त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका
प्राचीन भारतीय गणित के आकाश में श्रीधराचार्य एक ज्योतिष्मान् नक्षत्र की
भाँति हैं। इन्होंने गणित-शास्त्र की समृद्धि के लिये प्रथम 'पाटी-गणित' नामक
बृहत् ग्रन्थ की रचना की। तदनन्तर इसकी विषय-वस्तु का संक्षेप करते हुए
'पाटीगणित-सार' अथवा 'त्रिशतिका' का प्रणयन किया। यह तथ्य त्रिशतिका के
प्रथम श्लोक से स्पष्ट है, जिसमें उन्होंने कहा है कि वे स्वविरचित पाटी-गणित
से विषय-वस्तु को लेकर इसके 'सार' की रचना कर रहे हैं।
त्रिशतिका का हस्तलेख अत्यन्त जर्जर, सर्वथा दुरूह तथा भ्रष्ट पाठ की
दशा में म. म. पं. सुधाकर द्विवेदी को प्राप्त हुआ था। इसकी दुरूहता का अनुमान
करने के लिये पृ. 124 में इसके एक पत्रा की छायाप्रति संलग्न की गई है। उन्होंने
अत्यन्त परिश्रम से इस ग्रन्थ का पुनर्लेखन तथा अपनी टिप्पणी आदि से सुसज्जित
करते हुए वर्ष 1899 ई. में इसे प्रकाशित किया। उन्हें बृहत् ग्रन्थ पाटी-गणित का
हस्तलेख प्राप्त नहीं हुआ था।
यह अत्यन्त सौभाग्य का विषय है कि आगे चलकर जम्मू के रघुनाथ
मन्दिर पुस्तकालय से इस बृहत् ग्रन्थ का हस्तलेख भी प्राप्त कर लिया गया। इसे
डा. कृपाशंकर शुक्ल ने वर्ष 1959 ई. में लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा अज्ञातकर्तृक
संस्कृत व्याख्या तथा स्वविरचित इंग्लिश अनुवाद के साथ सुसज्जित करते हुए
प्रकाशित किया। उन्होंने अपनी विस्तृत इंग्लिश भूमिका में ग्रन्थ के विविध पक्षों
पर विस्तार से प्रकाश डाला।
त्रिशतिका का महत्त्व— इसमें कोई सन्देह नहीं कि भारत में ये दोनों ग्रन्थ
सहस्रों वर्षों से पढ़े जाते रहे हैं। फिर भी त्रिशतिका के संक्षिप्त तथा अधिक
सार-गर्भित होने से इसका प्रचार कुछ अधिक ही था। इसीलिये इसके हस्तलेख
भारत के अनेक पुस्तकालयों में उपलब्ध होते हैं। जबकि 'पाटी-गणित' कम
प्रचलित होने से उपरिलिखित एक ही पुस्तकालय में उपलब्ध हुआ है।
त्रिशतिका पर व्याख्याएँ भी अधिक संख्या में लिखी गई थी। इनमें दो
व्याख्याएँ सस्कृत में तथा अन्य तेलगू, कन्नड एवं गुजराती भाषा में परिज्ञात हुई हैं।