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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 208 में से

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करना सम्भव नहीं था कि कौन अधिक परिष्कृत मान है। अतः गणितज्ञ अपने-२
निष्कर्षों के आधार पर अपने मान को अधिक सही समझते थे। हम देखते हैं कि
सबसे पहले आर्यभट ने π का समीपतम मान प्राप्त किया था। पर इनके पश्चात्
श्रीधर तथा महावीर दोनों ने समान रूप से इनकी उपेक्षा करते हुए सुविधा की
दृष्टि से इनसे स्थूल मान √10 को स्वीकार किया है¹। पर इतने मात्र से आर्यभट
को इनसे उत्तरवर्ती तो नहीं कहा जा सकता।
गोले के आयतन के प्रसंग में श्रीधर तथा महावीर में अन्तर इतना कम है
कि उसके आधार पर पूर्ववर्तिता या उत्तरवर्तिता का कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा
सकता। इन दोनों आचार्यों का यह अन्तर भी सूत्र की पद्धति की भिन्नता के कारण
है। प्राचीन गणित में सूक्ष्मतम गणना को ओझल करते हुए अलग-२ पद्धतियों से
मौलिक सूत्र को संकेतित करने की परम्परा रही है। उनका वह संकेतित मौलिक
सूत्र ही पूर्ण महत्त्वशाली होता है। क्योंकि उसकी ही उपपत्ति आदि सम्भव होती
है। इस प्रसंग में मौलिक सूत्र वह है जिसमें पाई अवश्य सम्मिलित हो। इस पाई
के मान को दोनों ही आचार्य समान रूप से √10 स्वीकार करते हैं। इस प्रकार
वे जिस मौलिक सूत्र की ओर संकेत करते हैं, उनमें कोई अन्तर नहीं है। इसे इस
प्रकार प्रकट करते हैं-
श्रीधराचार्य के अनुसार गोले का आयतन = 19/36 × व्यास³
π = √10 = 19/6 = 3.16 का अलग उल्लेख करने पर-
⇒ (3.16 × व्यास³) / 6
गोले के आयतन का मौलिक सूत्र ⇒ (4/3 × 3.16) त्रिज्या³
महावीराचार्य के अनुसार गोले का सूक्ष्म आयतन = 9/10 × 9/2 ( 1/2 व्यास )³
= 9/2 × 9/10 त्रिज्या³
π = √10 = 3.1 का अलग उल्लेख करने पर-
गोले के आयतन का मौलिक सूत्र ⇒ (1.3 × 3.1) त्रिज्या³
इस प्रकार स्पष्टतः दोनों ही आचार्यों के सूत्र एक ही प्रकार की मौलिक
अवधारणा से विकसित हैं। इस प्रकार वे पाई के मान को छोड़कर आधुनिक
गणित के अनुरूप सिद्ध होते हैं। श्रीधर की महनीयता π के सूक्ष्मतम मान को


१. वृत्तक्षेत्रव्यासः दशपदगुणितो भवेत् परिक्षेपः - गणितसारसंग्रह - क्षेत्रगणित व्यवहार, श्लोक
60 यही मान त्रिशतिका सूत्र 45, पृ. 117 में वर्णित है।