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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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शिवमहिम्न स्तोत्र की कथा
प्राचीन समय एक गन्धर्व किसी राजा के अन्तःपुर के
उपवन से प्रतिदिन फूल चुराकर ले जाया करता था। राजा
ने चोर पकड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन उसे देख न पाता
था। अन्त में राजा ने उस पुष्प चोर का पता लगाने के लिए
ये निश्चय किया कि शिव निर्माल्य (भगवान की मूर्ति से उतरे
हुए फूल) के लांघने से चोर की अन्तर्ध्यान होने की शक्ति नष्ट
हो जायेगी, इस विचार से राजा ने शिव पर चढ़ी हुई फूल
माला उपवन के द्वार पर बिखरवा दी।
फलस्वरूप गन्धर्वराज की उस पुष्पवाटिका में प्रवेश
करते ही शक्ति कुंठित हो गई। वह स्वयं को क्षीण समझने
लगा। उसने समाधि लगाकर तुरन्त ही इसके कारण का पता
लगाया। मालूम हुआ कि मेरी शक्ति शिव निर्माल्य के लांघने
से कुंठित हुई है।
यह जानकर उसने परम दयालु श्रीशंकर भगवान की
ये वर्णन रूपी महिमा (महिम्न स्तोत्र) का गान किया। उसी
स्तोत्र के बाद में शिव निर्माल्य तथा शिव स्तुति की विशेष
महत्ता का प्रचार हुआ। इस स्तुति के रचियता यही गंधर्व-
राज श्री पुष्पदन्त थे। इनकी यही रचना पुष्पदन्त विरचित
श्री शिव का महिम्न स्तोत्र के नाम से प्रसिद्ध हुई।