शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
मंगलाचरण, रावण-कैलाश प्रसंग एवं विनियोग-न्यास
शिव महिम्नस्तोत्र
और
शिवताण्डवस्तोत्र
भाषा-टीका सहित
रणधीर बुक सेल्स, हरिद्वार (उ०प्र०)
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शिव महिम्न स्तोत्र
और
शिव ताण्डव स्तोत्र
भाषा टीका सहित
★★★
टीकाकार—पं० ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी
मूल्य : चार रुपये
प्रकाशक :—
रणधीर बुक सेल्स (प्रकाशन)
हरिद्वार
शिवमहिम्न स्तोत्र की कथा
प्राचीन समय एक गन्धर्व किसी राजा के अन्तःपुर के
उपवन से प्रतिदिन फूल चुराकर ले जाया करता था। राजा
ने चोर पकड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन उसे देख न पाता
था। अन्त में राजा ने उस पुष्प चोर का पता लगाने के लिए
ये निश्चय किया कि शिव निर्माल्य (भगवान की मूर्ति से उतरे
हुए फूल) के लांघने से चोर की अन्तर्ध्यान होने की शक्ति नष्ट
हो जायेगी, इस विचार से राजा ने शिव पर चढ़ी हुई फूल
माला उपवन के द्वार पर बिखरवा दी।
फलस्वरूप गन्धर्वराज की उस पुष्पवाटिका में प्रवेश
करते ही शक्ति कुंठित हो गई। वह स्वयं को क्षीण समझने
लगा। उसने समाधि लगाकर तुरन्त ही इसके कारण का पता
लगाया। मालूम हुआ कि मेरी शक्ति शिव निर्माल्य के लांघने
से कुंठित हुई है।
यह जानकर उसने परम दयालु श्रीशंकर भगवान की
ये वर्णन रूपी महिमा (महिम्न स्तोत्र) का गान किया। उसी
स्तोत्र के बाद में शिव निर्माल्य तथा शिव स्तुति की विशेष
महत्ता का प्रचार हुआ। इस स्तुति के रचियता यही गंधर्व-
राज श्री पुष्पदन्त थे। इनकी यही रचना पुष्पदन्त विरचित
श्री शिव का महिम्न स्तोत्र के नाम से प्रसिद्ध हुई।
॥ गणेशाय नमः ॥
॥ अथ ॥
शिवमहिम्नस्तोत्रम्
॥ भाषाटीकासहितम् ॥
श्री पुष्पदन्त उवाच—
महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्।
ममाप्येष स्तोत्रे हर ! निरपवादः परिकरः ॥१॥
जानत न रावरी अनन्त महिमा को अन्त
याते अनुचित जो महेस ! गुन गाइबो,
हम तौ अग्यानी तो मैं ग्यानी ब्रह्म आदि हूँ की
बानि कौ लखात चूकी मूक बनि जाइबो ।
मति अनुरूप रूप गुन के निरूपन में
होत जो न काहू पै कलंक अंक लाइबो,
दोस आसुतोस ! तौ न मानिये हमारौ आज
गुन गाईबे को यौ कमर कसि आइबो ॥१॥
( ४ )
पुष्पदन्ताचार्य शिव की प्रार्थना करने लगे हे हर ! जो
तुम्हारी महिमा का वर्णन नहीं कर पाता उस मनुष्य की हुई
प्रार्थना जो तुम्हारे योग्य न होवे तो ब्रह्मा आदि देवता भी
तुम्हारी प्रार्थना नहीं कर सकते हैं । इससे सब मनुष्य व देवता
अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार प्रार्थना कर सकते हैं इस कारण
हे दुःखहरण ! इस स्तोत्र से हमारी भी स्तुति का प्रारम्भ दोष-
रहित है । १ ।
यदि कोई कहे कि महिमा का अन्त क्यों नहीं जाना जाता,
इसलिए दूसरा श्लोक कहते हैं ।
अतीत: पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो-
रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वार्वाचीने पतित न मनः कस्य न वचः ॥२॥
पथ सौं अतीत मन बानी के महत्व तव
श्रुतिहु चकित नेति नेति जो वदति है,
कौन गुन गावैं, है कितेक गुनवारो वह,
काकी उतै अलख अगोचर लौं गति है ।
भगत उधारन कौं धारण करौ जो रूप
विविध अनूप जाहि जोइ रही मति है,
काको मन वाकौं सदा ध्याइबो चहत नायँ
काकी गिरा नायँ गुन गाइबो चहति है ॥२॥
( ५ )
हे महेश्वर ! आपकी महिमा वाणी और मन की प्रवृत्ति से
बाहर है, इन दोनों को प्रवृत्ति अर्थात् संसार के सब पदार्थों में
होती है, अर्थात् हे शिव ! आपसे अलग की वस्तुओं को सब
कोई जान सकता है, वेद भी सन्देह से ही आपका वर्णन करता
है, इसी प्रकार वेद का भी सामर्थ्य नहीं है कि वे प्रत्यक्ष करा
दे, तो कौन आपकी विनय कर सके या गुण जान सके । २ ।
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत-
स्तव ब्रह्मन् किं ! वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः ।
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन ! बुद्धिर्व्यवसिता ॥३॥
मधु के बरस दिव्य सरस सुधा सौं सनी
बानी वेदमय निज मुख ते बखानी है,
तब मन रंजन निरंजन ! करेंगी कहा
देवगुरुहू की गुरुता सौं भरी वानी है ।
प्रभु गुन गान की महान् पुण्य पाइ आज
पावन बनेगी गिरा मेरी यह जानी है,
गुन अवगाहिबे की महिमा सराहिबे की
याही ते पुरारि जू ! सुमति उर आनि है ॥३॥
हे ब्रह्मन् ! देवताओं के गुरु वृहस्पति की भी प्रार्थना क्या
तुमको कुछ विस्मय करा सकती है ? क्योंकि यह अमृत के तुल्य
( ६ )
मधुर और अलंकार सहित वाणियों के कर्त्ता हैं। यदि उनकी
यह रीति है, तो मेरी क्या प्रभुता है ? हे त्रिपुरदहन ! मैं तो
केवल ‘पवित्र हो जाऊँ’ इससे ही तुम्हारे गुणों का स्मरण
किया है। ३।
तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद ! रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥४॥
विदित विभूति भूतनाथ तव संसृति को
सृजन भरन तैसे हरन करति है,
वेद ते भनित गुन भेद ते विभिन्न बपु
तीनि देव—विधि हरि हर में लसति है ।
ताहू की महत्ता और सत्ता खंडिबे के हेतु
निन्दा जगती में करें केते जड़मति हैं,
प्रीति होति जा में नाहिं पंडित प्रबीनन की,
मंगल बिहीनन की होति वा में रति है ॥४॥
हे वरद ! तीनों वेदों के सार-रूप जगत की उत्पत्ति रक्षा
और प्रलय का कारण जो आपका ऐश्वर्य है, वह सत्त्वगुण, रजो-
गुण, तमोगुण यह तीनों इस शरीर में वर्तमान हैं। अर्थात् ब्रह्मा
विष्णु शिव ये तुम्हारे ही सामर्थ्य से उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय
करते हैं। हे भगवान ! इस संसार में कुछ मूर्ख तुम्हारे ऐश्वर्य-
( ७ )
में भी 'सामर्थ्य सम्भव नहीं है' ऐसा कहते हैं, जिसको पापी
मंगलकारी समझते हैं । ४ ।
किमीहः किंकाय स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगत ॥५॥
कैसी करै ईहा, कैसी मन में समीहा करै,
कैसौ वाको तन, कैसो करत जतन है,
कौन ठाएं बैठि कै विधाता तीन लोकन कौ
कौन उपादान लै कै सारत सृजन है ।
कुतरक ऐसे रख मूरख लरत केते
मोह में परत ओह ! जन गन मन है,
वैभव अतर्क्य नाथ ! साथ सब शक्ति कहाँ,
रावरे मैं बावरे तरक कौ सरन है ॥५॥
कुछ महामूर्ख संसार के अज्ञान निमित्त यह कुतर्क करते हैं
कि यह ब्रह्मा किस इच्छा से किस शरीर से वा किस उपाय और
किस कारण से तीनों लोकों को उत्पन्न करता है ? क्योंकि
तुम्हारे ऐश्वर्य में संसार उत्पन्न करने के लिए कोई सामग्री
दुर्लभ नहीं है । ५ ।
( ८ )
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां ।
माधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो ।
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर ! संशेरत इमे ॥६॥
अमित अनूप रूप रंग अंग बारे तऊ,
ऐते सब लोक क्यों रे जन्म न धरत हैं,
कै धों या प्रपंच कौ न सिरजनहार कोऊ,
बिन करतार सृष्टि कारज सरत हैं ?
सिरजनहार जापै ईस छाँडि आन कोऊ,
सोऊ कौन साधन लै सृजन करत है ।
कारन कहा जो देव ! बारन तिहारौ करि
बार बार संशय में मूरख परत हैं ॥६॥
हे भगवन् ! भू आदि जो सात लोक हैं, वे सावयव हैं इनकी
उत्पत्ति क्या किसी से नहीं है ? जो अवयव सहित हैं, वे उत्पत्ति
सहित हैं । बिना ईश्वर की कृपा के संसार की रचना सम्भव
नहीं हो सकती और यदि बिना ईश्वर के संसार की उत्पत्ति है
तो उत्पत्ति में क्या सामग्री आवश्यक है, जिस प्रकार मूर्ख मीमां-
सक ईश्वर के होने में सन्देह करते हैं, अर्थात् आपके होने में कुछ
सन्देह नहीं है । ८ ।
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
( ६ )
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥७॥
तीन वेद, साँख्य, जोग सैव वैष्णवादि मत
भिन्न भिन्न मारग अनेक कहियतु है,
योई बड़ौ, वोई बड़ौ, यासौ लाभ, वासौं लाभ
सब रुचि भेद सों सरहि चहियतु है ।
केते गहैं सूधे, केते मारग असूधे गहैं,
अन्त सबही कौ एक आप लहियतु हैं ।
सरित प्रबाह बहै सूधी कै असूधी राह,
सतत अथाह सिंधु ही तौ गहियतु हैं ॥७॥
हे भगवन ! तीनों वेद, सांख्यशास्त्र, योग शास्त्र शैवमत,
और वैष्णवमत इन पाँचों के अलग-अलग मार्ग हैं । अपनी-अपनी
इच्छा के अनुसार इन मार्गों पर चलने वाले मनुष्य को फल में
पहुँचाने योग्य एक तुम्हीं हो । जैसे सीधे या टेढ़े मार्ग में बहती
हुई नदियों का रास्ता एक समुद्र ही है ॥७॥
महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ।
सुरास्तां तामृद्धिं विदधति भवदभूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥८॥
( १० )
रूढ़ौ बूढ़ौ बैल, पायौ खाटकौ, कुठार, चाम,
भस्म ब्याल, कर में कपाल छवि पावैं हैं,
वरद ! तिहारे ढिग कुल के भरन हित,
एतेक बरन उपकरन लखावै है ।
तोहू तव भुकुटि बिलासही ते देव सबै
पास रिद्धि सिद्धि कौ सुपास सदा पावै है,
आतम सरूप में जो मन को रमावै सदा,
विषय मरिचिका न ताहि भरमावै है ॥८॥
हे वरद ! आपके घर की वस्तु केवल इतनी ही है । महोक्ष
अर्थात् बूढ़ा बैल, खट्वांग अर्थात् खाट की पाटी, ब्रह्म का
कपाल, फरसा, सिंहचर्म, भस्म और सर्प, परन्तु देवता ही केवल
आपकी कृपा कटाक्ष से दी हुई ऋद्धियों को भोगते हैं, तो विषय-
रूपी मृगतृष्णा, (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श) और शब्दरूपी मृगतृष्णा,
ब्रह्मप्राप्त मनुष्य को भ्रम में नहीं डाल सकती ॥८॥
ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवञ्जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥९॥
कोऊ कहै सारौ यह जग कौ पसारौ नित्य,
कोऊ बिस्व अखिल अनित्य बतरावैं है,
कोऊ या सकल जग बीच भनै दोऊ भाव,
( ११ )
नित्य औ अनित्य या में पृथक लखावै है।
सुनि गुनि बात एती चित्त है चकित होत,
या ते गुन गावत न दास ये लजावै है,
बोलिबे को आदी हों, सुभाव बकबादीपन,
सोई त्रिपुरारि ! आज लाज बिसरावै है ॥६॥
हे त्रिपुरारि ! कोई-कोई बुद्धिमान इस संसार को स्थिर
और कोई अस्थिर और कोई स्थिरास्थिर (मिला हुआ) कहते
हैं। इस संसार के स्थिर और अस्थिर और स्थिरास्थिर होने
में प्रमाण न मिलने से बड़े भ्रम में पड़कर मैं तुम्हारी बराबर
स्तुति करता हुआ लज्जित होता हूँ फिर भी मेरी बकवास
ढिठाई कर रही है ॥६॥
तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरि विरिञ्चो हरिरधः
परिच्छेत्तुं यायावनलमनिलस्कन्धवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश ! यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥१०॥
तेज पुंजमय तव प्रकट हुतौ जो रूप
बाकी महिमा की थाह पाइबे जतन सों,
नीचे गयौ हरि विधि ऊरध गमन कीन्हौ
पार नहीं पायो, भयौ अपार श्रम तन सों ।
हारि थकि रावरे करन गुनगान लागे
श्रद्धा सौं गिरीस भूरि भक्ति भरे मन सों,
खाय कै तरस दियो आप ही दरस आप,
आवत न हाथ कहा नाथ के भजन सों ॥१०॥
( १२ )
हे गिरोश (हे कैलाशवासी शिवजी !) आपके ऐश्वय का
अन्त देखने को बड़े यत्न से विष्णु तो पाताल और ब्रह्मा
आकाश को गए तो भी आप के स्वरूप को न प्राप्त कर सके ।
पश्चात् बैठकर भक्ति और श्रद्धा से जब आपकी स्तुति करने
लगे तो प्रत्यक्ष हुए । क्या आपकी सेवा निष्फल होती है ? नहीं,
सर्वदा सफल ही होती है ॥१०॥
अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकां
दशास्यो यद्बाहूनभृतं रथकण्डूपरवशान
शिरःपद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबले
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥ १ १ ॥
कंटक बिहीन तीन लोक कौ अखण्ड राज
पायौ जो अधीन बिन जतन पसारे पै,
धारी जो सुदृढ़ दससीस ईस बीस भुजा
जुद्ध काज खाज जाकी जाय ना निवारे पै ।
सोऊ लखि परत पुरारी ! एक रावरेई
भारी शक्ति भाव को प्रभाव निराधारे पै,
करि उपहार धरयो कमल समान निज
मस्तक अमल पद कमल तिहारे पै ॥११॥
हे त्रिपुरासुर के मारने वाले शिव ! रावण नै अपने शिर-
रूपी कमलों की माला रचकर आपके चरणों का पूजन किया ।
इस दृढ़ भक्ति के प्रभाव से ही तीनों लोकों को बिना परिश्रम
( १३ )
से बिना शत्रु का कर अर्थात निष्कण्टक करके अपनी भुजाओं
को जो हर समय संग्राम को चाहती थीं, धारण किया ॥११॥
अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भुजवनं
बलात्कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलिताङ्गुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद्ध्रुवमुपचितो मुह्यतिखलः ॥१२॥
रावरौ भजन सब काल दस भाल करि
पायौ जो विसाल बाहु विपिन सबल है,
रवरेई बास कयलास के उठायबे में
ताहि कौ लगायौ, प्रगटायौ निज बल है ।
त्यौं ही आप नैसुक अंगूठा कौ हिलायौ सिरौ
नीचे लख्यौ नीच ना पतालहू में थल है ।
साँची यह बात, रिद्धि सिद्धि अधिकात लखि
फूल्यो ना समात, मोहि जात सदा खल है ॥१२॥
हे भगवन ! जिस रावण ने आपकी सेवा से बड़ा बलवान
भुजाओं का समूह प्राप्त कर आपके निवास स्थान कैलाश को
भी उठा लिया, फिर जब आपने स्वाभाविक पाँव के अंगूठे से
पर्वत को दबाया तब रावण को पाताल में भी स्थिर रहना
मुश्किल हो गया । मूर्ख मनुष्य बड़प्पन पाकर अभिमान को
प्राप्त होते हैं ॥१२॥
शिवताण्डव स्तोत्र मूल श्लोक एवं पद्यानुवाद (श्लोक १-१५)
( १४ )
यह्सिं सुत्राम्णो वरद ! परमोच्चैरपि सतो-
मधश्चके बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयो-
र्नकस्याप्युन्नतयै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥१३॥
ऊँची सुरपति की समूची जो समृद्धि ताहि
नीची करि राखी रिद्धि सिद्धि अधिकाइए ते,
परिजन सरिस प्रजा कौं तीन लोकन की,
कीन्हीं जो अधीन बलिसुत बल पाए ते ।
एहो बरदानी ! वा में बात है विचित्र कहा
रावरे चरन के भजन मन लाये ते,
बढ़त न को है, ऊँचे चढ़त न सोहै कौन
सामुहै तिहारे नाथ ! माथ के नवाए ते ॥१३॥
हे वर देने वाले ! आपके चरणों के प्रताप से त्रिभुवन को
वशीभूत करके परम उच्च इन्द्र पद को भी बाणासुर ने छोड़
दिया तो कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि आपके सामने जो सर
झुकाता है वह सब प्रकार से वृद्धि के अधिकारी ही होते
हैं ॥१३॥
अकाण्डब्रह्मांडक्षयचकितदेवासुरकृपा-
विधेयस्याऽसीद्यस्त्रिनयनविषं संहृतवतः ।
स कल्माषः कंठे तव न कुरुते न श्रियमहो !
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवनभय भङ्गव्यसनिनः ॥१४॥
( १५ )
अन्त ब्रह्माण्ड को अकाण्ड ई है है हंत
सोचत ससंक यौं सुरासुर को गन है,
पेखि है अधीन करना के तीन लोचन जु
पान करि कीन्हौं विष संकट समन है ।
यातें नीलकण्ठ ! नीलकण्ठ जो तिहारे अंक
सोहत सदाई बनि कण्ठ अभरन है,
वाकौ है बिकारहू सराहिदे के जोग जाकौं
भव भय भारन विदारन व्यसन है ॥१४॥
हे त्रिलोचन ! जिस समय समुद्र मन्थन से हलाहल विष
निकला उस समय देवता और राक्षसों को भय हुआ कि कहीं
असमय में हो संसार का नाश न हो जाय । तब कृपा कर उनकी
रक्षा के लिए जो आपने काल के समान विष को पान किया,
वह विष भी आपके कण्ठ में अत्यन्त शोभा दे रहा है । संसार
के भय को दूर करने वालों का विकार (नीलिमा) भी अच्छा
लगता है ॥१४॥
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।
स पश्यन्नीश ! त्वामितरसुरसाधारणमभृत
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥१५॥
( १६ )
देवन दनुज में, मनुज हूँ मैं जग बीच
जाके पंच सायक न रंच कबौ हारें है,
साधे बिनु काज पद आधेहु मुरत नायँ,
तुरत अधीन तीनों लोक करि डारे हैं।
सोऊ ईस ! मानि आन देव के समान तोहि
काम नाम सेस हैं अनंग गति धारे है,
बस करि राखै जो अतंद्र इन्द्रन कौं
तिन अपमान मान हितहू बिगारें हैं ॥१५॥
हे ईश ! जिस कामदेव के बाण ऐसे प्रबल हैं, देवता, राक्षस,
मनुष्यों से व्याप्त इस संसार में बिना अपना कार्य सिद्ध किए
कभी खाली नहीं होते हैं ऐसे कामदेव हे शिव ! आपको भी और
देवताओं के तुल्य साधारण देखने से उसका नाम मात्र हो बाकी
रह गया । अर्थात नेत्राग्नि से उसका शरीर भस्म हो गया ।
जितेन्द्रियों का अपमान करना लाभदायक नहीं होता है ॥१५॥
मही पादाघाताद व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद भुजपरिवरुग्णग्रहगणम् ।
मुहुद्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥१६॥
ताण्डव अकाण्ड में धमक पाय पायन की
डगमग धाम है धरा कौ धसकत है;
घूमत परिघ सी भुजान के अघात लागें
गात ग्रह गन के गगन कसकत है ।
( १७ )
छूटे जटाजूटन के झोकन ते बार बार
ताड़ित द्युलोक ओक हूँ ते खसकत है,
एते पै कहत जग राखिबे को नाचो आप
सांचोई प्रभुत्व वाम है कै विलसत है ॥१६॥
हे भगवान् ! आप तो संसार की रक्षा के लिए नृत्य करते
रहते हो अर्थात् राक्षसों को नृत्य के आनन्द में मग्न कर उनसे
कराते हो, और नृत्य के समय पैर की धमक से पृथ्वी भी सन्देह
करती है कि 'मैं टूटी जाती हूँ या पाताल में धंसी जाती हूँ।'
जिस प्रकार भुजाओं के घूमने से विष्णु के स्थान (आकाश) के
तारागण टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। उसी प्रकार लम्बी-लम्बी
जटा को बार-बार झटकारने से देवलोक मार खाकर कठिनता
से थमा रहता है। हे शिव ! आपकी प्रभुता बड़ी विचित्र
है ॥१६॥
वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते ।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि-
त्येनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥१७:।
जाते प्रगटत पय फेन को प्रकास दिव्य
धारा में मिलित तारागन सौं गुनित होत,
जाते सिंध संवृत अखण्ड महीमंडलहू
द्वीपरूप है कै हलखात औ भनित होत ।
( १८ )
सोई व्योमव्यापी वारिवुन्द को प्रवाह नाथ !
माथ पै तिहारे लघु बिंदु ज्यौं लसित होत,
याही ते महेश जु ! अनूप रूप रावरे की
दिव्यता महत्ता जानी जात अनुमित होत ॥१७॥
हे शिव ! तारागणों से चमकता हुआ आकाश गंगा का
जलसमूह जो आकाश पर्यन्त व्याप्त हो रहा है, सो आपके सिर
पर सूक्ष्म जलकणों के समान दीखता है परन्तु आपने उतने ही
जल से समुद्र की तरह इस महाद्वीपाकार संसार को चारों ओर
से घेर लिया है, सो हे भगवन ! आपके दिव्य शरीर के महत्व
का विस्तार इसी दृष्टान्त में अनुमान करने योग्य है ॥१७॥
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणि शर इति ।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधिर्विधेयैः
क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥१८॥
रथ वसुधा कौ; चाकौ सूर औ सुधाकर सों
सारथि कौ पद पदमासन कौ दीन्हो है,
आपही रथी हैं चाप लीन्हों मेरु मंदर कौ
अनुज पुरन्दर कौ बानरूप कीन्हो है।
तृन से त्रिपुर कों जराइबे के काज कैसो
साज यों अडम्बर कौ साज साथ लीन्हों है,
खेलति बिधेयन सों मति परमेसर की
परम स्वतन्त्र है, न काहू बस कीन्हो है ॥१८॥