शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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में भी 'सामर्थ्य सम्भव नहीं है' ऐसा कहते हैं, जिसको पापी
मंगलकारी समझते हैं । ४ ।
किमीहः किंकाय स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगत ॥५॥
कैसी करै ईहा, कैसी मन में समीहा करै,
कैसौ वाको तन, कैसो करत जतन है,
कौन ठाएं बैठि कै विधाता तीन लोकन कौ
कौन उपादान लै कै सारत सृजन है ।
कुतरक ऐसे रख मूरख लरत केते
मोह में परत ओह ! जन गन मन है,
वैभव अतर्क्य नाथ ! साथ सब शक्ति कहाँ,
रावरे मैं बावरे तरक कौ सरन है ॥५॥
कुछ महामूर्ख संसार के अज्ञान निमित्त यह कुतर्क करते हैं
कि यह ब्रह्मा किस इच्छा से किस शरीर से वा किस उपाय और
किस कारण से तीनों लोकों को उत्पन्न करता है ? क्योंकि
तुम्हारे ऐश्वर्य में संसार उत्पन्न करने के लिए कोई सामग्री
दुर्लभ नहीं है । ५ ।