पाटी-गणित' में अनेक रोचक सूत्र वर्तमान
हैं, जो कि गणितसारसंग्रह में उपलब्ध नहीं हैं। यदि महावीर श्रीधर के बाद होते
तो वे उनका उल्लेख अवश्य करते। ऐसा न होने से श्रीधर उत्तरवर्ती सिद्ध होते हैं¹।
पर वास्तव में इस प्रकार के तथ्यों से किसी को पश्चाद्वर्ती प्रमाणित नहीं
किया जा सकता। प्रत्येक लेखक की अपनी शैली होती है। वह अपनी सुविधानुसार
अन्यों के तथ्यों को ग्रहण करता है। महावीर द्वारा श्रीधर के सूत्रों को ग्रहण न
करने से उनकी मौलिकता की प्रवृत्ति सुस्थापित होती है पूर्ववर्तिता नहीं।
`डा. शुक्ल का यह भी मानना है कि श्रीधराचार्य के सूत्र अधिक सही तथा
सूक्ष्मता के अधिक समीप हैं, जबकि महावीर के उतने समीप नहीं हैं। इनसे प्रकट
है कि श्रीधर ने महावीर के सूत्रों के अवलोकन के पश्चात् अपने गम्भीर विचार
के अनन्तर अधिक सूक्ष्मता प्रदान की होगी। इसके लिये उन्होंने गोले के आयतन
के सूत्र का उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो इस प्रकार है-
श्रीधराचार्य के अनुसार गोले का आयतन = [(व्यास)³ (1+¹/₁₈)] / 2
⇒ 4 (त्रिज्या)³ (1+¹/₁₈) ⇒ (4.22--) त्रिज्या³
महावीर के अनुसार गोले का आयतन = 9/2 × 9/10 त्रिज्या³ ⇒ 4.05 त्रिज्या³
आधुनिक गणित में गोले का आयतन = (4/3) π त्रिज्या³ ⇒ (4.188) त्रिज्या³
यहाँ स्पष्टतः श्रीधराचार्य का सूत्र आधुनिक मान के अधिक समीप है।
अतः श्रीधर महावीर के पश्चात् हुए होंगे²।
इस विवेचना में कुछ तथ्य सूक्ष्मता से विचारणीय हैं। प्रथम यह कि इस
समय हम आधुनिक मान के साथ तुलना करते हुए किसी पूर्ववर्ती को कम या
अधिक सही सिद्ध कहते हैं। पर उस प्राचीन युग में निश्चय रूप से यह सिद्ध

१. Absence of these interesting rules from an exhaustive work like the Ganit-
Sar-Sangraha cannot be explained unless we assume its preority over the works
of Shridharacharya - Introduction of Pati Ganit by K.S.Shukla. Page 40
२. Ibid Page 18