शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
DevanagariHindipublished52 पृष्ठ
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॥ गणेशाय नमः ॥
॥ अथ ॥
शिवमहिम्नस्तोत्रम्
॥ भाषाटीकासहितम् ॥
श्री पुष्पदन्त उवाच—
महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्।
ममाप्येष स्तोत्रे हर ! निरपवादः परिकरः ॥१॥
जानत न रावरी अनन्त महिमा को अन्त
याते अनुचित जो महेस ! गुन गाइबो,
हम तौ अग्यानी तो मैं ग्यानी ब्रह्म आदि हूँ की
बानि कौ लखात चूकी मूक बनि जाइबो ।
मति अनुरूप रूप गुन के निरूपन में
होत जो न काहू पै कलंक अंक लाइबो,
दोस आसुतोस ! तौ न मानिये हमारौ आज
गुन गाईबे को यौ कमर कसि आइबो ॥१॥