श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौ. ७: बिद्यावान गुणी अति चतुर महावीरी व्याख्या
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुण भरे बिलोचन नीर॥
—रा.च.मा. ५-७
तृतीय बार नन्दिग्राममें भरतजीके समक्ष। यहाँ आञ्जनेयका लोकोत्तर चातुर्य
दृष्टिगोचर होता है। श्रीभरतभद्र अविराम अश्रुधारासे श्रीरामभद्रके भावनामय
पादपद्मका अभिषेक कर रहे हैं—राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन-
जलजात (रा.च.मा. ७-१ख)। अतः श्रीहनुमान्जी सामने नहीं आते।
क्योंकि अश्रुपात-कालमें ठीक-ठीक न दीख पड़नेसे पूर्वकी भाँति फिर
कोई अन्यथा अनुमान न हो जाए, इसलिए—बोलेउ श्रवन सुधा सम
बानी (रा.च.मा. ७-२-२)। उनके कानमें जाकर बोले। तीन चौपाइयोंमें
श्रीराघवके आगमनका समाचार सुनाकर श्रीभरतको उन्होंने विरह, भय,
तथा विषादसे मुक्त किया। और भरतभद्रने नाहिन तात उरिन मैं तोही
(रा.च.मा. ७-२-१४) कहकर कृतज्ञता-ज्ञापन किया। ग्रन्थ-गौरवके भयसे
सूत्ररूपमें दिग्दर्शन कराया गया। विज्ञ पाठक तीनों प्रसंगोंकी स्वयं संगति
लगा लेंगे।
राम-काज करिबे को आतुर—श्रीरामकार्य करनेके लिए ये इतने
आतुर हैं कि क्षण-भर भी विश्राम उचित नहीं मानते, यथा—राम-काज
कीन्हे बिनु मोहि कहाँ बिश्राम (रा.च.मा. ५-१); और नागपाशमें बँधकर
भी लज्जाका अनुभव नहीं करते—
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
—रा.च.मा. ५-२२-६
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