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श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

मध्य भाग: चौपाई ११ से ३० तक सविस्तार दार्शनिक व्याख्या

चौ. ३: महाबीर बिक्रम बजरंगी महावीरी व्याख्या
महाबीर बिनवउँ हनुमाना।
राम जासु जस आपु बखाना॥
—रा.च.मा. १-१७-१०
बिक्रम—इनका साधना-क्रम विशिष्ट है। इसलिए ये भगवान् श्रीरामको
पीठ तथा हृदयपर आसीन करते हैं। यथा—लिए दुऔ जन पीठ चढ़ाई
(रा.च.मा. ४-४-५) और चलेउ हृदय धरि कृपानिधाना (रा.च.मा.
५-२३-१२)। यद्वा, इनके समुद्र-लङ्घनकी क्रिया भी बहुत विशिष्ट है। स्वयं
कहते हैं—लीलहिं नाँघउ जलधि अपारा (रा.च.मा. ४-३०-८)। मैनाक,
सुरसा, एवं सिंहिका जैसे विघ्नोंके प्रस्तुत होनेपर भी इनका वेग विहत नहीं
हुआ। यथा—
विषण्णा हरयः सर्वे हनूमन् किमुपेक्षसे।
विक्रमस्व महावेग विष्णुस्त्रीन् विक्रमानिव॥
—वा.रा. ४-६६-३७
अर्थात् "हे हनुमान्! संपूर्ण वानर बहुत दुःखी हैं, उनकी उपेक्षा क्यों
करते हो? जिस प्रकार भगवान् विष्णुने तीन बार चरणका विक्षेप करके
समस्त लोकोंको नाप लिया था, उसी प्रकार एक बार समुद्र लाँघनेके लिए
अपने चरणका विक्षेप करो।" अतः यहाँ बिक्रमका अर्थ है विशेष प्रकारके
चरण-विक्षेपकी प्रक्रिया, जिसकी एक छलाँगसे भी कम हो गया भूमण्डलसे
सुदूर नभोमण्डलका परिमाण! यथा—बानर सुभाय बालकेलि भूमि
भानु लागि फलँगु फलाँगहूँ ते घाटि नभतल भो (ह.बा. ५)।
बजरंगी—यह शब्द वज्राङ्गीका तद्भव है। जन्म लेनेके एक दिनके
ही पश्चात्, अर्थात् कार्तिक कृष्ण अमावस्याको, प्रातःकाल क्षुधासे पीड़ित
हनुमान्जी महाराजने लाल फलकी भ्रान्तिसे सूर्यनारायणके ऊपर आक्रमण
कर दिया। उसी समय राहु सूर्यनारायणको ग्रसने हेतु वहाँ उपस्थित था।
हनुमान्जीने सूर्यको छोड़कर राहुपर ही आक्रमण कर दिया। अनन्तर राहुसे
२२

महावीरी व्याख्या चौ. ३: महाबीर बिक्रम बजरंगी
सूचना पाकर वज्रपाणि इन्द्र ऐरावतपर आरूढ हो वहाँ उपस्थित हुए। अब
श्वेत फलकी भ्रान्तिसे ऐरावतपर आक्रमण करते देखकर इन्द्रने उनकी
बाँई ठोड़ीपर वज्रका प्रहार करके उन्हें धराशायी कर दिया। पश्चात् क्रुद्ध
होकर पवनने अपने संचारको समाप्त कर प्रत्येक प्राणीके प्राणका अवरोध
कर दिया। पश्चात् समस्त देवताओंने श्रीहनुमान्जीको विविध वरदान देकर
पवनदेवको प्रसन्न किया। उसी समय इन्द्रने श्रीहनुमान्जीके शरीरको वज्रसे
अभेद्यताका वरदान देकर उनका हनुमान् नामकरण कर दिया। यह कथा
पुराणोंमें विस्तारसे वर्णित है। अपि च—उर बिशाल भुजदंड चंड नख
बज्र बज्रतन (ह.बा. २)।
कुमति-निवार सुमति के संगी—हनुमान्जीके स्मरणसे कुमतिका
निवारण होता है अथवा कुमतिपूर्ण खलका वे संहार करते हैं तथा सुमतिमान्
सज्जनकी सहायता। जैसे कुमति रावणके विनाशमें वे मुख्य भूमिका निभाते
हैं। यथा—
तव उर कुमति बसी बिपरीता।
हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
—रा.च.मा. ५-४०-७
और उसके विनाशके लिए—दशमुख-दुसह-दरिद्र दरिबेको भयो प्रकट
तिलोक ओक तुलसी-निधान सो (ह.बा. ८)। और सुमति विभीषणकी
सहायता कर हनुमान्जीने उन्हें अविचल राज्य दिला दिया। यथा—जयति
भुवनैकभूषण विभीषणवरद (वि.प. २६-६)।
२३

चौ. ४: कंचन-बरन बिराज सुबेसा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
कंचन-बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥ ४ ॥
शब्दार्थ—कंचन ▸ स्वर्ण। कुंचित ▸ घुँघराले।
अर्थ—हे कपिश्रेष्ठ! आपका वर्ण तस स्वर्णके समान तेजसे पूर्ण है तथा
आप अत्यन्त सुन्दरवेषमें विराज रहे हैं। आपके श्रवणोंमें कुण्डल चमक
रहे हैं तथा आपके केश घुँघराले हैं।
व्याख्या—श्रीहनुमान्‌जीने निष्किञ्चना सेवाके लिए अपनेको वानर-
शरीरमें परिणत किया, जिसमें सुन्दर वेष, श्रवणोंमें कुण्डल, एवं केशोंकी
सजावट संगत नहीं हो पाती। इन्होंने अपनेको सर्वविधिहीन चञ्चल कपि भी
कहा। यथा—
कहुहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
—रा.च.मा. ५-७-७
श्रीगोस्वामीजीने भी साधुमें वेष-प्राधान्यका खण्डन करते हुए जाम्बवान् एवं
हनुमान्‌जीको ही कुवेषधारी होनेपर साधुओंमें शिरमौर एवं सम्मानार्ह माना।
यथा—
किएहुँ कुबेष साधु सनमानू।
जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
—रा.च.मा. १-७-७
अतः यहाँ ब्राह्मण-वेषधारी हनुमान्‌जीकी झाँकीका वर्णन संगत लगता है।
श्रीमानसजीमें भी श्रीराम, विभीषण, एवं श्रीभरतजीके समक्ष ब्राह्मण वेषमें
२४

महावीरी व्याख्या चौ. ४: कंचन-बरन बिराज सुबेसा
हनुमन्जीका आगमन प्रसिद्ध ही है। यथा—
(१) बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ (रा.च.मा. ४-१-६)।
(२) बिप्र रूप धरि बचन सुनाए (रा.च.मा. ५-६-५)।
(३) बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत (रा.च.मा. ७-
१क)।
कंचन-बरन—गौर शरीरकी उपमा काञ्चन वर्णसे ही दी जाती है। तथा
ब्राह्मणका गौरवर्ण उसकी कुलीनताका द्योतक होता है—गौरो ब्राह्मणः
कुलीनः (लोकोक्ति)। बहुवेषधारी आञ्जनेयका कुलीन भद्रवेष एवं केशोंका
कुञ्चित होना उनके रूपानुरूप ही है। यही ध्यान अगली चौपाईमें भी समझना
चाहिए।
२५

चौ. ५: हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज-जनेऊ छाजै॥ ५॥
शब्दार्थ—छाजै ▸ शोभित हो रहा है।
अर्थ—हे आञ्जनेय! आपके वज्रवत् सुदृढ हस्तमें श्रीरामकी विजय-
ध्वजा विराज रही है एवं आपके स्कन्धपर मूँजका यज्ञोपवीत शोभित हो
रहा है।
व्याख्या—यह झाँकी श्रीभरतजीके समक्ष ब्राह्मण-वेषमें पधारे हुए
श्रीआञ्जनेयकी है। इनके हाथमें श्रीराघवजीकी विजय-वैजयन्ती फहरा रही
है। यथा—भानुकुल-भानु-कीरति-पताका (वि.प. २६-६)। काँधेपर
मूँजका यज्ञोपवीत आञ्जनेयके अखण्ड ब्रह्मचर्यको सूचित करता है।
अथवा, इनके हाथमें वज्रके समान शत्रुदल-नाशिनी गदा एवं वैष्णव
विजय-ध्वजा विराजमान हैं। इस व्याख्यासे व्यञ्जित हनुमान्‌जीका गदाधारण
ध्वनित होता है।
२६

महावीरी व्याख्या चौ. ६: शंकर स्वयं केसरीनंदन
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
शंकर स्वयं केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग-बंदन॥ ६ ॥
शब्दार्थ—स्वयं ▸ साक्षात्।
अर्थ—हे प्रभो! आप साक्षात् श्रीशंकर भगवान् अर्थात् उनके अभिन्न
अंश तथा केसरीके नन्दन (क्षेत्रज पुत्र) हैं। आपका तेज एवं प्रताप महान्
है तथा आप संपूर्ण जगत्‌के द्वारा वन्दित हैं।
व्याख्या—अर्थात् स्वयं शिव ही केसरीनन्दनके रूपमें पधारे।
यथा—रुद्र-अवतार संसार-पाता (वि.प. २५-३)। शंकर स्वयं
केसरीनंदन यह प्रसंग अद्यावधि बहुतसे जिज्ञासुओंकी जिज्ञासा एवं अनेक
शङ्कालुओंकी शङ्काका केन्द्र-बिन्दु बना रहा है क्योंकि एक ही हनुमान्‌जी
महाराजको पवनसुत एवं केसरीनंदन शब्दसे अभिहित किया गया है। एक
पुत्रके दो पिता कैसे संभव हैं? पर इसका समाधान श्रीराघवकी कृपासे
अत्यन्त सरल एवं सुबोध है। सौभाग्यका विषय है कि श्रीहनुमान्‌जीके न
केवल दो अपितु तीन पिताओंका प्रमाण हनुमान्-चालीसामें ही प्राप्त हो जाता
है—
(१) पवनसुत-नामा (ह.चा. २)
(२) केसरीनंदन (ह.चा. ६)
(३) राम-दुलारे (ह.चा. ३०)
इसका उत्तर यह है कि श्रीहनुमान्‌जी श्रीपवनके औरस पुत्र हैं।
यथा—मारुतस्यौरसः पुत्रः (वा.रा. ४-६६-७)। क्योंकि वायुदेवने ही
साक्षात् शिवके तेजको अञ्जनाके गर्भमें समाहित किया था, क्योंकि उनके
२७

चौ. ६: शंकर स्वयं केसरीनंदन महावीरी व्याख्या
बिना इस पवित्र तेजको कोई भी अञ्जना तक पहुँचा नहीं सकता था। चूँकि
ये केसरीजीकी पत्नीमें प्रकट हुए, अतः ये केसरी नामक वानरके क्षेत्रज पुत्र
कहलाए। यथा—सकैं न बिलोकि बेष केसरी-कुमार को (क. ५-१२)।
श्रीरामजीने इन्हें वात्सल्य प्रदान किया, अतः ये उनके मानस पुत्र हुए।
यथा—
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं।
देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
—रा.च.मा. ५-३२-७
पौराणिक गाथाओंसे स्पष्ट है कि अञ्जनाकी तपस्यासे प्रसन्न होकर
शिवजीने उनके यहाँ पुत्ररूपमें आनेका वरदान दिया। चूँकि शिवजी
आञ्जनेयके रूपमें अवतीर्ण हुए, अतः स्वयं शब्द पूर्णावतारके ही अर्थमें
व्यवहृत हुआ।
इस प्रकार उपासनाकी दृष्टिसे श्रीआञ्जनेय वायुके औरस पुत्र, ज्ञानकी
दृष्टिसे शिवजीके अभिन्नावतार, कर्मकाण्डकी दृष्टिसे कपिकुलतिलक
केसरीके क्षेत्रज पुत्र, एवं शरणागतिकी दृष्टिसे श्रीराघवके मानस पुत्र हैं।
तेज प्रताप महा जग-बंदन—इनका तेज एवं प्रताप महान् है। यथा—
(१) तेज को निधान मानो कोटिक कृसानु भानु (क. ५-४)।
(२) बेग जीत्यो मारुत प्रताप मारतंड कोटि (क. ५-९)।
प्रचलित प्रतिमें शंकर-सुवन पाठ मिलता है, जो अशुद्ध और अनुचित
है।१
१ देखें: Mahāvīri: Hanumān-Cālīsā Demystified (2018). Translated,
expanded, and annotated by Nityānanda Miśra. New Delhi: Bloomsbury
India, ISBN 978-93-87471-59-7, pp. 68, 169–170—संपादक।
२८

महावीरी व्याख्या चौ. ७: बिद्यावान गुणी अति चतुर
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
बिद्यावान गुणी अति चतुर।
राम-काज करिबे को आतुर ॥ ७ ॥
शब्दार्थ— आतुर ▸ उत्सुक।
अर्थ—हे आञ्जनेय! आप समस्त विद्याओंके प्रशस्त भण्डार हैं एवं
समस्त गुण आपमें निवास करते हैं। एवं आप अत्यन्त चतुर हैं तथा
श्रीरामचन्द्रजूके कार्यको करनेके लिए उत्सुक रहा करते हैं।
व्याख्या—बिद्या शब्द यहाँ अष्टादश विद्याओंका संकेत करता है।
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि श्रीहनुमान्‌जीने श्रीमानसके धरातलपर
तीन बार ब्राह्मण-वेष बनाया। प्रथम बार श्रीराम-लक्ष्मणके समक्ष। श्रीराम
विद्यानिधि हैं। यथा—बिद्या-बिनय-निपुन गुणशीला (रा.च.मा. १-२०४-
६) और बिद्यानिधि कहूँ बिद्या दीन्ही (रा.च.मा. १-२०९-७)। अतः
विद्यानिधिके समक्ष हनुमान्‌जीने ब्रह्मविषयक प्रश्न करके अपनी विद्या-
प्रखरताका परिचय दिया। द्वितीय बार विभीषणके समक्ष लङ्का में। यहाँ
विभीषणके आकुलत्व रूप गुणको देखकर उन्हें राम-परत्वका उपदेश कर
अपनी गुणज्ञताका परिचय दिया। क्योंकि—
सोइ सर्बग्य गुणी सोइ ग्याता।
सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
धर्म-परायन सोइ कुल त्राता।
राम-चरन जा कर मन राता॥
—रा.च.मा. ७-१२७-१,२
आञ्जनेय विभीषणसे कह पड़ते हैं—
२९

चौ. ७: बिद्यावान गुणी अति चतुर महावीरी व्याख्या
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुण भरे बिलोचन नीर॥
—रा.च.मा. ५-७
तृतीय बार नन्दिग्राममें भरतजीके समक्ष। यहाँ आञ्जनेयका लोकोत्तर चातुर्य
दृष्टिगोचर होता है। श्रीभरतभद्र अविराम अश्रुधारासे श्रीरामभद्रके भावनामय
पादपद्मका अभिषेक कर रहे हैं—राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन-
जलजात (रा.च.मा. ७-१ख)। अतः श्रीहनुमान्जी सामने नहीं आते।
क्योंकि अश्रुपात-कालमें ठीक-ठीक न दीख पड़नेसे पूर्वकी भाँति फिर
कोई अन्यथा अनुमान न हो जाए, इसलिए—बोलेउ श्रवन सुधा सम
बानी (रा.च.मा. ७-२-२)। उनके कानमें जाकर बोले। तीन चौपाइयोंमें
श्रीराघवके आगमनका समाचार सुनाकर श्रीभरतको उन्होंने विरह, भय,
तथा विषादसे मुक्त किया। और भरतभद्रने नाहिन तात उरिन मैं तोही
(रा.च.मा. ७-२-१४) कहकर कृतज्ञता-ज्ञापन किया। ग्रन्थ-गौरवके भयसे
सूत्ररूपमें दिग्दर्शन कराया गया। विज्ञ पाठक तीनों प्रसंगोंकी स्वयं संगति
लगा लेंगे।
राम-काज करिबे को आतुर—श्रीरामकार्य करनेके लिए ये इतने
आतुर हैं कि क्षण-भर भी विश्राम उचित नहीं मानते, यथा—राम-काज
कीन्हे बिनु मोहि कहाँ बिश्राम (रा.च.मा. ५-१); और नागपाशमें बँधकर
भी लज्जाका अनुभव नहीं करते—
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
—रा.च.मा. ५-२२-६
३०

महावीरी व्याख्या चौ. ८: प्रभु-चरित्र सुनिबे को रसिया
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
प्रभु-चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम-लखन-सीता-मन-बसिया ॥ ८ ॥
शब्दार्थ—रसिया ▸ रसिक। बसिया ▸ निवास करने वाले।
अर्थ—हे मारुते! आप श्रीराघवजूके चरितामृतको सुननेके अद्वितीय
रसिक हैं एवं आपके मनोमन्दिरमें श्रीराम, श्रीलक्ष्मण, एवं श्रीसीताका
निवास है। यद्वा, आप ही वात्सल्यातिशय होनेसे श्रीराम-लक्ष्मण एवं
श्रीसीताजीके मनमें निवास करते हैं।
व्याख्या—प्रभु-चरित्र-श्रवणके श्रीहनुमान्‌जी इतने रसिक हैं कि कथाके
लोभमें इन्होंने प्रभुका सान्निध्य ठुकरा दिया। राज्याभिषेकके पश्चात्
राजाधिराज श्रीरामने संपूर्ण वानर-भालुओंको विविध दान एवं प्रीतिदान
देकर विसर्जित किया एवं श्रीआञ्जनेयसे अपने परम धाममें रहनेके लिए
मूक इच्छा व्यक्त की। तब श्रीमारुतिने मूक भाषामें अन्तर-प्रश्न किया कि
क्या आप अपने परम धाममें मेरे रामायण-कथा-श्रवणकी व्यवस्था करेंगे?
श्रीरामभद्रजूको निरुत्तर देखकर हनुमान्‌जी महाराजने पुनः कहा, “हे वीर!
जब तक आपकी श्रीरामायण-कथा इस भूमण्डलपर चलती रहेगी, तब
तक आपकी आज्ञासे मेरे शरीरमें प्राण विद्यमान रहेंगे।” श्रीरामने भी इस
वरदानको स्वीकारते हुए कहा, “जब तक इस लोकमें मेरी कथा चलेगी,
तब तक तुम्हारी कीर्ति अचल रहेगी एवं तुम्हारे शरीरमें प्राण तब तक वर्तमान
रहेंगे।” राम-कथाके लोभमें कालनेमिका षड्यन्त्र भी इन्हें क्षणमात्र तक
स्वीकार्य-सा हो गया। स्वयं श्रीराम-कथा-श्रवणमात्रसे हनुमान्जीके नेत्र-
कमल सजल हो जाते हैं और वाणी शिथिल हो जाती है। यथा—जयति
३१

चौ. ८: प्रभु-चरित्र सुनिबे को रसिया महावीरी व्याख्या
रामायण-श्रवण-संजात-रोमांच-लोचन-सजल-शिथिल-वाणी (वि.प.
२९-५)। श्रीराम-कथाके निमित्त ही जिन्होंने साकेतके सुखको ठुकराकर
धराधामपर विचरण करते हुए राम-कथा-श्रवणार्थ अपना जीवन रक्खा,
ऐसे श्रीआञ्जनेयके समान श्रीराम-कथाका और कौन रसिक हो सकता है?
३२

महावीरी व्याख्या चौ. ९: सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ ९ ॥
शब्दार्थ—बिकट ▸ भयंकर।
अर्थ—हे मारुते! आपने सूक्ष्म अर्थात् अत्यन्त लघु बन्दरका रूप धारण
करके माता सीताको दिखाया और भयंकर रूप धारण करके रावणकी नगरी
लङ्काको भस्मसात् कर दिया।
व्याख्या—अशोकवाटिकामें हनुमान्‌जीका इतना लघुतम रूप हुआ कि
उन्होंने अपनेको वृक्षके पल्लवोंमें छिपा रक्खा—
तरु-पल्लव महँ रहा लुकाई।
करइ बिचार करौं का भाई॥
—रा.च.मा. ५-९-१
अध्यात्म-रामायणमें इन्हें कलविङ्कसमाकारः (अ.रा. ५-३-२०) कहा
गया है, अर्थात् छोटी गौरैयाके समान इनका आकार था। यहाँ यह शङ्का
करना निरर्थक है कि मुद्रिका कहाँ रही होगी। मुद्रिका भगवान्‌के श्रीविग्रहका
आभूषण होनेसे चिन्मय है। अतः परिस्थितिके अनुसार लघुता एवं गौरव
उसके लिए सहज है। गीतावलीजीमें सीता-मुद्रिका-संवाद भी वर्णित है।
मुद्रिका स्पष्ट कहती है—नींद भूख न देवरहि परिहरे को पछिताउ (गी.
५-४-२)। जो मुद्रिका श्रीसीताजीको श्रीराघवके समाचार सुना सकती है,
उसकी लघुता एवं गुरुताके विषयमें संदेहको स्थान ही कहाँ? हनुमान्‌जीके
लघु रूपको देखकर श्रीसीताजीको लीलापक्षमें संदेह हो गया। पुनः उन्होंने
भीम रूपकी झाँकीसे मैथिलीके संदेहको दूर किया। यथा—
३३

चौ. ९: सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा महावीरी व्याख्या
मोरे हृदय परम संदेहा।
सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा॥
कनक-भूधराकार शरीरा।
समर-भयंकर अतिबल बीरा॥
सीता मन भरोस तब भयऊ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥
—रा.च.मा. ५-१६-७,८,९
बिकट रूप धरि लंक जरावा—लङ्कादहनमें तो इनका विकट रूप
प्रसिद्ध ही है। विशेष कवितावलीका सुन्दरकाण्ड द्रष्टव्य है। इसी अवसरपर
रावणको अपना रुद्ररूप प्रदर्शित करने हेतु हनुमान्जीने अपना पञ्चमुखी रूप
प्रदर्शित किया।
३४

महावीरी व्याख्या चौ. १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचंद्र के काज सँवारे॥१०॥
शब्दार्थ— भीम ▸ बीभत्स तथा धीरोंको भी त्रास देने वाला।
अर्थ—आपने महाकालको भी भयभीत करने वाले भीम रूपको धारण
कर रावणपक्षीय असुरोंका संहार किया एवं भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके समस्त
कार्योंको सँवारा।
व्याख्या—इनकी भीमता देखकर महाभारत-कालके धुरन्धर वीर भीमने
भी अपनी आँखें बन्द कर लीं थीं। एक बार द्रौपदीकी रुचिरञ्जनके
लिए स्वर्णकिञ्जल्कयुक्त कमल लेने भीमसेन श्रीहनुमान्जीके निवासस्थान
गन्धमादनके निकट कदलीवन पधारे। भीमको उद्धत देखकर हनुमान्जी
वृद्ध बन्दरका रूप धारण कर मार्गमें लेट गए। भीमने मार्ग छोड़नेका
अनुरोध किया। श्रीआञ्जनेयने सहजतासे कहा, “मैं वृद्ध हूँ, अतः मेरी
पूँछ उठाकर मुझे इस स्थानसे हटा दो।” भीमकी सभी चेष्टाएँ असफल
हुईं, पर हनुमान्जीकी पूँछ टस-से-मस न हुई। अपनेको श्रीहत देखकर
भीमने उस वृद्ध वानरेन्द्रको प्रणाम करके उनका परिचय पूछा। अनन्तर
अपना परिचय देकर श्रीमारुतिने भीमको संक्षेपमें रामायण-कथा सुनाई।
पश्चात् अपने कथा-श्रवणमें व्यतिक्रम जानकर श्रीमारुति शीघ्र जानेके लिए
भीमको आदिष्ट करते हुए बोले—
तदिहाप्सरसस्तात गन्धर्वाश्च तथाऽनघ।
तस्य वीरस्य चरितं गायन्तो रमयन्ति माम्॥
—म.भा. ३-१४८-२०
३५

चौ. १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे महावीरी व्याख्या
अर्थात् “हे भीम! स्वर्गकी श्रेष्ठ अप्सराएँ एवं तुम्बुरु आदि कुशलगायक
गन्धर्व भगवान् श्रीराघवके चारु चरितको गाते हुए मुझे परमानन्द-सुधा-
सागरमें मग्न किए रहते हैं।” जानेसे पहले भीमने उनके मौलिक रूपको
देखनेकी इच्छा प्रकट की। तब श्रीहनुमान्जीने अपना स्वर्णशैल-संकाश
शरीर प्रस्तुत किया, जिसे देखकर भीमने आँखें बन्द कर लीं। यह कथा
महाभारतके वनपर्वमें स्पष्ट है। इसीका उद्धरण गोस्वामीजीने कवितावलीमें
प्रस्तुत किया है—कौनके तेज बलसीम भट भीम-से भीमता निरखि
कर नयन ढाँके (क. ६-४५)।
असुर सँहारे—असुर-संहारका क्या कहना! आञ्जनेयके संग्रामकी
प्रशंसा श्रीरामचन्द्र स्वयं करते हैं—
हाथिन सों हाथी मारे घोरे सों सँघारे घोरे
रथन सों रथ बिदरनि बलवान की।
चंचल चपेट चोट-चरन चकोट चाहे
हहरानि फौजें बहरानी जातुधान की।
बार बार सेवक-सराहना करत राम
तुलसी सराहै रीति साहिब सुजान की।
लाँबी लूम लसत लपेटि पटकत भट
देखौ देखौ लखन लरनि हनुमान की॥
—क. ६-४०
रामचंद्र के काज संवारे—श्रीरामजीके समस्त कार्योंको हनुमान्जीने
सजा दिया। भाव यह है कि रावणादिका वध राघवकी इच्छासे हो सकता
था, पर विभीषणादिका उद्धार आञ्जनेयके बिना कथमपि संभव नहीं था।
कारण कि जब तक जीव रघुनाथजीके सम्मुख नहीं होता, तब तक उसके
पाप नष्ट नहीं होते। यथा—
३६

महावीरी व्याख्या चौ. १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
—रा.च.मा. ५-४४-२
श्रीरघुनाथजी समस्त प्राणिमात्रके सम्मुख होकर भी, यथा—सन्मुख
सब की ओर (रा.च.मा. ३-१२), जीवकी सम्मुखताके बिना उसका
कल्याण नहीं कर सकते। अतः गोस्वामीजी यह अनुरोध करते हैं कि अनादि
कालसे भगवत्पाद-पद्म-विमुख इस जड़ जीवको श्रीमन्मारुतिके बिना कौन
श्रीराम-सम्मुख कर सकता है? यथा—
आते आञ्जनेय न जो व्याकुल धरा पै आज
क्षुधित जनों को भक्ति-अमिय पिलाता कौन।
कौन दर्शाता रामधाम का पवित्र पंथ
राम-नाम-मञ्जु-मणिदीपक जलाता कौन।
कौन सरसाता उर-भाव-सरसीरुह को
राम-प्रेम मधुर सुमोदक खिलाता कौन।
राम-गुण गायक बनाता कौन गिरिधर को
मुझ-से पतित को पथ सुमति दिलाता कौन॥
आते आञ्जनेय जो न अमल अवनि पै आज
वैष्णवों की विजय-वैजयन्ती फहराता कौन।
कौन लाँघ जाता शतयोजन पयोनिधि को
मैथिली का विरह-दवानल बुझाता कौन।
कौन लिपटाता रघुबीर-पद-पङ्कज में
राजीव-नयन के नयन-नीर से नहाता कौन।
साधन-विहीन दृगहीन मूढ़ गिरिधर को
मानस-मन्दाकिनी में मज्जन कराता कौन॥
३७

चौ. १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे महावीरी व्याख्या
इस प्रकार स्पष्ट है कि आञ्जनेयका चरित्र श्रीराघवजीकी लीलाका शृङ्गार
है और यही सँवारे पदका स्वारस्य है। यथा—काज महाराज के समाज
सब साजे हैं (ह.बा. १५) और सकल समाज-साज साजे रघुबर के
(ह.बा. ३३)।
३८

महावीरी व्याख्या चौ. ११: लाय सँजीवनी लखन जियाये
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
लाय सँजीवनी लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥ ११ ॥
शब्दार्थ—सँजीवनी ▸ द्रोणाचलसे लाई हुई मृतसंजीवनी।
अर्थ—हे पवननन्दन! आपने द्रोणाचलसे मृतसंजीवनी ले आकर
श्रीलक्ष्मणको जिलाया तथा रघुवीर रामभद्रजूने प्रसन्नतासे आपको अपने
हृदयसे लगा लिया।
व्याख्या—कालके विजेता मेघनादने कालस्वरूप श्रीलक्ष्मणको
वीरघातिनी शक्तिसे मूर्च्छित किया। अनन्तर करालं महाकालकालं
कृपालं (रा.च.मा. ७-१०८-२) श्रीहनुमान्जी मूर्च्छित कालको कालातीत
श्रीराघवके पास ले आए तथा उन्होंने सुषेणके निर्देशानुसार संजीवनी ले
आकर श्रीलक्ष्मणको प्राणदान दिया एवं श्रीराघवके मङ्गलमय परिष्वङ्गका
अनुभव किया। यथा—
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना।
अति कृतज्ञ प्रभु परम सुजाना॥
—रा.च.मा. ६-६२-१
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चौ. १२: रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई ॥ १२ ॥
शब्दार्थ—रघुपति ▸ रघुवंशके स्वामी, अथवा रघु अर्थात् जीवमात्रके
स्वामी श्रीराम। लङ्घन्ते पापपुण्यानि ये ते रघवो जीवास्तेषां पतिः इति
रघुपतिः।
अर्थ—रघुकुलके स्वामी तथा समस्त प्राणिमात्रके ईश्वर श्रीरामचन्द्रजीने
आपकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भाई भरतके समान प्रिय
हो।
व्याख्या—भाई शब्दका अन्वय भरतहि शब्दके साथ ही उचित
होगा, अर्थात् ‘भाई भरतके समान तुम मुझे प्रिय हो’। हनुमान्जीके साथ
भाई शब्दका अन्वय करनेसे सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं (रा.च.मा.
५-३२-७)—इस अर्धालीकी एकवाक्यता नहीं संगत होगी क्योंकि यहाँ
श्रीराघवने आञ्जनेयको पुत्र कहा। ध्यान रहे कि श्रीलक्ष्मणसे श्रीहनुमान्जीका
इतना वैशिष्ट्य अवश्य है कि श्रीरघुनाथजी श्रीलक्ष्मणजीको भाई तथा पुत्र
दोनों मानते हैं। भाई, यथा—अस जिय जानि सुनहु सिख भाई (रा.च.मा.
२-७१-१)। पुत्र, यथा—अब अपलोक शोक सुत तोरा (रा.च.मा. ६-६१-
१३)। पर हनुमान्जीको केवल पुत्र-रूपमें ही स्वीकारते हैं, यथा—सिय-
सुखदायक दुलारो रघुनायक को (ह.बा. १०)।
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महावीरी व्याख्या चौ. १३: सहसबदन तुम्हरो जस गावैं
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सहसबदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥ १३ ॥
शब्दार्थ—सहसबदन ▸ शेष। श्रीपति ▸ सीतापति श्रीराम।
अर्थ—सहस्र मुख वाले शेष तुम्हारा यश गाते हैं तथा गाते रहेंगे। ऐसा
कहकर श्रीसीताके पति श्रीराम हनुमान्‌जीको बार-बार गलेसे लगा रहे हैं।
व्याख्या—श्रीहनुमान्‌जीकी यह ध्यान-झाँकी श्रीलक्ष्मण-मूर्च्छा-
समाप्तिके पश्चात्-कालकी है। श्रीलक्ष्मणजीको मूर्च्छामुक्त देखकर उन्मुक्त
कण्ठसे प्रशंसा कर श्रीराघवजीने हनुमान्‌जीको गलेसे लगा लिया।
सहसबदन यहाँ श्रीलक्ष्मणजीके लिए अभिप्रेत है। यथा—
शेष सहस्र शीष जग कारन।
जो अवतरेउ भूमि भय दारन॥
—रा.च.मा. १-१७-७
भाव यह है कि आञ्जनेय! तुम्हारे इस परम पावन यशको सहस्रमुख
शेषावतार श्रीलक्ष्मण भी गाते रहेंगे, क्योंकि रणशय्यापर शान्त हुए अनन्तको
भी तुमने जीवनदान दिया।
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