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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( ११ )
नित्य औ अनित्य या में पृथक लखावै है।
सुनि गुनि बात एती चित्त है चकित होत,
या ते गुन गावत न दास ये लजावै है,
बोलिबे को आदी हों, सुभाव बकबादीपन,
सोई त्रिपुरारि ! आज लाज बिसरावै है ॥६॥
हे त्रिपुरारि ! कोई-कोई बुद्धिमान इस संसार को स्थिर
और कोई अस्थिर और कोई स्थिरास्थिर (मिला हुआ) कहते
हैं। इस संसार के स्थिर और अस्थिर और स्थिरास्थिर होने
में प्रमाण न मिलने से बड़े भ्रम में पड़कर मैं तुम्हारी बराबर
स्तुति करता हुआ लज्जित होता हूँ फिर भी मेरी बकवास
ढिठाई कर रही है ॥६॥
तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरि विरिञ्चो हरिरधः
परिच्छेत्तुं यायावनलमनिलस्कन्धवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश ! यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥१०॥
तेज पुंजमय तव प्रकट हुतौ जो रूप
बाकी महिमा की थाह पाइबे जतन सों,
नीचे गयौ हरि विधि ऊरध गमन कीन्हौ
पार नहीं पायो, भयौ अपार श्रम तन सों ।
हारि थकि रावरे करन गुनगान लागे
श्रद्धा सौं गिरीस भूरि भक्ति भरे मन सों,
खाय कै तरस दियो आप ही दरस आप,
आवत न हाथ कहा नाथ के भजन सों ॥१०॥