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सर्वकोश
श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary

गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 110 में से

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चौ. ७: बिद्यावान गुणी अति चतुर महावीरी व्याख्या
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुण भरे बिलोचन नीर॥
—रा.च.मा. ५-७
तृतीय बार नन्दिग्राममें भरतजीके समक्ष। यहाँ आञ्जनेयका लोकोत्तर चातुर्य
दृष्टिगोचर होता है। श्रीभरतभद्र अविराम अश्रुधारासे श्रीरामभद्रके भावनामय
पादपद्मका अभिषेक कर रहे हैं—राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन-
जलजात (रा.च.मा. ७-१ख)। अतः श्रीहनुमान्जी सामने नहीं आते।
क्योंकि अश्रुपात-कालमें ठीक-ठीक न दीख पड़नेसे पूर्वकी भाँति फिर
कोई अन्यथा अनुमान न हो जाए, इसलिए—बोलेउ श्रवन सुधा सम
बानी (रा.च.मा. ७-२-२)। उनके कानमें जाकर बोले। तीन चौपाइयोंमें
श्रीराघवके आगमनका समाचार सुनाकर श्रीभरतको उन्होंने विरह, भय,
तथा विषादसे मुक्त किया। और भरतभद्रने नाहिन तात उरिन मैं तोही
(रा.च.मा. ७-२-१४) कहकर कृतज्ञता-ज्ञापन किया। ग्रन्थ-गौरवके भयसे
सूत्ररूपमें दिग्दर्शन कराया गया। विज्ञ पाठक तीनों प्रसंगोंकी स्वयं संगति
लगा लेंगे।
राम-काज करिबे को आतुर—श्रीरामकार्य करनेके लिए ये इतने
आतुर हैं कि क्षण-भर भी विश्राम उचित नहीं मानते, यथा—राम-काज
कीन्हे बिनु मोहि कहाँ बिश्राम (रा.च.मा. ५-१); और नागपाशमें बँधकर
भी लज्जाका अनुभव नहीं करते—
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
—रा.च.मा. ५-२२-६
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