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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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मधुर और अलंकार सहित वाणियों के कर्त्ता हैं। यदि उनकी
यह रीति है, तो मेरी क्या प्रभुता है ? हे त्रिपुरदहन ! मैं तो
केवल ‘पवित्र हो जाऊँ’ इससे ही तुम्हारे गुणों का स्मरण
किया है। ३।
तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद ! रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥४॥
विदित विभूति भूतनाथ तव संसृति को
सृजन भरन तैसे हरन करति है,
वेद ते भनित गुन भेद ते विभिन्न बपु
तीनि देव—विधि हरि हर में लसति है ।
ताहू की महत्ता और सत्ता खंडिबे के हेतु
निन्दा जगती में करें केते जड़मति हैं,
प्रीति होति जा में नाहिं पंडित प्रबीनन की,
मंगल बिहीनन की होति वा में रति है ॥४॥
हे वरद ! तीनों वेदों के सार-रूप जगत की उत्पत्ति रक्षा
और प्रलय का कारण जो आपका ऐश्वर्य है, वह सत्त्वगुण, रजो-
गुण, तमोगुण यह तीनों इस शरीर में वर्तमान हैं। अर्थात् ब्रह्मा
विष्णु शिव ये तुम्हारे ही सामर्थ्य से उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय
करते हैं। हे भगवान ! इस संसार में कुछ मूर्ख तुम्हारे ऐश्वर्य-