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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( ८ )
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां ।
माधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो ।
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर ! संशेरत इमे ॥६॥
अमित अनूप रूप रंग अंग बारे तऊ,
ऐते सब लोक क्यों रे जन्म न धरत हैं,
कै धों या प्रपंच कौ न सिरजनहार कोऊ,
बिन करतार सृष्टि कारज सरत हैं ?
सिरजनहार जापै ईस छाँडि आन कोऊ,
सोऊ कौन साधन लै सृजन करत है ।
कारन कहा जो देव ! बारन तिहारौ करि
बार बार संशय में मूरख परत हैं ॥६॥
हे भगवन् ! भू आदि जो सात लोक हैं, वे सावयव हैं इनकी
उत्पत्ति क्या किसी से नहीं है ? जो अवयव सहित हैं, वे उत्पत्ति
सहित हैं । बिना ईश्वर की कृपा के संसार की रचना सम्भव
नहीं हो सकती और यदि बिना ईश्वर के संसार की उत्पत्ति है
तो उत्पत्ति में क्या सामग्री आवश्यक है, जिस प्रकार मूर्ख मीमां-
सक ईश्वर के होने में सन्देह करते हैं, अर्थात् आपके होने में कुछ
सन्देह नहीं है । ८ ।
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।