शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ )
सोई व्योमव्यापी वारिवुन्द को प्रवाह नाथ !
माथ पै तिहारे लघु बिंदु ज्यौं लसित होत,
याही ते महेश जु ! अनूप रूप रावरे की
दिव्यता महत्ता जानी जात अनुमित होत ॥१७॥
हे शिव ! तारागणों से चमकता हुआ आकाश गंगा का
जलसमूह जो आकाश पर्यन्त व्याप्त हो रहा है, सो आपके सिर
पर सूक्ष्म जलकणों के समान दीखता है परन्तु आपने उतने ही
जल से समुद्र की तरह इस महाद्वीपाकार संसार को चारों ओर
से घेर लिया है, सो हे भगवन ! आपके दिव्य शरीर के महत्व
का विस्तार इसी दृष्टान्त में अनुमान करने योग्य है ॥१७॥
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणि शर इति ।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधिर्विधेयैः
क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥१८॥
रथ वसुधा कौ; चाकौ सूर औ सुधाकर सों
सारथि कौ पद पदमासन कौ दीन्हो है,
आपही रथी हैं चाप लीन्हों मेरु मंदर कौ
अनुज पुरन्दर कौ बानरूप कीन्हो है।
तृन से त्रिपुर कों जराइबे के काज कैसो
साज यों अडम्बर कौ साज साथ लीन्हों है,
खेलति बिधेयन सों मति परमेसर की
परम स्वतन्त्र है, न काहू बस कीन्हो है ॥१८॥