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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 18

( १६ )
देवन दनुज में, मनुज हूँ मैं जग बीच
जाके पंच सायक न रंच कबौ हारें है,
साधे बिनु काज पद आधेहु मुरत नायँ,
तुरत अधीन तीनों लोक करि डारे हैं।
सोऊ ईस ! मानि आन देव के समान तोहि
काम नाम सेस हैं अनंग गति धारे है,
बस करि राखै जो अतंद्र इन्द्रन कौं
तिन अपमान मान हितहू बिगारें हैं ॥१५॥
हे ईश ! जिस कामदेव के बाण ऐसे प्रबल हैं, देवता, राक्षस,
मनुष्यों से व्याप्त इस संसार में बिना अपना कार्य सिद्ध किए
कभी खाली नहीं होते हैं ऐसे कामदेव हे शिव ! आपको भी और
देवताओं के तुल्य साधारण देखने से उसका नाम मात्र हो बाकी
रह गया । अर्थात नेत्राग्नि से उसका शरीर भस्म हो गया ।
जितेन्द्रियों का अपमान करना लाभदायक नहीं होता है ॥१५॥
मही पादाघाताद व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद भुजपरिवरुग्णग्रहगणम् ।
मुहुद्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥१६॥
ताण्डव अकाण्ड में धमक पाय पायन की
डगमग धाम है धरा कौ धसकत है;
घूमत परिघ सी भुजान के अघात लागें
गात ग्रह गन के गगन कसकत है ।