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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 52 में से

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पृष्ठ 17

( १५ )
अन्त ब्रह्माण्ड को अकाण्ड ई है है हंत
सोचत ससंक यौं सुरासुर को गन है,
पेखि है अधीन करना के तीन लोचन जु
पान करि कीन्हौं विष संकट समन है ।
यातें नीलकण्ठ ! नीलकण्ठ जो तिहारे अंक
सोहत सदाई बनि कण्ठ अभरन है,
वाकौ है बिकारहू सराहिदे के जोग जाकौं
भव भय भारन विदारन व्यसन है ॥१४॥
हे त्रिलोचन ! जिस समय समुद्र मन्थन से हलाहल विष
निकला उस समय देवता और राक्षसों को भय हुआ कि कहीं
असमय में हो संसार का नाश न हो जाय । तब कृपा कर उनकी
रक्षा के लिए जो आपने काल के समान विष को पान किया,
वह विष भी आपके कण्ठ में अत्यन्त शोभा दे रहा है । संसार
के भय को दूर करने वालों का विकार (नीलिमा) भी अच्छा
लगता है ॥१४॥
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।
स पश्यन्नीश ! त्वामितरसुरसाधारणमभृत
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥१५॥