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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

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भी उसी अनुपात में अत्यन्त आवश्यक है। यहां यह कह देना अनुपयुक्त एवं
अप्रासंगिक न होगा कि उद्दण्ड अहंभाव को महत्त्व देने का अनिवार्य परिणाम
श्रेणीसंघर्ष के रूप में, हृदयहीन आर्थिक व्यवस्था के रूप में, राजनैतिक
शोषण और साम्राज्यवाद के रूप में हमारे सामने खड़ा है। हमें यह स्वयं
निर्णय लेना है कि संस्कृति और सभ्यता, विज्ञान एवं उद्योग की प्रगति का
अनिवार्य मार्ग यह मत्स्यन्याय ही है, अथवा वैसी प्रगति उस नैतिक चेतना के
आधार पर भी हो सकती है, जो भगवान् बुद्ध ने इस देश के नर-नारियों के
सामने रखी थी।
यह काव्य के ब्याज से एक ऐसा २८ सर्ग का महाकाव्य है, जिसमें शाक्य
सुगत की जीवनी की अपेक्षा उपदेश तथा सिद्धान्तों का अधिक वर्णन है। ४१४
से ४२१ ई० में उपस्थित भारत के एक प्रसिद्ध विद्वान् धर्मक्षेत्र ने इस महा-
काव्य का चीनी अनुवाद किया था। इस अनुवाद में यह ग्रन्थ २८ सर्गों का
है। ईसा के आठवीं शती में इसका तिब्बती अनुवाद किया गया। उस अनुवाद
में भी २८ सर्ग हैं। चीनी यात्री इत्सिंग की दृष्टि में भी यह महाकाव्य बृहदा-
कार है। किन्तु संस्कृत भाषा में जो यह महाकाव्य उपलब्ध है, उसमें केवल
१७ सर्ग ही है। इनके अन्तिम चार सर्ग अमृतानन्द द्वारा १९वीं शती में
जोड़ा गया है। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री द्वारा प्राप्त ग्रन्थ मात्र चौदहवें
सर्ग के मध्य तक ही रह जाता है। इसमें प्रथम सर्ग भी अधूरा ही मिलता है।
इस महाकाव्य में प्रथम पांच सर्गों तक भगवान् बुद्ध के जन्म से लेकर
निर्वाण हेतु उनके गृहत्यागे तक की कथा का वर्णन है। इनमें प्रारंभ के दो
सर्गों में अन्तःपुर विहार का वर्णन है। उसके बाद तीन सर्गों में संवेगोत्पत्ति
का वर्णन है। इसके बाद चौथे सर्ग में स्त्री-निवारण का वर्णन है। पञ्चम सर्ग
में बुद्ध का अभिनिष्क्रमण है। काव्यकला की दृष्टि से यह सर्ग पर्याप्त प्रभा-
वोत्पादक है। छठे एवं सातवें सर्ग में तथागत का तपोवन में प्रवेश का वर्णन
है। अष्टम सर्ग में कुमार के अभिनिष्क्रमण पर घोर विलाप का वर्णन है।
नवम सर्ग में निष्क्रमित कुमार का अन्वेषण है। दशम सर्ग में यायावर गौतम
मगध तक पहुँचते हैं। एकादश सर्ग में विषयोपभोग एवं काम की निन्दा है।
बारहवें सर्ग में महर्षि अराड़ के आश्रम में शान्तिलाभ के लिए गौतम पहुँचते
हैं। तेरहवें सर्ग में गौतम मार-विजय प्राप्त करते हैं। चौदहवें सर्ग के अन्त में
गौतम को बुद्धत्व की प्राप्ति होती है। इसके बाद का जो अंश उपलब्ध है वह
डॉ० जान्स्टन का अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध है। इसमें बुद्ध के शिष्यों, उनके
उपदेशों, सिद्धान्तों तथा निर्वाण का वर्णन है। इसके अतिरिक्त अशोक के
काल तक के संघ की स्थिति का वर्णन है।
काव्यकला की दृष्टि से 'बुद्धचरित' मन, आचार, अथवा रुचियों की
परिष्कृति का महाकाव्य है। बुद्ध के समय से लेकर अब तक संस्कृत जनता की