शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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हे गिरोश (हे कैलाशवासी शिवजी !) आपके ऐश्वय का
अन्त देखने को बड़े यत्न से विष्णु तो पाताल और ब्रह्मा
आकाश को गए तो भी आप के स्वरूप को न प्राप्त कर सके ।
पश्चात् बैठकर भक्ति और श्रद्धा से जब आपकी स्तुति करने
लगे तो प्रत्यक्ष हुए । क्या आपकी सेवा निष्फल होती है ? नहीं,
सर्वदा सफल ही होती है ॥१०॥
अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकां
दशास्यो यद्बाहूनभृतं रथकण्डूपरवशान
शिरःपद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबले
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥ १ १ ॥
कंटक बिहीन तीन लोक कौ अखण्ड राज
पायौ जो अधीन बिन जतन पसारे पै,
धारी जो सुदृढ़ दससीस ईस बीस भुजा
जुद्ध काज खाज जाकी जाय ना निवारे पै ।
सोऊ लखि परत पुरारी ! एक रावरेई
भारी शक्ति भाव को प्रभाव निराधारे पै,
करि उपहार धरयो कमल समान निज
मस्तक अमल पद कमल तिहारे पै ॥११॥
हे त्रिपुरासुर के मारने वाले शिव ! रावण नै अपने शिर-
रूपी कमलों की माला रचकर आपके चरणों का पूजन किया ।
इस दृढ़ भक्ति के प्रभाव से ही तीनों लोकों को बिना परिश्रम