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सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

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( ६ )
पृ० १६० में पी० वी० आप्टे ने इनका स्थितिकाल १६६ से १९६ ई० माना
है। इससे भी अश्वघोष का समय प्रथम शती ही जान पड़ता है।
( ९ ) बुद्धचरित के अन्तिम सर्ग में अशोक का उल्लेख मिलता है। अतः
निश्चितरूप से अश्वघोष सम्राट् अशोक के परवर्ती हैं।
( १० ) महाराज कनिष्क की राजसभा में अश्वघोष, माठर तथा आयुर्वेद-
विशारद चरक एक साथ राजपण्डित थे। 'कु-का-त्सेन-पिन-च्युन-किंग' ( सं०
१३४० भाग ५, ४७२ ई० ) नामक पुस्तक में भी कनिष्क की सभा में तीनों
विद्वानों की उपस्थिति का उल्लेख है। उक्त तीनों विद्वानों की कनिष्क की
राजसभा में एक साथ उपस्थिति की सूचना 'चीनी संयुक्त रत्नपिटक सूत्र सं०
१३२९, भाग ३, ४७२ ई०' में भी मिलती है।
( ११ ) सिल्वां लेवी अश्वघोष को कनिष्क का सम-सामयिक एवं
नागार्जुन के पूर्ववर्ती मानते हैं।
( १२ ) चीनी परम्परा के अनुसार अश्वघोष सम्राट् कनिष्क के धर्मगुरु
थे। अभिधर्मपिटक की विभाषा नामक व्याख्या इसी समय लिखी गई थी। यह
व्याख्या ७८-१०० ई० के बीच लिखी गई थी।
( १३ ) प्रोफेसर ल्यूडर्स अश्वघोष-रचित शारिपुत्र-प्रकरण के आधार पर
यह मानते हैं कि उनकी रचना कनिष्क या हुविष्क के राज्यकाल में हुई थी।
( १४ ) डॉ० राधाकृष्णन् भी अश्वघोष को प्रथम शताब्दी में स्थित
कनिष्क का धार्मिक गुरु मानते हैं।
( १५ ) पी० बी० काणे भी अश्वघोष-कृत बुद्धचरित का रचनाकाल प्रथम
शताब्दी ही मानते हैं।
अश्वघोष सम्बन्धी उपर्युक्त बहिरन्तर्गत प्रमाणों के आधार पर इनका
स्थितिकाल प्रथम बौद्ध सम्राट् प्रियदर्शी अशोक के पश्चात् तथा द्वितीय बौद्ध
सम्राट् कनिष्क के समकालीन मानना युक्तिसंगत होगा। यद्यपि कनिष्क की
स्थिति विवादग्रस्त अवश्य रही है, किन्तु भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों के
मतानुसार अश्वघोष को ईसा के प्रथम शताब्दी में मानना ही अधिक युक्ति-
संगत प्रतीत होता है। सम्राट् कनिष्क की स्थिति यदि ७८ ई० निर्णीत है तो
अश्वघोष का भी यही समय मानना उपयुक्त प्रतीत होता है।
जीवनवृत्त—अश्वघोष सुवर्णाक्षी के पुत्र थे। इनका जन्मस्थान साकेत
था। ये आर्य, भदन्त, महापण्डित, महावादिन् तथा महाराज आदि विरुदों से
अलंकृत थे।
सौन्दरनन्द महाकाव्य की पुष्पिका तथा बुद्धचरित के अनुपलब्ध मूल के
तिब्बती अनुवाद के आधार पर डॉ० जान्स्टन कृत आंग्ल अनुवाद की पुष्पिका
से यह स्पष्ट है कि वे साकेत-निवासी थे। उनकी माता का नाम सुवर्णाक्षी था।