शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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पुष्पदन्ताचार्य शिव की प्रार्थना करने लगे हे हर ! जो
तुम्हारी महिमा का वर्णन नहीं कर पाता उस मनुष्य की हुई
प्रार्थना जो तुम्हारे योग्य न होवे तो ब्रह्मा आदि देवता भी
तुम्हारी प्रार्थना नहीं कर सकते हैं । इससे सब मनुष्य व देवता
अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार प्रार्थना कर सकते हैं इस कारण
हे दुःखहरण ! इस स्तोत्र से हमारी भी स्तुति का प्रारम्भ दोष-
रहित है । १ ।
यदि कोई कहे कि महिमा का अन्त क्यों नहीं जाना जाता,
इसलिए दूसरा श्लोक कहते हैं ।
अतीत: पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो-
रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वार्वाचीने पतित न मनः कस्य न वचः ॥२॥
पथ सौं अतीत मन बानी के महत्व तव
श्रुतिहु चकित नेति नेति जो वदति है,
कौन गुन गावैं, है कितेक गुनवारो वह,
काकी उतै अलख अगोचर लौं गति है ।
भगत उधारन कौं धारण करौ जो रूप
विविध अनूप जाहि जोइ रही मति है,
काको मन वाकौं सदा ध्याइबो चहत नायँ
काकी गिरा नायँ गुन गाइबो चहति है ॥२॥