त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 8, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ें( viii )
पर अन्य अनेक विद्वानों ने इस मत को स्वीकार नहीं किया है। सर्वप्रथम
श्रो शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने सिद्ध किया है कि महावीराचार्य ने गणित
सार-संग्रह में श्रीधर के 'मिश्रक-व्यवहार' से कुछ वाक्य या नियम प्राप्त किये हैं।
इस प्रकार श्रीधर महावीर से पूर्ववर्ती सिद्ध होते हैं¹। आगे चलकर डा. दत्त और
सिंह आदि अनेक विद्वानों ने इस मत का समर्थन करते हुए श्रीधराचार्य को 672
शक या 750 ई. का सिद्ध किया है²। डा. गोरख प्रसाद, डा. सबलसिंह आदि ने
भी इनका यही स्थिति-काल स्वीकार किया है³।
विद्वानों का यह मत युक्तिसंगत प्रतीत होता है। न्याय-कन्दली में व्याख्याकार
ने कुछ स्वरचित ग्रन्थों के नाम बताए हैं। जैसे अद्वय-सिद्धि, तत्त्व-प्रबोध,
तत्त्व-संवादिनी तथा संग्रह-टीका⁴। ये सभी दर्शन-ग्रन्थ हैं। इसमें उनके किसी
गणित के ग्रन्थ का उल्लेख नहीं है।
इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि न्याय-कन्दली के वे विवेचन जहाँ
गणितीय सिद्धान्तों का उल्लेख प्रासंगिक हो सकता है, वहाँ भी व्याख्याकार ने ऐसा
कोई निरूपण प्रस्तुत नहीं किया है। जैसे, परिमाण के उपभेद 'दीर्घ', 'ह्रस्व' आदि
गुणों के प्रसंग में प्रशस्तपादभाष्य की व्याख्या करते हुए कन्दलीकार ने यह सिद्ध
किया है कि द्रव्यों में समवेत दीर्घ, ह्रस्व गुण परस्पर-विरोधी हैं तथा वे अन्य गुणों
की भाँति वस्तुनिष्ठ तथा तत्त्वतः अचर गुण हैं। यदि उसमें प्रेक्षक के भेद से कभी
दीर्घ तथा कभी ह्रस्व की प्रतीति होती है तो वह विरोधी होने से वास्तविक नहीं,
अपितु औपचारिक है⁵। पर गणित में त्रिशतिकाकार ने 'दैर्घ्य' का प्रयोग लम्बाई के
लिये तथा 'विस्तर' का चौड़ाई के लिये किया है⁶। यह दैर्घ्य अन्ततः विस्तर के
सापेक्ष है। 'विस्तर' के बदलने पर दैर्घ्य के प्रयोग में व्यतिक्रम हो सकता है।
उक्त प्रसंग में कन्दलीकार द्वारा गणित के इस तथ्य का उल्लेख हो सकता था।
पर ऐसा न होने से ऐसा नहीं लगता कि कन्दली तथा त्रिशतिका के प्रणेता एक
ही होंगे।
१. भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृ. 230
२. History of Hindu Mathematics, Vol. II
३. भारतीय ज्योतिष का इतिहास - डा. गोरख प्रसाद पृ. 165 तथा Time of Shridharacharya
- Dr. Sabal Singh, Annals of Bhadarkar O.R.I. Vol. 41, (1950) Page 267
४. भारतीय दर्शन-शास्त्र, न्याय वैशेषिक, डा. धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री पृ. 125
५. न चैकस्य दीर्घत्वं ह्रस्वत्वं चोभयमपि वास्तवं युक्तम्, विरोधात्-प्रशस्तपादभाष्य, परिमाण-प्रकरण
पर न्यायकन्दली।
६. त्रिशतिका सूत्र श्लोक 53, पृ. 101 उक्त प्रसंग के सभी उद्धरणों के लिये परिशिष्ट 1 में
'दैर्घ्य' शब्द।