सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
( ५ )
फिर भी बहिरन्तर साक्ष्यों के आधार पर उनका कनिष्ककालीन होना सिद्ध
होता है । इस संदर्भ में निम्नलिखित तर्क परीक्ष्य हैं—
( १ ) चीनदेश के प्रसिद्ध प्रवासी ह्वेनसांग ने सौमान्तिक सम्प्रदाय का
प्रथम आचार्य कुमारजीव या कुमारलब्ध को माना है। इनके अनुसार उस समय
चारों दिशाओं में बौद्ध धर्म के चार आचार्य थे । पूर्व में अश्वघोष, दक्षिण में
देव, पश्चिम में नागार्जुन तथा उत्तर में कुमारजीव नामक संस्थापक
आचार्य थे ।
( २ ) अनेक विद्वान् इस सिद्धान्त के पक्षधर हैं कि सम्राट् कनिष्क द्वारा
कुण्डलवन विहार में एक संगीति बुलाई गई थी । उस संगीति का पुण्य गौरव
अश्वघोष को प्राप्त है । एक चीनी परम्परा के अनुसार उस संगीति के सभापति
वसुमित्र तथा उपसभापति अश्वघोष थे ।
( ३ ) कुछ आलोचक शालिवाहन संवत् का आरम्भ कनिष्क की देन
मानते हैं । यह संवत् ७८ ई० से प्रारम्भ हुआ था । इस समय अश्वघोष का
अस्तित्व माना जाता है । सौन्दरनन्द महाकाव्य की भूमिका में डॉ० हरप्रसाद
शास्त्री ने अश्वघोष का समय ईसा के प्रथम शताब्दी का अन्तिम चरण
माना है ।
( ४ ) अपने 'संस्कृत-साहित्य का इतिहास' पृ० ५१६ में बलदेव उपाध्याय
ने अश्वघोष का समय एक से पचपन ईसवी के बीच का समय माना है ।
( ५ ) अपने सौन्दरनन्द की भूमिका में ई० एच० जान्स्टन ने अति-
प्रामाणिक ढंग से अश्वघोष का स्थितिकाल माना है ।
( ६ ) 'महाप्रज्ञापारमिताशास्त्र' नामक बौद्धग्रन्थों का चीनी अनुवाद—
सांग इंग की निर्वाण-तिथि ५०० वर्ष पश्चात् अश्वघोष की स्थिति को स्वीकार
करता है; किन्तु उसके भाष्यकार हुई ईन निर्वाण-तिथि के ३७० वर्ष बाद कवि
की सत्ता स्वीकार करता है ।
( ७ ) अश्वघोषकृत 'बुद्धचरित' का चीनी अनुवाद उपलब्ध है । यह
अनुवाद ईसा के पंचमशती के प्रारंभ का है । निश्चय ही भारत में पर्याप्त प्रचार
के बाद ही इसके चीनी अनुवाद की संभावना की जा सकती है । इससे भी यह
प्रमाणित होता है कि अश्वघोष का स्थितिकाल ई० ५०० से बहुत पहले
का होगा ।
( ८ ) नागार्जुन के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी 'जग्गय्यपेटस्तूप' से
मिलती है । यह स्तूप ईसा के तृतीय शती का है । नागार्जुन के किसी मित्र ने
इसे उत्कीर्णित किया था । अश्वघोष इनसे दो सरणि पूर्व हुए थे । नागार्जुन
सातवाहन नरेश के मित्र थे, जो बौद्धनागार्जुन ही थे और ये गौतमीपुत्र
'यज्ञश्री' के समकालीन थे । 'बौद्धधर्म के २५०० वर्ष पूर्व' नामक ग्रन्थ के
( ६ )
पृ० १६० में पी० वी० आप्टे ने इनका स्थितिकाल १६६ से १९६ ई० माना
है। इससे भी अश्वघोष का समय प्रथम शती ही जान पड़ता है।
( ९ ) बुद्धचरित के अन्तिम सर्ग में अशोक का उल्लेख मिलता है। अतः
निश्चितरूप से अश्वघोष सम्राट् अशोक के परवर्ती हैं।
( १० ) महाराज कनिष्क की राजसभा में अश्वघोष, माठर तथा आयुर्वेद-
विशारद चरक एक साथ राजपण्डित थे। 'कु-का-त्सेन-पिन-च्युन-किंग' ( सं०
१३४० भाग ५, ४७२ ई० ) नामक पुस्तक में भी कनिष्क की सभा में तीनों
विद्वानों की उपस्थिति का उल्लेख है। उक्त तीनों विद्वानों की कनिष्क की
राजसभा में एक साथ उपस्थिति की सूचना 'चीनी संयुक्त रत्नपिटक सूत्र सं०
१३२९, भाग ३, ४७२ ई०' में भी मिलती है।
( ११ ) सिल्वां लेवी अश्वघोष को कनिष्क का सम-सामयिक एवं
नागार्जुन के पूर्ववर्ती मानते हैं।
( १२ ) चीनी परम्परा के अनुसार अश्वघोष सम्राट् कनिष्क के धर्मगुरु
थे। अभिधर्मपिटक की विभाषा नामक व्याख्या इसी समय लिखी गई थी। यह
व्याख्या ७८-१०० ई० के बीच लिखी गई थी।
( १३ ) प्रोफेसर ल्यूडर्स अश्वघोष-रचित शारिपुत्र-प्रकरण के आधार पर
यह मानते हैं कि उनकी रचना कनिष्क या हुविष्क के राज्यकाल में हुई थी।
( १४ ) डॉ० राधाकृष्णन् भी अश्वघोष को प्रथम शताब्दी में स्थित
कनिष्क का धार्मिक गुरु मानते हैं।
( १५ ) पी० बी० काणे भी अश्वघोष-कृत बुद्धचरित का रचनाकाल प्रथम
शताब्दी ही मानते हैं।
अश्वघोष सम्बन्धी उपर्युक्त बहिरन्तर्गत प्रमाणों के आधार पर इनका
स्थितिकाल प्रथम बौद्ध सम्राट् प्रियदर्शी अशोक के पश्चात् तथा द्वितीय बौद्ध
सम्राट् कनिष्क के समकालीन मानना युक्तिसंगत होगा। यद्यपि कनिष्क की
स्थिति विवादग्रस्त अवश्य रही है, किन्तु भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों के
मतानुसार अश्वघोष को ईसा के प्रथम शताब्दी में मानना ही अधिक युक्ति-
संगत प्रतीत होता है। सम्राट् कनिष्क की स्थिति यदि ७८ ई० निर्णीत है तो
अश्वघोष का भी यही समय मानना उपयुक्त प्रतीत होता है।
जीवनवृत्त—अश्वघोष सुवर्णाक्षी के पुत्र थे। इनका जन्मस्थान साकेत
था। ये आर्य, भदन्त, महापण्डित, महावादिन् तथा महाराज आदि विरुदों से
अलंकृत थे।
सौन्दरनन्द महाकाव्य की पुष्पिका तथा बुद्धचरित के अनुपलब्ध मूल के
तिब्बती अनुवाद के आधार पर डॉ० जान्स्टन कृत आंग्ल अनुवाद की पुष्पिका
से यह स्पष्ट है कि वे साकेत-निवासी थे। उनकी माता का नाम सुवर्णाक्षी था।
( ७ )
भदन्त अपने युग के युगद्रष्टा, क्रान्तिकारी विचारक, महान् सन्त एवं
जीवन-सर्जक एक बौद्ध संन्यासी थे । वैसे तो बौद्धधर्म, परोपकार, अध्यात्म-
साधना में ही उनका जीवन-प्रवाह था, लेकिन कला, दर्शन, साहित्य, काव्य,
धर्मनीति, मोक्षोपाय और आयुर्वेदविज्ञान में भी वे अद्भुत एवं अद्वितीय थे ।
अपने महाकाव्यों में उन्होंने जो कुछ लिखा, पहले अपने जीवन में उन्होंने
उनका प्रयोग किया। वे सब उनके जीवन की आत्यन्तिक गहराइयों और
अनुभूतियों से उद्भूत हैं। उन्होंने जागतिक जीवन की गहनतम समस्याओं की
जड़ों का स्पर्श किया है। कामासक्त मानव-जीवन को उसकी समग्रता में
जानने, जीने और उससे मुक्तिपथ के वे जीवन्त यात्री थे ।
अश्वघोष ने 'बुद्धचरित' और 'सौन्दरनन्द' नामक प्रबन्ध काव्यों में बुद्ध
के जीवन के मार्मिक प्रसंगों और रससिक्त प्रकरणों को रूपान्तरित किया था
चरितकाव्यों की यह साहित्यिक परम्परा अवदानों में फूटी। दार्शनिक चिन्तन
की सशक्त लहरें उमड़ पड़ीं। जो प्रश्न नहीं रह गये थे, जिनके उत्तर सर्वथा
मान्य हो गये थे, उन्हें फिर से उठाया गया, उनके समाधान ढूंढ़े जाने लगे ।
अश्वघोष ने वैदिक धर्मों के विचारकों में आलोचनात्मक दृष्ट उत्पन्न की ।
उनके जीवन की यह सबसे बड़ी उपलब्धि थी ।
हम यहाँ यह बतलाने को उत्सुक नहीं है कि अश्वघोष ने अपने जीवन में
ज्ञान, दर्शन या धर्म की बातें कब, कहाँ और किस गहराई से कही हैं; यहाँ
हम इस बात को भी स्पष्ट करना नहीं चाहते हैं कि उनकी कृतियों में, उनके
जीवनवृत्तों में कितनी बारीकियाँ हैं। यहाँ हम उनके सम्बन्ध में यही स्पष्ट
करना चाहते हैं कि अश्वघोष ने अपने जीवन की समग्र अनुभूतियों को, अपने
युग के सम्पूर्ण परिवेश को अपनी कृतियों में छिपाकर रख दिया है। गहराई
से यदि इनकी कृतियों का अध्ययन किया जाय तो आज से हजारों साल पहले
निर्मित इन काव्यों, महाकाव्यों या प्रकरणों में तत्कालीन भारतीय समाज का
अत्यन्त स्पष्ट चित्र सामने उभर कर आ जाता है। खान-पान, रहन-सहन,
जीवन-यापन, वाणिज्य-व्यवसाय, विषय-वासना, त्याग-भोग, रोग-शोक, सत्य-
असत्य, शासन-व्यवस्था, आचार-अनाचार, विचार-अविचार, तर्क-वितर्क तथा
ज्ञान-प्रहाण तक का साफ-साफ अतिस्पष्ट चित्र सामने झलक उठता है।
इनकी कृतियों की भाषा अलंकारों से लदी नहीं है। सभी बातें सीधी-सादी
भाषा में कही गई है। इनका जीवन कितना साफ और स्वच्छ है—उसकी
प्रतिमूत्ति इनकी कृति है। इन्होंने मनुष्य को एक दयनीय प्राणी माना है। वह
यदि पापी है तो अपने पूर्वजन्म के अविद्याजनित संस्कारों के कारण। ये
अविद्याजनित संस्कार जन्म-जन्मान्तर से मानव के पीछे लगे हैं और आगे भी
जन्म-जन्मान्तर तक लगे ही रहेंगे। इससे छुटकारा पाना तब तक कठिन है,
( ८ )
जब तक वे सजग नहीं हो जाते । वे कैसे सजग हों ? इसका अनुभूत उपाय
उन्होंने बतलाया है । यही है अश्वघोष का मूल जीवनवृत्त ।
अश्वघोष की रचनाएँ
‘बौद्ध संस्कृति’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक में महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
ने लिखा है—'ताम्रयुग की सिन्धु उपत्यका की संस्कृति, उसके बाद टुटपूँजिया
संस्कृति वाले घुमन्तू आर्यों का समागम और वैदिक कर्मकाण्ड से होते उसका
परिव्राजकों के समय तक पहुँचना, इन ढाई हजार सालों में भिन्न-भिन्न जातियों
के सम्पर्क से होते भारतभूमि में एक संस्कृति तैयार हो गई थी । यहीं वह
संस्कृति थी, जिसमें सिद्धार्थ गौतम पैदा हुए और जिसके भीतर रहते वे बौद्ध
बने ।'
राहुल जी बौद्धधर्मावलम्बी एक अधिकारी विद्वान् थे । बुद्धदेव या बौद्ध
संस्कृत के सम्बन्ध में वे अधिकारपूर्वक बोलते थे या कुछ लिखते थे । इसी संस्कृति
के सुरभित सुमन संस्कृत बौद्ध वाङ्मय के प्रारंभिक विद्वानों में एक उत्कृष्ट
विद्वान् कवि अश्वघोष थे । अश्वघोष जैसे सुविज्ञ कवि के नाम पर कालान्तर
में कितनी कृतियाँ आकर जुट गईं—इसका लेखा-जोखा प्रस्तुत करना असंभव
नहीं तो दुष्कर अवश्य है । यह इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि
प्राचीन परन्तु प्रख्यात ऐतिहासिक व्यक्तित्व के साथ इतनी लचर कृतियाँ जोड़ दी
जाती है कि उनकी अपनी बहुमूल्य कृतियों की छवि भी ढँक जाती है । और
उन कचड़ों से चुनकर कृति-रत्नों को बाहर निकालना कठिन हो जाता है ।
अश्वघोष भी इस नियम के अपवाद नहीं हैं। उनकी मौलिक रचनाएँ कितनी
हैं, इस विषय में कहीं कुछ स्पष्ट नहीं है । कारण यह है कि राज्याश्रय पाने
पर बौद्धधर्म का प्रचार और प्रसार संसारव्यापी हुआ और सर्वत्र बुद्ध के
बौद्धानुयायियों के उपदेश को संगृहीत और संकलित किया गया । अश्वघोष
की कृतियों के संमिश्रण का यह भी एक प्रमुख कारण रहा है । चीनी और
तिब्बती परम्पराओं में अश्वघोष की कृतियों का कुछ संकलन उपलब्ध है । ये
संकलन अश्वघोष के नाम से प्रचलित हैं । तिब्बती परम्परा में निम्नलिखित
रचनाएँ संकलित हैं—
१. अष्टविघ्नकथा ( तञ्जवूर–मदो ९४, फोलियो २१०-६ ) ।
२. गण्डीस्तोत्रगाथा ( वही, वस्तोद फो० २१०, व-२१४ अ ) ।
३. दशकुशलकर्मपथनिर्देश ( वही, मदो, ९४ फो० २७१-७३ ) ।
४. परमार्थबोधिचित्रभावनाकर्मवर्णसंग्रह ( तञ्जवूर-मदो ९४, फोलियो
२७१-७३ ) ।
५. बुद्धचरित महाकाव्य ( वही, ९४ फो० १-११९ ) ।
६. मणीदीपमहाकारुणिकदेवपञ्चस्तोत्र (वही, ग्युंद ६८, फो० १५७-५८) ।
( ९ )
७. वज्रयानमूलपत्तिसंग्रह ( वही, ४८ फो० २१९-२० ब ) ।
८. शतपञ्चशतकनामस्तोत्र ( वही, वस्तोद, फो० १२९, अ १३६ ब ) ।
९. शोकविनोदन ( तञ्जवूर, मदो ९४, फो० २७०-७१ ) ।
१०. संवृत्तबोधिचित्रभावनोपदेशवर्णसंग्रह ( वही, ३३ फो० १४६-४७ ) ।
११. स्थूलपत्ति ( वही, ग्युदं ४८, फो० २२०, ब-२२१, अ ) ।
इनके अतिरिक्त अश्वघोष की कृतियों के अनुवाद चीनी त्रिपिटिक में
मिलते हैं । Ashwaghosha's Discourse The Awakening of gaith in
the Mahayan Page 37, by W. T. Swaku में चीनी स्रोतों से अश्वघोष
के ग्रन्थों की सूची प्रस्तुत की है—
१. महायानंश्रद्धोत्पादशास्त्र ।
२. परमपदप्राप्त्यर्थं आध्यात्मिक भूमियों पर लिखित मौलिक प्रबन्ध ।
३. सूत्रालङ्कारमहाशास्त्र ।
४. बुद्धचरितकाव्य ।
५. अनात्मसिद्धान्त से सम्बद्ध निर्ग्रन्थ पर एक सूत्र ।
६. दशदुष्कर्मसूत्र ।
७. स्वामिसेवासम्बद्ध पञ्चशतपद्य ।
८. सत्ता की षड् अवस्थाओं के द्वारा पुनर्जन्म से सम्बद्ध एक सूत्र ।
बौद्ध त्रिपिटक के चीनी अनुवाद के नाजियों की सूची में महायानभूमि
'गुह्यवाचालमूलशास्त्र' अधिक है । परन्तु उपरोक्त चीनी ग्रन्थों में क्रमांक २, ५
और ८ नहीं मिलते हैं । शेष समान रूप से प्राप्त हैं । इसकी सूची-संख्या
१०८० है । इन विसंगतियों के बावजूद भारतीय परम्परा के डॉ० हरप्रसाद
शास्त्री (१९१० ई०) ने 'बिब्लिओथिका इण्डिका' के एपेण्डिक्स (पृष्ठ २५-२७)
में निम्नलिखित सूची प्रस्तुत की है—
१. बुद्धचरितकाव्य ।
२. शारिपुत्र-प्रकरण ।
३. सौन्दरनन्दकाव्य ।
४. गण्डीस्तोत्र ।
५. वज्र-सूची ।
डॉ० करुणाशंकर दूबे ने सौन्दरनन्द हिन्दी-अनुवाद भूमिका पृ० १९ में
लिखा है कि उक्त सूचियों के आधार पर डॉ० रामायणप्रसाद द्विवेदी ने अपनी
पुस्तक बौद्ध संस्कृत-काव्य-समीक्षा पृ० १४५ पर उन ग्रन्थों की एक सूची
प्रस्तुत की है, जिसे सभी विद्वानों का समर्थन प्राप्त है—
दार्शनिक ग्रन्थ— १. महायान श्रद्धोत्पादशास्त्र
२. सूत्रालङ्कार
३. वज्रसूची
गीतिकाव्य— १. गण्डीस्तोत्रगाथा
( १० )
महाकाव्य— १. बुद्धचरित
२. सौन्दरनन्द
नाटक— १. शारिपुत्र-प्रकरण
२. राष्ट्रपाल
३. उर्वशी-वियोग
४. रूपकावशेष—प्रथम
५. रूपकावशेष—द्वितीय
अश्वघोष की ऊपर वर्णित कृतियां विवादग्रस्त तो है ही, इनमें से असली-
नकली की पहचान एक अलग चिन्त्य एवं शोध का विषय है। किन्तु साहि-
त्यिक कृतियों में निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है, या प्रामाणिक ढंग से
सम्पुष्ट किया जा सकता है कि बुद्धचरित, सौन्दरनन्द एवं शारिपुत्र-प्रकरण—
ये तीनों ही कृतियां निश्चितरूप से साकेत-निवासी महावादी आर्य भदन्त,
सुवर्णाक्षी-पुत्र अश्वघोष की ही कृतियां हैं। इन तीनों ग्रन्थों में 'बुद्धचरित' एवं
'सौन्दरनन्द' महाकाव्य हैं तथा अन्तिम शारिपुत्र-प्रकरण (शारद्वतीपुत्र-प्रकरण)
एक रूपक है। डॉ० ल्यूडर्स ने सर्वप्रथम इस रूपक की खोज मध्य एशिया के
तुर्फान में की थी। इस नाटक की खोज के क्रम में उसी तालपत्र में डॉ०
ल्यूडर्स को एक खण्डित प्रबोधचन्द्रोदय जैसा एक अन्यापदेशी ( एलेगोरिक )
नाटक है। इस प्रकरण में कीर्त्ति, धृति, शान्ति को मूर्त्तरूप में पात्र बनाकर
कवि ने अपने सैद्धान्तिक मत की सम्पुष्टि की है। दूसरा प्रकरण इसी तरह एक
लघु रूपक है, जिसमें लुच्चे-लफंगे, विट्-विदूषक प्रभृति का जमघट लगा है।
शारिपुत्र-प्रकरण को डॉ० कीथ ने 'हेटेरा ड्रामा' कहा है। इन्हें पढ़कर ऐसा
प्रतीत होता है कि ये ग्रन्थ निश्चय ही अश्वघोष के किसी अपूर्ण कृति के खण्डित
अंश हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि अश्वघोष विद्वान् कवि और दार्शनिक तो
थे ही, काव्यशास्त्र के भी मर्मज्ञ ज्ञाता थे। उन्हें बौद्ध भिक्षु के अतिरिक्त
बहुज्ञ एवं शास्त्रज्ञ मानने में विसंवाद नहीं होना चाहिए।
( १ ) बुद्धचरित
'बुद्धचरित' एक नैतिक और आध्यात्मिक स्रोत अधिक है, परन्तु काव्य
कम। यह वह स्रोत है, जो अनन्त काल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण
देश में बहता रहा है और कभी-कभी मूर्त्तरूप होकर हमारे सामने आता रहा
है। यह हमारा सौभाग्य है कि हमने ऐसे ही एक मूर्त्तरूप को इस महाकाव्य में
जन्म लेते, हँसते, खेलते और रोते देखा है, जिसने अमरत्व की याद दिलाकर
हमारी सूखी हड्डियों में नई मज्जा डालकर हमारे मृतप्राय शरीर में नये प्राण
फूँके और मुरझाये हुए दिलों में अमरत्व का सौरभयुक्त सुन्द सुमन खिला दिया।
यह सौरभ सुमन है—सम्यक् ज्ञान, सत्य, अहिंसा, प्राणीमात्र के प्रति मैत्रीभाव,
जो केवल इसी देश के लिए नहीं बल्कि प्राणिमात्र के जीवन के लिए आज
( ११ )
भी उसी अनुपात में अत्यन्त आवश्यक है। यहां यह कह देना अनुपयुक्त एवं
अप्रासंगिक न होगा कि उद्दण्ड अहंभाव को महत्त्व देने का अनिवार्य परिणाम
श्रेणीसंघर्ष के रूप में, हृदयहीन आर्थिक व्यवस्था के रूप में, राजनैतिक
शोषण और साम्राज्यवाद के रूप में हमारे सामने खड़ा है। हमें यह स्वयं
निर्णय लेना है कि संस्कृति और सभ्यता, विज्ञान एवं उद्योग की प्रगति का
अनिवार्य मार्ग यह मत्स्यन्याय ही है, अथवा वैसी प्रगति उस नैतिक चेतना के
आधार पर भी हो सकती है, जो भगवान् बुद्ध ने इस देश के नर-नारियों के
सामने रखी थी।
यह काव्य के ब्याज से एक ऐसा २८ सर्ग का महाकाव्य है, जिसमें शाक्य
सुगत की जीवनी की अपेक्षा उपदेश तथा सिद्धान्तों का अधिक वर्णन है। ४१४
से ४२१ ई० में उपस्थित भारत के एक प्रसिद्ध विद्वान् धर्मक्षेत्र ने इस महा-
काव्य का चीनी अनुवाद किया था। इस अनुवाद में यह ग्रन्थ २८ सर्गों का
है। ईसा के आठवीं शती में इसका तिब्बती अनुवाद किया गया। उस अनुवाद
में भी २८ सर्ग हैं। चीनी यात्री इत्सिंग की दृष्टि में भी यह महाकाव्य बृहदा-
कार है। किन्तु संस्कृत भाषा में जो यह महाकाव्य उपलब्ध है, उसमें केवल
१७ सर्ग ही है। इनके अन्तिम चार सर्ग अमृतानन्द द्वारा १९वीं शती में
जोड़ा गया है। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री द्वारा प्राप्त ग्रन्थ मात्र चौदहवें
सर्ग के मध्य तक ही रह जाता है। इसमें प्रथम सर्ग भी अधूरा ही मिलता है।
इस महाकाव्य में प्रथम पांच सर्गों तक भगवान् बुद्ध के जन्म से लेकर
निर्वाण हेतु उनके गृहत्यागे तक की कथा का वर्णन है। इनमें प्रारंभ के दो
सर्गों में अन्तःपुर विहार का वर्णन है। उसके बाद तीन सर्गों में संवेगोत्पत्ति
का वर्णन है। इसके बाद चौथे सर्ग में स्त्री-निवारण का वर्णन है। पञ्चम सर्ग
में बुद्ध का अभिनिष्क्रमण है। काव्यकला की दृष्टि से यह सर्ग पर्याप्त प्रभा-
वोत्पादक है। छठे एवं सातवें सर्ग में तथागत का तपोवन में प्रवेश का वर्णन
है। अष्टम सर्ग में कुमार के अभिनिष्क्रमण पर घोर विलाप का वर्णन है।
नवम सर्ग में निष्क्रमित कुमार का अन्वेषण है। दशम सर्ग में यायावर गौतम
मगध तक पहुँचते हैं। एकादश सर्ग में विषयोपभोग एवं काम की निन्दा है।
बारहवें सर्ग में महर्षि अराड़ के आश्रम में शान्तिलाभ के लिए गौतम पहुँचते
हैं। तेरहवें सर्ग में गौतम मार-विजय प्राप्त करते हैं। चौदहवें सर्ग के अन्त में
गौतम को बुद्धत्व की प्राप्ति होती है। इसके बाद का जो अंश उपलब्ध है वह
डॉ० जान्स्टन का अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध है। इसमें बुद्ध के शिष्यों, उनके
उपदेशों, सिद्धान्तों तथा निर्वाण का वर्णन है। इसके अतिरिक्त अशोक के
काल तक के संघ की स्थिति का वर्णन है।
काव्यकला की दृष्टि से 'बुद्धचरित' मन, आचार, अथवा रुचियों की
परिष्कृति का महाकाव्य है। बुद्ध के समय से लेकर अब तक संस्कृत जनता की
( १२ )
बोली जाने वाली भाषा कभी नहीं रही है। फिर भी संस्कृत में लिखा यह
बुद्धचरित न केवल भारत में अपितु भारतेतर देशों में भी अपना प्रचुर प्रभाव
डालता रहा है। प्रथम पाँच सर्ग, आठवें तथा तेरहवें सर्ग के मार-विजय का
कुछ अंश काव्य की दृष्टि से ललित, आकर्षक एवं सुन्दर है। शेष अंश दार्शनिक
ग्रंथ की तरह नीरस है। इसे काव्य की अपेक्षा धार्मिक नीतिवादी ग्रंथ कहना
ही अधिक उपयुक्त होगा।
( २ ) सौन्दरनन्द
यह अट्ठारह सर्गों का एक महाकाव्य है। नेपाल के राजकीय पुस्तकालय
में प्राप्त दो पाण्डुलिपियों के आधार पर महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने
इसका प्रकाशन 1910 में Appendix to Bibliotheca. में करवाया।
सौन्दरनन्द में गौतम बुद्ध के वैमात्रेय भाई नन्द एवं उसकी पत्नी सुन्दरी की
कथा का काव्यात्मक वर्णन पूर्वार्द्ध में है और इसका उत्तरार्द्ध नन्द की प्रव्रज्या
से सम्बन्धित है। इसका सर्गतः कथासार परिशिष्ट में लिखा जा चुका है।
अतः उसकी यहाँ पुनरावृत्ति अनपेक्षित है।
इस सम्पूर्ण महाकाव्य की गरिमा बौद्धदर्शन के काव्यात्मक वर्णन में है।
इसका मूल वर्ण्य विषय बुद्धकालीन भारतीय संस्कृति है। अश्वघोष ने इस
ग्रन्थ में भगवान् बुद्ध के तत्त्वों पर प्रकाश डाला है। तथागत के तत्त्वज्ञान के
दो महास्तम्भ हैं—महाप्रज्ञा और महाकरुणा। प्राणिमात्र को समष्टि-स्वरूप
देखने की क्षमता प्रज्ञा के द्वारा मिलती है। करुणा प्राणिमात्र के प्रति प्रत्येक
व्यक्ति का क्या कर्त्तव्य है—यह सिखाती है। सौन्दरनन्द में स्थान-स्थान पर
इन दोनों तत्त्वों को काव्यमाला में परिभाषित करने की कवि ने सफल चेष्टा
की है।
मर्त्य-मानव संसार की नश्वरता से पूर्ण अवगत होकर भी अपने को अमर्त्य
समझता है। संसार दुःखमय क्यों होता है—इसका विवेचन आकर्षक ढंग से
इस काव्य में अश्वघोष ने किया है। बौद्धों का दूसरा मौलिक सिद्धान्त यह है
कि प्रत्येक वस्तु की क्षण-क्षण में उत्पत्ति, स्थिति और विनाश की अव्याहत
परिणति होती है, जिस घटना को वे 'क्षणिकता' कहते हैं। इस क्षणिकता
को भी अश्वघोष ने आकर्षक रूप दिया है। 'प्रतीत्यसमुत्पाद' सिद्धान्त में कहा
गया है कि उत्पत्ति, स्थिति और विनाश की श्रृंखला आगे-आगे हेतु और प्रत्यय
से बढ़ती जाती है। समुत्पाद का अर्थ गत परिस्थिति है और प्रतीत्य का अर्थ
कारणाश्रित्य है। अश्वघोष ने अनेकों बार इस शब्द की पुनरावृत्ति कर यह
कहना चाहा है कि संसार में जो कुछ होता है उसके विषय में इन दो तत्त्वों के
बीच का रास्ता ही प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार
शान्त, संतुष्ट, तत्त्वज्ञ और दार्शनिक को आसानी से विवेक की उपलब्धि होती
है और मद-मान-अनासक्त बुद्धि वाले को आसानी से वैराग्य होता है—
( १३ )
'शान्तस्य तुष्टस्य सुखो विवेको विज्ञाततत्त्वस्य परीक्षकस्य ।
प्रहीणमानस्य च निर्मदस्य सुखं विरागत्वमसक्तबुद्धेः ॥'
—सौ० न० १८।४२
जिसने इस तत्त्व की सही-सही जानकारी प्राप्त कर ली, उसे फिर न
किसी की चिन्ता होती है और न कुछ आकुलता ही—
'अथो हि तत्त्वं परिगम्य सम्यङ्निर्धूय दोषानधिगम्य शान्तिम् ।
स्वं नाशमं सम्प्रति चिन्तयामि न तं जनं नाप्सरसो न देवान् ॥'
—सौ० न० १८।४३
ये दो तत्त्व, जिसके बीच प्रतीत्यसमुत्पाद है, में प्रथम तत्त्व तो यह है
कि संसार झूठा है । इसे ही असद्दृष्टि भी कहा जाता है । दूसरे तत्त्व के
भीतर यह कहा गया है कि सचमुच सर्वत्र केवल संसार का ही पूरा अस्तित्व
है । इसे ही सद्दृष्टि या आस्तिक्यदृष्टि भी कहा गया है । इस संसार पर
विजय पाने के लिए शील की रक्षा करनी चाहिए । इसी शील के सहारे सभी
कल्याणकारी कार्य होते हैं—
'शीलमास्थाय वर्तन्ते सर्वा हि श्रेयसि क्रियाः ।
स्थानाद्यानीव कार्याणि प्रतिष्ठाय वसुन्धराम् ॥'
—सौ० न० १३।२१
सद् विचार ही शील है, यही आचार है। इसके विनष्ट होने पर न तो
प्रव्रज्या रहती है और न ही गृहस्थता रहती है—
'एतावच्छीलमित्युक्तं आचारोऽयं समासतः ।
अस्य नाशेन नैव स्यात् प्रव्रज्या न गृहस्थता ॥'
—सौ० न० १३।१९
'सौन्दरनन्द' सिद्ध और साधक दोनों के लिए समान प्रेरणादायक महा-
काव्य है । इस महाकाव्य में राजवंशीय चित्र तो है, परन्तु उन राजकुमारों के
सिर पर न तो दर्पोद्धत रत्न-किरीट है, फिर भी उनका मस्तक ऊँचा है; ललाट
धार्मिक आभा से दीप्त है, हृदय रस से आप्यायित है और गैरिक रागों से
अनुरंजित है । इनका शौर्य रक्तपिपासु नहीं है । इनका जीवन शान्त, सुस्थिर
और उदात्त गुणों की कसौटी है । इनका धैर्य सागर की तरह अतलस्पर्शी है ।
ये अपनी शक्ति का कहीं प्रदर्शन नहीं करते, समय आने पर अत्यन्त सहज भाव
से अपनी धार्मिक गरिमा का परिचय मात्र उपस्थित कर देते हैं । इनके विचार
में सभी प्राणियों के लिए समान रूप से मैत्री की भावना है ।
'मैत्रीस्तनीं व्यञ्जनचारुसास्नां सद्धर्मदुग्धां प्रतिभानशृङ्गाम् ।
तवास्मि गां साधु निपीय तृप्तस्तुषेव गामुत्तमवत्सवर्णेः ॥'
—सौ० न० १८।६१
२ सौ० भू०
प्राणिमात्र इनके लिए समान थे । सबकी भलाई और कल्याण के लिए
यह महाकाव्य सतत प्रयत्नशील है । विषयोन्माद का परित्याग, इन्द्रिय-विजय,
तप और साधना, दया, दान, सत्य, शौच, निर्भयता, मृदुता, साधुता और मुक्ति
के लिए सतत प्रयत्नशील रहना ही इस महाकाव्य का अन्तिम लक्ष्य है । शुद्ध
आजीविका और सदाचरण—इसकी प्राणशक्ति है ।
( ३ ) शारिपुत्र-प्रकरण
डॉ० ल्यूडर्स को मध्य एशिया (तुर्फान) में कुछ ग्रन्थ प्राप्त हुए । उनमें
तीन नाटक भी थे । उन तीन नाटकों में एक खण्डित नाटक की पाण्डुलिपि
भी थी । इनका सम्पादन एवं प्रकाशन प्रो० ल्यूडर्स ने किया । इसका नाम
शारिपुत्र-प्रकरण है । यही नाटक 'शारद्वतीपुत्र-प्रकरण' के नाम से भी मिलता
है । इस प्रकार के रूपकों में प्रकरण भी एक प्रकार का रूपक ही होता है ।
यह कृति भी अश्वघोष की ही मानी जाती है । क्योंकि इसकी पुष्पिका में भी
साकेतक सुवर्णाक्षी-पुत्र अश्वघोष का नाम अंकित है । एतदतिरिक्त इसके एक
पद्य का अविकल रूप बुद्धचरित में उपलब्ध है । अश्वघोष ने अपने सूत्रालङ्कार
नामक ग्रंथ में अनेकों बार शारिपुत्र-प्रकरण की चर्चा की है । इस रूपक से यह
पता चलता है कि किस प्रकार बुद्ध ने तरुण मौद्गल्यायण और उसके पुत्र को
अपने धर्म का अनुयायी बनाया था । इस प्रकरण का कथानक बुद्धचरित में
वर्णित कथा से कुछ भिन्न है; क्योंकि शिष्य जैसे ही तथागत के पास पहुँचते हैं,
वैसे ही इन्होंने इसकी भविष्यवाणी कर दी है ।
इसके अतिरिक्त इस रूपक में मध्यवर्गीय अन्य पात्रों के जीवन के साथ
लुच्चे, लफंगे, वेश्याएँ, चोर, जुआरी, शराबी प्रभृति लोगों के समाज का भी
चित्रण होता है, जिनका प्रौढ़ और परिष्कृत रूप शूद्रक के 'मृच्छकटिकम्' में
उपलब्ध होता है । इस प्रकरण में विदूषक का भी प्रयोग हुआ है । विदूषक
का ऐसा प्रयोग दूसरे 'गणिकारूपक' में भी उपलब्ध है । किन्तु इस प्रकरण
की कथा शृङ्गार से शान्त की ओर प्रवाहित है । दूसरा गणिकारूपक वेश्या,
विदूषक ब्राह्मण, सोमदत्त नामक नायक, राजकुमार, दासी, दास, दुष्ट आदि
से युक्त है । दोनों रूपकों में प्राकृत का प्रयोग है, जो डॉ० कीथ के मतानुसार
साहित्यिक प्राकृत से पुरानी है । द्रष्टव्य—डॉ० कीथ का 'संस्कृत ड्रामा'
पृ० ८८, १९५४ का लीथोग्राफिक संस्करण ।
फिर भी यह प्रकरण संस्कृत के मालतीमाधव की शैली से अधिक साम्य
रखता है । नाट्यशास्त्र के अनुसार प्रकरण के समस्त अंकों से यह अंक
सुसज्जित है । इसका नायक शारिपुत्र धीरोदात्त है । इसमें बुद्ध तथा इनके शिष्य
संस्कृत बोलते हैं तथा विदूषक एवं हीनपात्र प्राकृत भाषा का प्रयोग करते
हैं । ऐसे बौद्धधर्मानुयायी शारिपुत्र के साथ विदूषक के रखने से यह अनुमान
( १५ )
होता है कि अश्वघोष से पूर्व ही संस्कृत नाटकों का वह रूप स्थिर हो चुका
था, जिनका परिष्कृत रूप ही हमें परवर्त्ती साहित्य में उपलब्ध होता है।
नाटकीय नियमानुसार भिन्न-भिन्न पात्र सामाजिक स्थिति के आधार पर भिन्न-
भिन्न प्राकृतों का प्रयोग करते हैं। दृष्ट की प्राकृतिक मागधी से, गोयम की
अर्द्धमागधी से और विदूषक की प्राकृत उक्त दोनों के मिश्रण से मिलती-जुलती
है। शारिपुत्र-प्रकरण तथा इनके अन्य रूपकों की शैली बुद्धचरित एवं सौन्दरा-
नन्द की शैली से मिलती है। यह भी एक कारण है कि ये सभी एक ही कवि
के कर्त्तृत्व का संकेत करते हैं। इनका एक उदाहरण द्रष्टव्य है—
'खे वर्षत्यम्बुधारं ज्वलति च युगपत् सन्ध्याम्बुद इव ।'
सौन्दरनन्द के इस तरह की शैली और उपमा का साम्य ही एककर्तृत्व
सिद्ध करता है। सांध्यकालीन बादल जहाँ एक ओर जल वर्षाता है वहीं
दूसरी ओर अस्तंगमित सूर्यं की किरणों के संस्पर्श से आग की तरह जलता
प्रतीत होता है। ठीक उसी तरह वह तेजस्वी करुणार्द्र था। अश्वघोष की
सारी कृतियों में शृंगार और करुण से पुष्ट होकर शान्त रस खिल उठा है, जो
बौद्ध संस्कृति का सर्वस्व है।
अश्वघोष के पश्चात् काव्यशैली में महान् परिवर्तन आया। यह नवीन
काव्यशैली राजसभाओं में विकसित हुई। जैसे-जैसे समय बीतता गया कालि-
दास की स्वाभाविकता कृत्रिमता में बदलती गई। परवर्ती काव्यों में शृङ्गार-
वर्णन की ओर विशेष प्रवृत्ति हुई। भाषा में क्लिष्टता एवं समासों का बाहुल्य
हो गया। प्रतिपाद्य विषय की अपेक्षा भाषा, शैली, अलंकार वर्णन आदि बाह्य
रूपरङ्ग और वैदग्ध्य ने ले लिया।
अश्वघोष का व्यक्तित्व
'सौन्दरनन्द' महाकाव्य के महाकवि 'अश्वघोष' हैं। आपके काव्यग्रंथ
संस्कृत जगत् में यथोचित सम्मान पा चुके हैं। आपका व्यक्तित्व आपकी
कृतियों में स्पष्ट झाँक रहा है। किसी कवि के लिए सामान्य यह बाह्य संसार
ही उसके जीवन को यदि पूर्ण कर देता तो शेष प्राणिजगत् की तरह वह भी
बहुत सारी जटिल समस्याओं से बच जाता, किन्तु कवि के लिए यह संभव
नहीं है। उसकी देह में जैसा भौतिक जगत् का चरम विकास है, उसकी
चेतना भी उसी प्रकार सामान्य जन की चेतना का उत्कृष्टतम रूप है।
किसी कवि का निरन्तर परिष्कृत होता चलने वाला यह मानसिक-जगत्
वस्तु-जगत् के संघर्ष से प्रभावित होता है। उसके संकेतों में अपनी अभिव्यक्ति
चाहता है, किन्तु उनके बन्धनों को पूर्णतः स्वीकार नहीं करना चाहता। अतः
जो कुछ प्रत्यक्ष है, उसे ही किसी कवि का व्यक्तित्व नहीं कहा जा सकता—
उसके साथ-साथ उसका जितना विस्तृत और गतिशील अप्रत्यक्ष जीवन है, उसे
( १६ )
भी समझना होगा। प्रत्यक्ष-जगत् में उसका भी मूल्यांकन करना होगा, अन्यथा
किसी भी कवि के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में हमारा सारा ज्ञान अपूर्ण और सारे
साधन-समाधान अधूरे रहेंगे। कोई भी कवि या महाकवि अपनी कृति की पट
भूमिका के पीछे अन्तर्निहित होकर अपने व्यक्तित्व का परिचय देता है।
विषयिप्रधान कृतियों में कवि का व्यक्तित्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, परन्तु
विषयप्रधान कृतियों में अन्तःसलिला फल्गु के पानी की तरह उसे खोजने का
प्रयास करना पड़ता है। किसी भी कवि का व्यक्तित्व, उसकी अभिरुचि, उसकी
जीवन सम्बन्धी मान्यता प्रभृति का पता तो उसकी कृति ही बतला देती है।
कवि के इस दोहरे जीवन की तरह उसके समीपवर्ती बाह्य जगत् की सारी
वस्तुओं का उपयोग भी दोहरा है। अपने चिन्तन में कोई कवि अपनी बहि-
र्मुखी वृत्तियों को समेटकर किसी वस्तु के सम्बन्ध में अपना बौद्धिक समाधान
ढूंढता है। अतः कभी-कभी वह इतना एकान्तिक होता है कि अपने से बाहर
प्रत्यक्ष-जगत् के प्रति उस कवि की चेतना पूर्णरूप से जागरूक ही नहीं रहती
और यदि रहती है तो कवि के चिन्तन में बाधक बनकर ही। किसी कवि का
काव्य उसके समग्र जीवन का सजीव चित्र होता है। बुद्धचरित एवं सौन्दरनन्द से
अश्वघोष का व्यक्तित्व स्पष्ट झलकता है। अश्वघोष ने अपनी कृतियों में एक
ओर अपने मानसिक जगत् की दुरूहता को स्पष्ट करते चले हैं, वही दूसरी ओर
अपने बाह्य संसार की समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया है। उसकी
कलात्मक अभिरुचि, सौन्दर्यशास्त्रीय मान्यता और पाण्डित्य उसकी बाह्य
स्थिति की व्याख्या है। उसकी धार्मिक सहिष्णुता बौद्धधर्म के मूलतत्त्वों से उसके
संघर्ष का इतिहास है। उसके जीवन के विषय में दार्शनिक मान्यता सृष्टि के
रहस्यमय जीवन का बौद्धिक निरूपण है। संक्षेप में अश्वघोष का समग्र
व्यक्तित्व श्रृंगार की चोटी से हहराकर बहती ऊर्जस्वित करुणा की गंगा, शान्त
सागर बनकर उन्हें स्नपित किया है। उन्हें हम निम्नलिखित शीर्षकों में बाँटकर
देख सकते हैं।
( १ ) धार्मिक उत्साह
अश्वघोष की समग्र रचनाओं में उनका धार्मिक उत्साह स्पष्ट झलकता
है। बौद्धधर्म के प्रचार-प्रसार के सम्बन्ध में हम जिक्र कर चुके हैं। अपनी
सहज विशेषता के कारण यह धर्म और इसकी प्रकृति ने विकल्पित मानव-धर्मों
के विभिन्न प्रभावों को अपने अन्दर इस तरह आत्मसात् कर लिया कि इससे
उसके मौलिक स्वरूप एवं प्राणिधर्म में कोई अन्तर नहीं पड़ा। सबसे रस
ग्रहण कर वह और भी परिपुष्ट हो गया। चूंकि बौद्धधर्म का मूल लक्ष्य
मानवात्मा का संधान था और इस लक्ष्य को ही वह समस्त मानवीय साधनाओं
का आधार मानता था, अतः उसका प्रचार-प्रसार आवश्यक था। इसका
मानसिक और आध्यात्मिक पक्ष इतना प्रबल रहा है कि बौद्धधर्म का प्रसार जिन
( १७ )
देशों में हुआ, वहाँ न तो इसके लिए राज्यजय की आवश्यकता हुई और न
शोषण या परस्वापहरण की। एशिया के विभिन्न देशों में बौद्धधर्म की दिग्वि-
जय की कहानी हम इतिहास-ग्रंथों में पढ़ते हैं। एक ओर सुदूर पूर्व और दूसरी
ओर अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों में बौद्धधर्म का व्यापक प्रचार
एवं विस्तार हुआ। अनेक जातियां इनके सम्पर्क में आईं और उनकी राज-
नीति, आचार-व्यवहार, धर्मानुष्ठान, साहित्य और दर्शन पर इसका गहरा
प्रभाव पड़ा। बौद्धधर्म ने चीन जैसे सुसभ्य देश के धार्मिक उत्साह में भी एक
अपूर्व परिवर्तन ला दिया। इस धर्म से चीन की मानवीयता और भी विकसित
एवं समृद्ध हुई। बौद्धधर्म के अवदानों से चीन के उच्चादर्शों को गहरी प्रेरणा
मिली। मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष-लाभ किया।
भगवान् बुद्ध के उपदेशों को अधिकाधिक लोगों के पास तक पहुँचाना
अश्वघोष का मूल उद्देश्य था। भारतीय पण्डित समाज जनभाषा में लिखे बुद्ध
के उपदेशों को हेय दृष्टि से देखते थे। अश्वघोष ने संस्कृत और परिनिष्ठित
भाषा में काव्य के माध्यम से उन लोगों तक पहुँचाने के अपने लक्ष्य की सम्पूर्ति
में सफलता प्राप्त की। इनके महाकाव्यों को पढ़ने, जानने और समझने की
चेष्टा करने पर स्पष्ट पतां चलता है कि अश्वघोष न केवल दार्शनिक या कोरे
पण्डित हैं बल्कि भगवान् बुद्ध के प्रति इनकी अपूर्व आस्था है, अनन्य भक्ति है
और आमूलचूल श्रद्धा है। उनके शब्द-शब्द में इस रससिद्ध कवि के हृदय की
भक्ति-गंगा की तरलता विद्यमान है। अश्वघोष का अन्तःस्रावी समुत्साह धार्मिक
निष्ठा भक्ति की डोरी में गूंथकर इतनी गहरी भावात्मक बन गई है कि उनकी
रचनाएँ काव्यत्व की गंगा स्वयं सर्वकल्याणी बन गई है। इनके धार्मिक उत्साह
का एक महत् एवं उदात्त पक्ष भी है, जिसे हम आदर्श कहते हैं। इनसे भी
ऊपर उठकर जब पाठक का मन इनकी कृतियों में सुगुम्फित अध्यात्म, बौद्ध-
दर्शन एवं धर्म के क्षेत्र में विचरण करने लगता है, उस समय वह कुछ क्षण के
लिए ही सही—सारे संसार को भूल जाता है और महत् धर्म की प्रेरणा उसके
दृष्टिकोण को व्यापक, उसकी अनुभूति को गंभीर और उसके हृदय को
विशाल बना देती है। प्रेम, शौर्य, सहानुभूति, प्राणिजगत् के प्रति मैत्रीभाव,
ज्ञान, उदारता, करुणा तथा क्षमा की भावना मन में हिलोरे मारने लगती है।
अश्वघोष के धार्मिक उत्साह से हमारे मन में महत् आदर्शों की सृष्टि होती
है और उन आदर्शों को चरितार्थ करने के लिए हम बड़ा से बड़ा त्याग करने
को तैयार हो जाते हैं। मानव-जीवन की प्रधान साधनाएँ भी तो यही हैं।
इन साधनाओं के क्षेत्र में मनुष्य मनुष्य में कोई भेद नहीं रह जाता और यही
है अश्वघोष का धार्मिक उत्साह, जिसे हम इनके काव्यों में बेदाग परख
सकते हैं।
( १८ )
( २ ) पौराणिक ब्राह्मण-धर्म के प्रति सहिष्णु
ब्राह्मणधर्म हजारो वर्षों से भारत के आध्यात्मिक जगत् में प्रमुख स्थान
ग्रहण किये है और इस तथ्य का प्रतीक है कि आत्मविजय, साहस, पवित्रता,
जीवन में एकता और भाईचारे से ही पूर्णता प्राप्त की जा सकती है । यही
आदर्श हमें परमात्मा के चिन्तन में लीन, उपनिषदों के द्रष्टाओं में, अज्ञान और
ईर्ष्या को पराजित करने वाले शान्त एवं सौम्य बुद्ध में आत्मसमर्पण के पश्चात्
सार्वभौम प्रेम में एकाकार हो जाने और ईश्वरभक्त हो जाने तथा आत्मलीन
लालसाओं से ऊपर उठकर परमपिता परमात्मा की इच्छा का पालन इस
पार्थिव जगत् में सदैव करने वाले साधु अश्वघोष के काव्य में उनके आनन्दा-
तिरेक में मिलता है ।
दासगुप्ता ने—'History of Sanskrit Litarature' page 78 में लिखा
है कि—हीनयान शाखा के बौद्धों ने अश्वघोष को पर्याप्त सम्मान नहीं दिया ।
इसका कारण उन्होंने बतलाया है कि एक ओर तो अश्वघोष ने अपना स्वतंत्र
विचार व्यक्त किया है और दूसरी ओर ब्राह्मणधर्म और पौराणिक साहित्य के
प्रति वे अत्यधिक उन्मुख थे । इसके लिए उन्होंने सोन्दरनन्द और बुद्धचरित में
अनेक उदाहरण भी प्रस्तुत किये हैं, किन्तु दासगुप्ता का यह कथन गले से नीचे
नहीं उतरता । निश्चय ही अश्वघोष ब्राह्मण थे । प्रारंभिक जीवन में उन्होंने गम्भी-
रतापूर्वक ब्राह्मणधर्म का अध्ययन किया था । यह भी सत्य है कि अश्वघोष के
समय तक पुराणों का वर्त्तमान रूप पल्लवित हो चुका था । पौराणिक गाथाएँ
भी उस समय तक पर्याप्त ख्याति पा चुकी थी । रामायण-महाभारत की कथाएँ
लोक-प्रचलित हो चुकी थी । अश्वघोष एक बहुज्ञ, शास्त्रज्ञ, ब्राह्मणधर्मवेत्ता,
विशिष्ट किन्तु स्वतन्त्र विचारक कवि थे । ब्राह्मणधर्म भी अपने आप में एक
विशिष्ट धर्म था, जो किसी भी विश्वास-विशेष के लिए दुराग्रह नहीं करता, जो
सहिष्णुता, स्वाधीन चिन्तन एवं वैयक्तिक स्वतंत्रता के संसार में सबसे बड़ा
हामी रहा है । ईश्वर को मानो या न मानो, उपासना साकार की करो या
निराकार की, अनेक देवताओं में विश्वास रखो या फिर किसी भी देवता को
मत मानो, किन्तु यदि तुम पौराणिक ब्राह्मणधर्मी बने रहना चाहते हो तो
हिन्दू समाज से कोई तुम्हें भी नहीं निकालेगा; इतनी स्वतंत्रता और छूट अपने
अनुयायियों को संसार के किसी भी धर्म ने नहीं दी है । यही कारण है कि
अश्वघोष ने पूर्वार्जित ज्ञान का अपने काव्यों में यत्र-तत्र प्रयोग किया है । सांख्य
दर्शन के तो उदाहरणों से बुद्धचरित का वर्णन भरा पड़ा है । बुद्धचरित के
प्रथम सर्ग पद्य ४१-४५ तथा चतुर्थ सर्ग ७२-७८ श्लोक दर्शनीय है । इसी
तरह सोन्दरनन्द में पौराणिक उपाख्यानों की अभिव्यक्ति दर्शनीय है—
‘सूर्यः सरण्यूं प्रति जातरागस्तत्प्रीतये तष्ट इति श्रुतं नः ।
यामश्वभूतोऽश्ववधूं समेत्य यतोऽश्विनौ तौ जनयाम्बभूव ॥'—सौ० न० ७।२६
( १९ )
इस सर्ग की श्लोक सं० २७ से ४५ तक ऐसे ही पौराणिक उपाख्यानों के
उदाहरण प्रसंग को सशक्त बनाने के लिए ही दिये गये । उदाहरण किसी भी
स्थिति में किसी भी व्यक्ति की बहुज्ञता के अतिरिक्त आसक्ति नहीं कही जा
सकती है। इसी तरह जब छन्दक बुद्ध को वन में अकेले छोड़कर लौट आये तो
सारी प्रजा ने उसी तरह आँसू गिराये, जैसे पहले राम के वनगमन पर सुमन्त
के लौटने पर अयोध्या की प्रजा रोई थी—
‘मुमोच वाष्पं पथि नागरो जनः पुरा रथे दाशरथेरिवागते ।'
—बुद्धचरित ८।८
इसी तरह शिव-विजय की एक घटना का पौराणिक संकेत—
'शैलेन्द्रपुत्रीं प्रति येन विद्धो देवोऽपि शम्भुश्चलितो बभूव ।
न चिन्तयत्येष तमेव वाणं किं स्यादचित्तेन शरः स एषः ॥'
—बुद्धचरित १३।१६
इस प्रकार बुद्धचरित एवं सौन्दरनन्द के अनेकों पद्यों में रामकथा शिव-
पार्वतीकथा, स्वर्ग, इन्द्र, देवता, अप्सराएं आदि की चर्चा भरी पड़ी है। इसका
यह अर्थ कदापि नहीं कि अश्वघोष बौद्धधर्मावलम्बी नहीं थे। वे हृदय से बुद्ध के
भक्त थे। बौद्ध सिद्धान्तों में उनकी अनन्य निष्ठा थी। ब्राह्मणधर्म के वे ज्ञाता
थे। अतः साधिकार प्रासंगिक क्रम में उन्होंने उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। भगवान्
सुगत के विचारों और मान्यताओं का जमकर उन्होंने अध्ययन-मनन किया
था और तदनुकूल उन्हें अपने आचरण में उतारने की चेष्टा की है।
भगवान् बुद्ध के लिए केवल वैदिक हिंसा अमान्य थी। हिंसा तो अहिंसा
का अभाव है। अहिंसा के वह विपरीत है। अहिंसा हिंसा से भिन्न है, विपरीत
नहीं। सुगत की अहिंसा तो प्रेम की प्रतिमूर्ति है। उन्होंने जब समाधि को
साधा तब जाना कि भीतर सोये हुए प्रेम के अनन्त झरने अनायास ही सहज
और सक्रिय हो उठे हैं। यह प्रेम तो उनके हृदय में था और सहज ही प्रवा-
हित हो रहा था अहिंसा के माध्यम से। जैसे दीए से प्रकाश बहता है और
फूलों से सुगन्ध, वैसे ही उनके हृदय में जीवों के प्रति प्रेम बह रहा था। बोध
के उस अद्भुत क्षण में उन्होंने जाना था कि यह प्रेम तो उनके स्वभाव का
प्रकाश था। आत्मा की स्फुरणा थी। यह प्रेम हृदय के अभिनव ऊर्जा का
सद्भाव था। यह ऊर्जा स्वयं से सर्व के प्रति बहती थी, स्वयं से स्फुरित होकर,
मैत्रीधर्म से अनुप्राणित होकर वह जीवमात्र को एक ही सूत्र में पिरोती थी।
इस प्रकार बुद्ध की अहिंसा सबके लिए सबको सोचने और कर्म करने की
प्रेरणा भी प्रदान करती थी। उनका प्रेम या 'मैत्रीधर्म' का तात्पर्य केवल
मानव से मानव की मैत्री नही थीं, अपितु मानव अपने स्वाभाविक वैरी—शेर,
सांप, हिंसक जन्तु प्रभृति के प्रति भी मैत्रीभावना प्रबल रखे—यही बुद्ध का
संदेश है। बुद्ध का प्रेम प्रज्ञा का परिणाम है। किसी भी धर्म की मूल जिज्ञासा
( २० )
भी यही है। हममें जो ज्ञानशक्ति है, वह विषयमुक्त हो तो प्रज्ञा बन जाती है
और ऐसी क्रान्ति समाधि से उत्पन्न होती है। प्रज्ञा का साधन समाधि है।
समाधि साधन है, प्रज्ञा साध्य है, प्रेम उस सिद्धि का परिणाम है। प्रज्ञा हो
और प्रेम न हो, यह असंभव है। ज्ञान हो और अहिंसा न हो, यह कैसे हो
सकता है? इसीलिए सौन्दरनन्द में बुद्ध ने अहिंसा को सत्यज्ञान की परीक्षा
माना है। यह परमधर्म है, क्योंकि यह आत्यन्तिक कसौटी है। इसके निष्कर्ष
पर खरा उतरकर ही कोई धर्म खरा साबित होता है। इसी धर्म का प्रचार-
प्रसार अश्वघोष को अपेक्षित है। इसके लिए काव्यों में प्रदत्त उदाहरण की
विज्ञता है, न कि आसक्ति या और कुछ।
( ३ ) अश्वघोष की दार्शनिक मान्यता
अश्वघोष की दार्शनिक मान्यता एक वाक्य में—आनन्द मोक्ष है और मुक्ति
आनन्द है। निश्चय ही मनुष्य की जो परम आकांक्षा है, वह बीजरूप में प्रत्येक
व्यक्ति में प्रसुप्त होनी ही चाहिए, क्योंकि जिस बीज में वृक्ष न छिपा हो, उसमें
अंकुर भी नहीं आ सकता है। हमारी जो चरम कामना है, वही हमारा
आत्यन्तिक स्वरूप भी है। क्योंकि स्वरूप ही अपने पूर्ण विकास में आनन्द
और स्वतंत्रता में परिणत हो सकता है। स्वरूप ही सत्य है और उसकी पूर्ण
उपलब्धि ही संतुष्टिपूर्ण मुक्ति का मार्ग खोलती है। बुद्ध ने कहा है—तृष्णा
दुष्पूर है।
एक बौद्ध दार्शनिक होने के कारण बुद्धचरित में अश्वघोष का स्वर काव्या-
नुभूति की अपेक्षा कुछ अधिक ऊपर उठ गया है। बुद्धचरित का बारहवां सर्ग
तो बौद्धदर्शन के सिद्धान्तों से आच्छन्न है। इस संदर्भ में सांख्यदर्शन से प्रभावित
मुनि अराड का उपदेश द्रष्टव्य है—
'तत्र तु प्रकृतिं नाम विद्धि प्रकृतिकोविद ।
पञ्चभूतान्यहङ्कारं बुद्धिमव्यक्तमेव च ॥' —बु० च० १२।१८
बौद्धदर्शन दुःखवाद के लिए प्रसिद्ध है। बौद्ध दार्शनिक जन्म और जीवन
को दुःख से समवेत मानता है। वह तृषित मानवता को शीतल शान्ति का
जल देता है, दुःखी आत्मा को संवेदना का संदेश देता है। सबकी अज्ञानता
का भार स्वयं वहन करता है। उनके जीवन में इतनी विशालता संभव
है कि उसमें सबके वर्गभेद एकाकार होकर समा जाते हैं। उनकी भावना का
आंचल इतना विशाल है कि उसमें सबके आंसू समा जाते हैं। बौद्ध दार्शनिक
अपने लिए अनागरिक होकर भी संसार के लिए गृही, अपने प्रति वीतराग
होकर भी सबके प्रति अनुरागी, अपने लिए संसारी होकर भी सबके लिए कर्म-
योगी; क्योंकि वह अपने आपको खोकर ही सब कुछ पाता है। क्योंकि मानव-
जीवन में दुःख की स्थिति इतनी नियत है कि उसके शरीर और चित्त का
स्वभाव उसका अविच्छेद्य धर्म बन जाता है—
( २१ )
'आकाशयोनिः पवनो यथा हि यथा शमीगर्भशयो हुताशः ।
आपो यथान्तर्वसुधाशयाश्च दुःखं तथा चित्तशरीरयोनिः ॥'
—सौन्दरनन्द १६।११
'अपां द्रवत्वं कठिनत्वमुर्व्या वायोश्चलत्वं ध्रुवमौष्ण्यमग्नेः ।
यथा स्वभावो हि तथा स्वभावो दुःखं शरीरस्य च चेतसश्च ॥'
—सौ० न० १६।१२
इस दुःख से छुटकारा पाना ही मोक्ष है। बौद्धों की मुक्ति या निर्वाण
की स्थिति या धारणा बिलकुल अन्य दर्शनों की अपेक्षा भिन्न एवं अभिनव है।
उनके अनुसार निर्वाण की स्थिति में व्यक्ति के समग्र क्लेश या दुःख का क्षय
हो जाता है। किन्तु यह क्लेशक्षय नैयायिकों की दुःखाभाववाली स्थिति की
तरह नहीं है। नैयायिकों की आत्मा की मुक्त स्थिति शिलात्वमुक्ति की है।
परन्तु अश्वघोष की दार्शनिकता में उनकी बुद्धि और भावना इस तरह घुल-मिल
गई है जैसे धूपछाँही वस्त्र में दो रंगों के तार, जो अपनी-अपनी भिन्नता के
कारण अपने रंगों से भिन्न एक तीसरे रंग की सृष्टि करते हैं। मानसिक वृत्तियों
की ऐसी सामञ्जस्यपूर्ण एकता 'सौन्दरनन्द' के अतिरिक्त अन्यत्र संभव नहीं
है। इसके लिए न अन्तर्जगत् त्याज्य है और न बाह्य, क्योंकि इसका विषय
सम्पूर्ण जीवन है, आंशिक नहीं। मुक्ति समग्र जीवन के लिए है; किसी खण्ड
या अंश के लिए नहीं। दुःखरूपी कारण का विनाश होते ही मुक्ति का मार्ग
स्वतः खुल जाता है। संसार में इस जन्मरूपी दुःख का कारण तृष्णाजन्य भोग-
रूपी दुःख का समूह ही होता है। इसके लिए न तो ईश्वर कारण है और न
विधि ही; प्रकृति, काल, स्वभाव या संयोग भी इसके कारण नहीं हो सकते—
'प्रवृत्तिदुःखस्य च तस्य लोके तृष्णादयो दोषगणा निमित्तम् ।
नैवेश्वरो न प्रकृतिर्न कालो नापि स्वभावो न विधिर्यदृच्छा ॥'
—सौ० न० १६।१७
मुक्तिधर्म अतर्क्य है, क्योंकि धर्म का कोई विचार नहीं है। वह असंगत भी
है, क्योंकि इन्द्रियजन्य ज्ञान से उसकी कोई संगति नहीं है और वह इन्द्रियों
से नहीं बल्कि किसी बहुत ही अन्य और भिन्न मार्ग से उपलब्ध होता है। मोक्ष
या धर्म किसी विचार की अनुभूति नहीं, बल्कि निर्विचार चैतन्य में हुआ बोध
है; जीवन से मुक्ति है। मुक्ति आत्मा की होती है और आत्मा अर्थात् निर्विचार
चैतन्य अतीन्द्रिय है। जीवन की परम निष्पत्ति ही मुक्ति है। निर्विचार चैतन्य
का चरम साक्षात् आत्मा है। इसलिए जो विचारणा आत्मा के सम्बन्ध में है,
वह व्यर्थ है। वह साधन सार्थक है, जो मुक्ति की ओर है। किसी चिन्तन के
पीछे जो है, वही बोध है, विवेक है, प्रज्ञा है। विचार में व्यस्त और ग्रस्त
व्यक्ति इस आत्मा को नहीं जान पाता है। मुक्ति की ओर जब यह आत्मा
अग्रसर होती है तो न यह पृथ्वी की ओर जाती है, न अन्तरिक्ष की ओर, न
( २२ )
किसी दिशा में, न विदिशा में, अपितु क्लेशक्षय होते ही यह स्वतः शान्त हो
जाती है, इसे ही बौद्धों ने मोक्ष या निर्वाण कहा है। इस निर्वाण को अश्वघोष
ने बड़े ही सरल ढंग से दीपकन्याय से उपन्यस्त किया है। दीपक बुझने पर जैसे
शान्त हो जाता है, उसी तरह क्लेशक्षय होते ही आत्मा मुक्त हो जाती है—
'दीपो यथा निवृत्तिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् ।
दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित् स्नेहक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥'
—सौ० न० १६।२८
'तथा कृती निवृत्तिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् ।
दिशं न काञ्चित् विदिशं न काञ्चित्, क्लेशक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥'
—सौ० न० १६।२९
ऊपर इसकी चर्चा हो चुकी है कि बौद्ध दार्शनिक आत्मा को केवल चैतन्य-
प्रवाह मानते हैं। अन्य पदार्थों की भांति वह भी क्षणिकवाद के सिद्धान्त से
आबद्ध है। मनुष्य का चित्त सतत विषय-प्रभाव से भरा है। कोई न कोई ज्ञेय
उसके ज्ञान को घेरे रहते हैं। ज्ञेय से ज्ञान को मुक्त करना पड़ता है। समाधि
चित्त की लयावस्था है। जैसे सागर की लहरें सागर में ही अन्ततः लय को
प्राप्त हो जाती है, वैसे ही चित्त भी समाधि अवस्था में अपनी समस्त वृत्ति-
तरंगों को शून्य कर परम चेतना में लय होता है। बौद्धदर्शन के इस सिद्धान्त
को स्पष्ट करने के लिए 'दीपकलिकान्याय' या 'नदीप्रवाहन्याय' का आश्रय
लिया है। दीपक की लौ जैसे प्रतिक्षण परिवर्त्तनशील है, किन्तु प्रतिक्षण परि-
वर्त्तितरूप तत्सदृश बना रहने से हमें ताद्रूप्य की भ्रान्ति कराता है। नदी सदा ही
प्रवहनशील है, परन्तु भ्रान्तिवश उसे हम वही पानी समझ लेते हैं। इसमें तो
पल-पल परिवर्त्तन है। जीवन का प्रवाह तो नदी की भांति है। नदी के प्रवाह
में भी अडिग चट्टान की तरह जो स्थिर है, वही चेतना है, वही आत्मा है,
उसका परमतत्त्व में विलयन ही मुक्ति है। इसके अतिरिक्त जीवन कुछ नहीं है,
यही परिवर्त्तनशीलता या प्रवाहमयता है, इसे ही दोष, दुःख या क्लेश कहा गया
है। दीपक जब तक जलता है, उसे स्वयं तो जलन की अनुभूति होती ही रहती
है, उसके बुझते ही वह जैसे शान्त हो जाता है उसी तरह क्लेशक्षय होते ही आत्मा
स्वतः मुक्त हो जाती है। यह परमशान्ति तो तभी होगी जब इस आत्मा की
क्षणिकता, चैतन्य प्रवाह की गतिशीलता शान्त हो जाय। इस दशा में आत्मा
कहीं जाती नहीं, इसकी आकृति में कोई परिवर्त्तन नहीं होता, प्रत्युत क्लेशक्षय
होते ही स्वयं शान्त हो जाती है। परन्तु बौद्ध दार्शनिकों के अनुसार वह शान्ति
नकारात्मक भी बिल्कुल नहीं कही जा सकती हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त
पर तथागत ने यहं बतलाया कि संसार में प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण उत्पत्ति, स्थिति
और विनष्टि क्रम में सतत प्रगतिशील है। अस्तित्व होना या अस्तित्व नहीं
( २३ )
होना, इन तथ्यों का सत्यस्वरूप यही है । बौद्धदर्शन में इसी को 'मज्झिमा-
पटिपदा' अर्थात् 'मध्यम मार्ग' कहा गया है ।
पश्चाद्वर्त्ती नागार्जुन ने इसी विचार को आगे बढाया और माध्यमिक दर्शन
या शून्यता दर्शन की स्थापना की, जिसका पर्याप्त विकास नालन्दा विश्व-
विद्यालय में हुआ । मध्यमकारिका में नागार्जुन ने लिखा है—
'न सतो नाऽपि परतो न द्वाभ्यां नाप्यहेतुतः ।
उत्पन्ना जातु विद्यन्ते भावाः क्वचन केचन ।।'
—नागार्जुन ।
मोक्षकामी दार्शनिक काम यानि मार को संसार का अधिपति समझता
है । अतः सर्वप्रथम उसे जीतकर शान्ति या परम शान्ति प्राप्त कर सकता है ।
यही कारण है कि वह काम को जीतने के लिए बद्धपरिकर रहता है । बुद्ध-
चरित का ग्यारहवां सर्ग इसका उदाहरण है । इस संसार में शत्रु हत्या करना
चाहते हैं, पर वे तो समय पर शत्रुभाव छोड़कर मित्र भी बन जाते हैं, किन्तु
काम इस संसार में या परलोक में प्रतिक्षण दुःख के हेतु हैं—
'इहैव भूत्वा रिपवो वधात्मकाः प्रयान्ति काले पुरुषस्य मित्रताम् ।
परत्र चैवेह च दुःखहेतवो भवन्ति कामाः न तु कस्यचिच्छिवाः ।।'
—सौ० न० ९।४७
यदि तुम्हें शक्तिशाली होने का घमंड है, अपने बल को महान् समझते हो
तो इसकी परीक्षा के लिए काम से युद्ध करो, अगर तुम इन्हें पराजित किये तो
निश्चय ही तुम बलवान् हो, अन्यथा तुम्हारा बल बेकार है । यही मारविजय
बौद्धदर्शन की कामना है ।
यह 'काम' क्या है ? साधारणतः जिसे काम कहते हैं—वह राग है, विष-
योपभोग की आसक्ति है और उसमें अपने आपको भुलाने का एक उपाय है,
एक युक्ति है । मनुष्य प्रतिपल दुःख में है, अपने आपको भूलना चाहता है ।
तथाकथित विषयोपभोग से वह यथार्थ जीवन से बहुत दूर चला जाता है । वह
आसक्ति में डूबकर अपने आपको भुला देता है । केवल दुःखों के प्रति मूर्च्छा
ला देता है । साधारणः काम नाम से जाने जानेवाले 'मार' ऐसे ही मूर्च्छा और
विस्मरण की चित्तस्थिति है । यह कामोपभोग सुख अति क्षणिक है । वह
दुःख से ही उत्पन्न होता है, दुःख को भुलाने के उपाय से ज्यादा नहीं है ।
जगत् के जाल से छुटकारा पाये नन्द की फिर से उसमें फँसने की इच्छा
की दयनीय दशा का एक मार्मिक चित्र दर्शनीय है—
'कृपणं बत यूथलालसो महतो व्याधभयाद्विनिःसृतः ।
प्रविविक्षति वागुरां मृगश्चपलो गीतरवेण वञ्चितः ।।'—सौ० न० ८।१५
इसी तरह बौद्धधर्म के चार आर्यसत्यों का वर्णन बौद्धदर्शन का ही एक
निदर्शन है—
( २४ )
'बाधात्मकं दुःखमिदं प्रसक्तं दुःखस्य हेतुः प्रभवात्मकोऽयम् ।
दुःखक्षयो निःशरणात्मकोऽयं, त्राणात्मकोऽयं प्रशमस्य मार्गः ॥'
—सौ० न० १६।४
शील, संयम और ब्रह्मचर्य के माध्यम से जीवन्मुक्त होने का उपाय,
प्रदर्शन ही बौद्धदर्शन के जीवन्त तत्त्व हैं। इसमें अहिंसा, सत्य, मैत्रीधर्म,
काम-विजय, इन्द्रिय-नियन्त्रण, आहार और आचारशुद्धि को महत्त्वपूर्ण स्थान
दिया गया है। सर्वप्राणियों पर मित्रचक्षु ही इस दर्शन का सर्वस्व है। इसका
स्वरूप ही प्राणिकल्याण या-सीमित अर्थ में आत्ममुक्ति है। अश्वघोष का दर्शन
उनकी कृतियों में इसी विचार से अनुप्राणित है।
( ४ ) अश्वघोष की कलात्मक मान्यता
अश्वघोष का कलात्मक दृष्टिकोण निश्चित रूप से उपदेशवादी या प्रचार-
वादी है। वे काव्यानन्द को रस का साधन मानते हैं, कालिदास की तरह
साध्य नहीं। इनकी कलात्मक मान्यता पर सोचते ही ध्यान आता है कि कविता
मानव-मन की तरह ही अतिपुरातन है। आजतक इस कलात्मकता की कोई
परिभाषा नहीं बन पाई, जिसमें तर्क-वितर्क की कोई संभावना न रहे। आदि-
युग से 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्' से लेकर आजतक शुष्कवादी युग तक जो कुछ
काव्यकला के रूप में और उसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में कहा जा चुका है,
वह परिणाम में कम नहीं हैं, किन्तु इससे न तो मनुष्य के मन का परितोष हो
सका और न ही उसकी तार्किक बुद्धि का समाधान। कवि अपने युग का प्रतिनिधि
होता है और युग अपनी समस्याएँ लेकर समाधान खोजता है। युग ही किसी
कवि की कलात्मक मान्यता को एक विशिष्ट रूपरेखा देता है। ऐसी स्थिति में
किसी कवि से किसी अन्य कवि की तुलना आलोचक के लिए कठिन काम बन
जाता है। फिर भी इनके अध्ययन-मनन से आलोचक को किसी निष्कर्ष पर तो
आना ही पड़ता है। इस दृष्टि से देश-विदेश के समानधर्मी कवियों के दृष्टि-
कोण की समता-विषमता पर स्थिर दृष्टि से किसी निष्कर्ष पर तो आना ही
पड़ेगा। कोटि-निर्धारण में इनके परवर्त्ती कवि कालिदास, भारवि, माघ और
श्रीहर्ष के समूह में इन्हें किसी भी स्थिति में डाला नहीं जा सकता। कालिदास
यदि विशुद्ध रसवादी कवि हैं तो भारवि अपनी अर्थगुरुता के कारण अल-
ङ्कार और रसवादी कवि हैं तथा कलाबाज पण्डित कवि हैं। जहाँ तक श्रीहर्ष
का प्रश्न है तो वे मूलतः विशुद्ध रसवादी कवि हैं। इनके बीच अश्वघोष कवि
होने के नाते दो व्यक्तित्व को अपनाकर चलते नजर आते हैं। बुद्धचरित का
कवि अपने पाठकों को परमशान्ति के मन्दिर तक कभी-कभी रमणीय,
अन्यथा अधिकतर शुष्क पार्वत्य प्रदेश से ले जाना चाहता है, परन्तु ठीक
उसके विपरीत सौन्दरनन्द का कवि अपने पाठकों को सीधे राजमार्ग से ले