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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 19

( १७ )
छूटे जटाजूटन के झोकन ते बार बार
ताड़ित द्युलोक ओक हूँ ते खसकत है,
एते पै कहत जग राखिबे को नाचो आप
सांचोई प्रभुत्व वाम है कै विलसत है ॥१६॥
हे भगवान् ! आप तो संसार की रक्षा के लिए नृत्य करते
रहते हो अर्थात् राक्षसों को नृत्य के आनन्द में मग्न कर उनसे
कराते हो, और नृत्य के समय पैर की धमक से पृथ्वी भी सन्देह
करती है कि 'मैं टूटी जाती हूँ या पाताल में धंसी जाती हूँ।'
जिस प्रकार भुजाओं के घूमने से विष्णु के स्थान (आकाश) के
तारागण टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। उसी प्रकार लम्बी-लम्बी
जटा को बार-बार झटकारने से देवलोक मार खाकर कठिनता
से थमा रहता है। हे शिव ! आपकी प्रभुता बड़ी विचित्र
है ॥१६॥
वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते ।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि-
त्येनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥१७:।
जाते प्रगटत पय फेन को प्रकास दिव्य
धारा में मिलित तारागन सौं गुनित होत,
जाते सिंध संवृत अखण्ड महीमंडलहू
द्वीपरूप है कै हलखात औ भनित होत ।