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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( ६ )
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥७॥
तीन वेद, साँख्य, जोग सैव वैष्णवादि मत
भिन्न भिन्न मारग अनेक कहियतु है,
योई बड़ौ, वोई बड़ौ, यासौ लाभ, वासौं लाभ
सब रुचि भेद सों सरहि चहियतु है ।
केते गहैं सूधे, केते मारग असूधे गहैं,
अन्त सबही कौ एक आप लहियतु हैं ।
सरित प्रबाह बहै सूधी कै असूधी राह,
सतत अथाह सिंधु ही तौ गहियतु हैं ॥७॥
हे भगवन ! तीनों वेद, सांख्यशास्त्र, योग शास्त्र शैवमत,
और वैष्णवमत इन पाँचों के अलग-अलग मार्ग हैं । अपनी-अपनी
इच्छा के अनुसार इन मार्गों पर चलने वाले मनुष्य को फल में
पहुँचाने योग्य एक तुम्हीं हो । जैसे सीधे या टेढ़े मार्ग में बहती
हुई नदियों का रास्ता एक समुद्र ही है ॥७॥
महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ।
सुरास्तां तामृद्धिं विदधति भवदभूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥८॥