त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्ररोचना
प्राचीन भारत के प्रख्यात गणितज्ञ श्रीधराचार्य द्वारा विरचित अङ्कगणित की
पुस्तक पाटीगणित सार के प्रस्तुत संस्करण को विद्वानों विशेषतः आधुनिक शैली
में गणित एवं वाणिज्य के विद्यार्थियों के प्रति समर्पित करते हुए मुझे हार्दिक
प्रसन्नता है। प्राचीन भारतीय विद्वानों की यह विशेषता रही है कि वे पूर्णतः निस्पृह
भाव से बिना अपना विशेष परिचय दिए अपनें चिन्तन, उपलब्धियों एवं ग्रन्थों को
सम्पूर्ण विश्व के उपकारार्थ समर्पित कर देते थे। फलतः आधुनिक इतिहास की
शैली में ठीक-ठीक समय परिचय आदि जानने में बहिरङ्ग प्रमाणों का सहयोग
लेना पड़ता है। श्रीधराचार्य के सम्बन्ध में भी ऐसा ही है। प्रसिद्ध ज्योतिर्विद
शङ्करबालकृष्णदीक्षित ने इनके स्थितिकाल का सम्यक् विवेचन किया एवं ईसवीय
आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध (750) ई० स्थिर किया। इस प्रकार लगभग 1200
वर्ष पूर्व विरचित इस ग्रन्थ की सम्पूर्ण भारत में सभी गणितज्ञों में प्रतिष्ठा रही है।
इस महनीय एवं कालजयी ग्रन्थ के वर्तमान संस्करण को इस प्रकार तैयार किया
गया है जिससे गणित एवं वाणिज्य के विद्यार्थियों को गणित की भारतीय शैली का
सम्यक् परिचय प्राप्त हो कि हमारे पूर्वजों ने कितना गम्भीर कार्य अङ्कगणित के
क्षेत्र में किया है साथ ही उन्हें प्रचलित गणितीय शैली में समझने में सहायता भी
प्राप्त हो।
इस संस्करण के सम्पादक अनुवादक एवं व्याख्याकार डॉ० सुद्युम्न आचार्य
ने परिश्रम पूर्वक गणितीय सूत्रों को हल करते हुए ग्रन्थ को न केवल सुखबोध्य
बनाया है अपितु एक संतुलित एवं अनुसन्धान पूर्ण भूमिका द्वारा ग्रन्थ एवं ग्रन्थकार
का परिचय भी निबद्ध किया है। मैं डॉ० सुद्युम्न आचार्य को साधुवाद देता हूँ।
इस ग्रन्थ की सुन्दर एवं शीघ्र प्रस्तुति के लिए शोध एवं प्रकाशन विभाग
के संचालक डॉ० प्रकाश पाण्डेय एवं अपेक्षित रीति से मुद्रण करने के लिए अमर
प्रिंटिंग प्रैस का वर्धापन करता हूँ।