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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( १३ )
से बिना शत्रु का कर अर्थात निष्कण्टक करके अपनी भुजाओं
को जो हर समय संग्राम को चाहती थीं, धारण किया ॥११॥
अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भुजवनं
बलात्कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलिताङ्गुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद्ध्रुवमुपचितो मुह्यतिखलः ॥१२॥
रावरौ भजन सब काल दस भाल करि
पायौ जो विसाल बाहु विपिन सबल है,
रवरेई बास कयलास के उठायबे में
ताहि कौ लगायौ, प्रगटायौ निज बल है ।
त्यौं ही आप नैसुक अंगूठा कौ हिलायौ सिरौ
नीचे लख्यौ नीच ना पतालहू में थल है ।
साँची यह बात, रिद्धि सिद्धि अधिकात लखि
फूल्यो ना समात, मोहि जात सदा खल है ॥१२॥
हे भगवन ! जिस रावण ने आपकी सेवा से बड़ा बलवान
भुजाओं का समूह प्राप्त कर आपके निवास स्थान कैलाश को
भी उठा लिया, फिर जब आपने स्वाभाविक पाँव के अंगूठे से
पर्वत को दबाया तब रावण को पाताल में भी स्थिर रहना
मुश्किल हो गया । मूर्ख मनुष्य बड़प्पन पाकर अभिमान को
प्राप्त होते हैं ॥१२॥