सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 52 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 7

( ५ )
हे महेश्वर ! आपकी महिमा वाणी और मन की प्रवृत्ति से
बाहर है, इन दोनों को प्रवृत्ति अर्थात् संसार के सब पदार्थों में
होती है, अर्थात् हे शिव ! आपसे अलग की वस्तुओं को सब
कोई जान सकता है, वेद भी सन्देह से ही आपका वर्णन करता
है, इसी प्रकार वेद का भी सामर्थ्य नहीं है कि वे प्रत्यक्ष करा
दे, तो कौन आपकी विनय कर सके या गुण जान सके । २ ।
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत-
स्तव ब्रह्मन् किं ! वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः ।
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन ! बुद्धिर्व्यवसिता ॥३॥
मधु के बरस दिव्य सरस सुधा सौं सनी
बानी वेदमय निज मुख ते बखानी है,
तब मन रंजन निरंजन ! करेंगी कहा
देवगुरुहू की गुरुता सौं भरी वानी है ।
प्रभु गुन गान की महान् पुण्य पाइ आज
पावन बनेगी गिरा मेरी यह जानी है,
गुन अवगाहिबे की महिमा सराहिबे की
याही ते पुरारि जू ! सुमति उर आनि है ॥३॥
हे ब्रह्मन् ! देवताओं के गुरु वृहस्पति की भी प्रार्थना क्या
तुमको कुछ विस्मय करा सकती है ? क्योंकि यह अमृत के तुल्य