सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 496 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३ )
'शान्तस्य तुष्टस्य सुखो विवेको विज्ञाततत्त्वस्य परीक्षकस्य ।
प्रहीणमानस्य च निर्मदस्य सुखं विरागत्वमसक्तबुद्धेः ॥'
—सौ० न० १८।४२
जिसने इस तत्त्व की सही-सही जानकारी प्राप्त कर ली, उसे फिर न
किसी की चिन्ता होती है और न कुछ आकुलता ही—
'अथो हि तत्त्वं परिगम्य सम्यङ्निर्धूय दोषानधिगम्य शान्तिम् ।
स्वं नाशमं सम्प्रति चिन्तयामि न तं जनं नाप्सरसो न देवान् ॥'
—सौ० न० १८।४३
ये दो तत्त्व, जिसके बीच प्रतीत्यसमुत्पाद है, में प्रथम तत्त्व तो यह है
कि संसार झूठा है । इसे ही असद्दृष्टि भी कहा जाता है । दूसरे तत्त्व के
भीतर यह कहा गया है कि सचमुच सर्वत्र केवल संसार का ही पूरा अस्तित्व
है । इसे ही सद्दृष्टि या आस्तिक्यदृष्टि भी कहा गया है । इस संसार पर
विजय पाने के लिए शील की रक्षा करनी चाहिए । इसी शील के सहारे सभी
कल्याणकारी कार्य होते हैं—
'शीलमास्थाय वर्तन्ते सर्वा हि श्रेयसि क्रियाः ।
स्थानाद्यानीव कार्याणि प्रतिष्ठाय वसुन्धराम् ॥'
—सौ० न० १३।२१
सद् विचार ही शील है, यही आचार है। इसके विनष्ट होने पर न तो
प्रव्रज्या रहती है और न ही गृहस्थता रहती है—
'एतावच्छीलमित्युक्तं आचारोऽयं समासतः ।
अस्य नाशेन नैव स्यात् प्रव्रज्या न गृहस्थता ॥'
—सौ० न० १३।१९
'सौन्दरनन्द' सिद्ध और साधक दोनों के लिए समान प्रेरणादायक महा-
काव्य है । इस महाकाव्य में राजवंशीय चित्र तो है, परन्तु उन राजकुमारों के
सिर पर न तो दर्पोद्धत रत्न-किरीट है, फिर भी उनका मस्तक ऊँचा है; ललाट
धार्मिक आभा से दीप्त है, हृदय रस से आप्यायित है और गैरिक रागों से
अनुरंजित है । इनका शौर्य रक्तपिपासु नहीं है । इनका जीवन शान्त, सुस्थिर
और उदात्त गुणों की कसौटी है । इनका धैर्य सागर की तरह अतलस्पर्शी है ।
ये अपनी शक्ति का कहीं प्रदर्शन नहीं करते, समय आने पर अत्यन्त सहज भाव
से अपनी धार्मिक गरिमा का परिचय मात्र उपस्थित कर देते हैं । इनके विचार
में सभी प्राणियों के लिए समान रूप से मैत्री की भावना है ।
'मैत्रीस्तनीं व्यञ्जनचारुसास्नां सद्धर्मदुग्धां प्रतिभानशृङ्गाम् ।
तवास्मि गां साधु निपीय तृप्तस्तुषेव गामुत्तमवत्सवर्णेः ॥'
—सौ० न० १८।६१
२ सौ० भू०