शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shiva Tandava Stotram of Ravana
दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 16, कुल 52 में से
संदर्भ में पढ़ें( १४ )
यह्सिं सुत्राम्णो वरद ! परमोच्चैरपि सतो-
मधश्चके बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयो-
र्नकस्याप्युन्नतयै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥१३॥
ऊँची सुरपति की समूची जो समृद्धि ताहि
नीची करि राखी रिद्धि सिद्धि अधिकाइए ते,
परिजन सरिस प्रजा कौं तीन लोकन की,
कीन्हीं जो अधीन बलिसुत बल पाए ते ।
एहो बरदानी ! वा में बात है विचित्र कहा
रावरे चरन के भजन मन लाये ते,
बढ़त न को है, ऊँचे चढ़त न सोहै कौन
सामुहै तिहारे नाथ ! माथ के नवाए ते ॥१३॥
हे वर देने वाले ! आपके चरणों के प्रताप से त्रिभुवन को
वशीभूत करके परम उच्च इन्द्र पद को भी बाणासुर ने छोड़
दिया तो कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि आपके सामने जो सर
झुकाता है वह सब प्रकार से वृद्धि के अधिकारी ही होते
हैं ॥१३॥
अकाण्डब्रह्मांडक्षयचकितदेवासुरकृपा-
विधेयस्याऽसीद्यस्त्रिनयनविषं संहृतवतः ।
स कल्माषः कंठे तव न कुरुते न श्रियमहो !
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवनभय भङ्गव्यसनिनः ॥१४॥