त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपनाने के कारण है। मौलिक सूत्र में दोनों समान हैं। महावीर ने π के स्थूल
मान को 3 मानते हुए इसके आयतन का स्थूल सूत्र भी विकसित किया है¹। उसमें
भी मौलिक अवधारणा पूर्वोक्त ही है।
त्रिशतिका तथा पूर्ववर्ती गणित- त्रिशतिका से पूर्व भारतीय गणित के
चिन्तन, मनन की एक सुदीर्घ परम्परा रही है। इससे पूर्व वैदिक तथा जैन, बौद्ध
साहित्य में भी अनेक ग्रन्थ निरन्तर विरचित होते रहे थे। त्रिशतिका की इन ग्रन्थों
के साथ तुलना से स्पष्ट विदित होता है कि त्रिशतिकाकार ने इनका अध्ययन किया
था तथा अपनी सुविधा तथा औचित्य के आधार पर इनका उपयोग भी किया था।
उन्होंने एक ओर ईसा पूर्व में विरचित जैन ग्रन्थ स्थानांग सूत्र में वर्णित²गणित के
परिकर्म, व्यवहार आदि विषयों का वर्णन किया है तो दूसरी ओर ब्रह्मगुप्त की
संकलित आदि 20 क्रियाओं तथा 8 व्यवहारों³ को भी यथोचित स्थान दिया है।
संक्षेप में सभी विषयों का प्रतिपादन इनकी अपनी विशेषता है।
त्रिशतिकाकार द्वारा गणित के उज्ज्वल आलोक-स्तम्भ 'आर्यभटीय' के
सूक्ष्म अध्ययन तथा अपने ग्रन्थ में कहीं-२ उसके उपयोग को कुछ शब्दशः
तुलनीय सूत्रों से प्रमाणित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ 'गच्छ' या पद (n) को
ज्ञात करने हेतु सूत्र-
मूलं द्विगुणाद्यूनं स्वोत्तरभाजितं सरूपार्धम्-आर्यभटीय 1.20
तथा-
मूलं द्विगुणमुखोनं सचयद्विचयोद्धृतं गच्छः।
—त्रिशतिका श्लोक 41, पृ. 102
यहाँ आर्यभटीय की शब्दशः छाया देखी जा सकती है। पर उन्होंने सब
जगह आर्यभटीय का अनुकरण नहीं किया है। जैसे आर्यभटीय ने परिधि का
आनुपातिक मान 62832/20,000 अथवा 3.1416 निर्धारित किया है⁴, जो कि
परिशुद्धि के सर्वाधिक समीप मान माना जाता है। पर त्रिशतिकाकार ने 500 ई.
१. व्यासार्धघनार्धगुणा नवगोल-व्यावहारिकं फलम्
तद्दशमांशं नवगुणमशेषसूक्ष्मफलं भवति।। - गणितसारसंग्रह 8.28½
२. परिकम्मं ववहारो रज्जुरासी कलासवत्रे ये
जावन्तावति वग्गो घनो वग्गवग्गो विकप्पोत - स्थानांग सूत्र, 747
३. परिकर्म विंशतिमिमां संकलिताद्यां पृथग्विजानाति।
अष्टौ च व्यवहारान् छायान्तान् भवति गणकः सः।।
४. चतुरधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।
अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः। - आर्यभटीय, गणितपाद 1.10