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सर्वकोश
शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

शिवताण्डव स्तोत्रम् (लङ्काधिपति रावण प्रणीत - सान्वय संस्कृत मूल एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shiva Tandava Stotram of Ravana

दशानन रावण (व्याख्याकार: पं. ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( १० )
रूढ़ौ बूढ़ौ बैल, पायौ खाटकौ, कुठार, चाम,
भस्म ब्याल, कर में कपाल छवि पावैं हैं,
वरद ! तिहारे ढिग कुल के भरन हित,
एतेक बरन उपकरन लखावै है ।
तोहू तव भुकुटि बिलासही ते देव सबै
पास रिद्धि सिद्धि कौ सुपास सदा पावै है,
आतम सरूप में जो मन को रमावै सदा,
विषय मरिचिका न ताहि भरमावै है ॥८॥
हे वरद ! आपके घर की वस्तु केवल इतनी ही है । महोक्ष
अर्थात् बूढ़ा बैल, खट्वांग अर्थात् खाट की पाटी, ब्रह्म का
कपाल, फरसा, सिंहचर्म, भस्म और सर्प, परन्तु देवता ही केवल
आपकी कृपा कटाक्ष से दी हुई ऋद्धियों को भोगते हैं, तो विषय-
रूपी मृगतृष्णा, (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श) और शब्दरूपी मृगतृष्णा,
ब्रह्मप्राप्त मनुष्य को भ्रम में नहीं डाल सकती ॥८॥
ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवञ्जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥९॥
कोऊ कहै सारौ यह जग कौ पसारौ नित्य,
कोऊ बिस्व अखिल अनित्य बतरावैं है,
कोऊ या सकल जग बीच भनै दोऊ भाव,