सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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जब तक वे सजग नहीं हो जाते । वे कैसे सजग हों ? इसका अनुभूत उपाय
उन्होंने बतलाया है । यही है अश्वघोष का मूल जीवनवृत्त ।
अश्वघोष की रचनाएँ
‘बौद्ध संस्कृति’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक में महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
ने लिखा है—'ताम्रयुग की सिन्धु उपत्यका की संस्कृति, उसके बाद टुटपूँजिया
संस्कृति वाले घुमन्तू आर्यों का समागम और वैदिक कर्मकाण्ड से होते उसका
परिव्राजकों के समय तक पहुँचना, इन ढाई हजार सालों में भिन्न-भिन्न जातियों
के सम्पर्क से होते भारतभूमि में एक संस्कृति तैयार हो गई थी । यहीं वह
संस्कृति थी, जिसमें सिद्धार्थ गौतम पैदा हुए और जिसके भीतर रहते वे बौद्ध
बने ।'
राहुल जी बौद्धधर्मावलम्बी एक अधिकारी विद्वान् थे । बुद्धदेव या बौद्ध
संस्कृत के सम्बन्ध में वे अधिकारपूर्वक बोलते थे या कुछ लिखते थे । इसी संस्कृति
के सुरभित सुमन संस्कृत बौद्ध वाङ्मय के प्रारंभिक विद्वानों में एक उत्कृष्ट
विद्वान् कवि अश्वघोष थे । अश्वघोष जैसे सुविज्ञ कवि के नाम पर कालान्तर
में कितनी कृतियाँ आकर जुट गईं—इसका लेखा-जोखा प्रस्तुत करना असंभव
नहीं तो दुष्कर अवश्य है । यह इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि
प्राचीन परन्तु प्रख्यात ऐतिहासिक व्यक्तित्व के साथ इतनी लचर कृतियाँ जोड़ दी
जाती है कि उनकी अपनी बहुमूल्य कृतियों की छवि भी ढँक जाती है । और
उन कचड़ों से चुनकर कृति-रत्नों को बाहर निकालना कठिन हो जाता है ।
अश्वघोष भी इस नियम के अपवाद नहीं हैं। उनकी मौलिक रचनाएँ कितनी
हैं, इस विषय में कहीं कुछ स्पष्ट नहीं है । कारण यह है कि राज्याश्रय पाने
पर बौद्धधर्म का प्रचार और प्रसार संसारव्यापी हुआ और सर्वत्र बुद्ध के
बौद्धानुयायियों के उपदेश को संगृहीत और संकलित किया गया । अश्वघोष
की कृतियों के संमिश्रण का यह भी एक प्रमुख कारण रहा है । चीनी और
तिब्बती परम्पराओं में अश्वघोष की कृतियों का कुछ संकलन उपलब्ध है । ये
संकलन अश्वघोष के नाम से प्रचलित हैं । तिब्बती परम्परा में निम्नलिखित
रचनाएँ संकलित हैं—
१. अष्टविघ्नकथा ( तञ्जवूर–मदो ९४, फोलियो २१०-६ ) ।
२. गण्डीस्तोत्रगाथा ( वही, वस्तोद फो० २१०, व-२१४ अ ) ।
३. दशकुशलकर्मपथनिर्देश ( वही, मदो, ९४ फो० २७१-७३ ) ।
४. परमार्थबोधिचित्रभावनाकर्मवर्णसंग्रह ( तञ्जवूर-मदो ९४, फोलियो
२७१-७३ ) ।
५. बुद्धचरित महाकाव्य ( वही, ९४ फो० १-११९ ) ।
६. मणीदीपमहाकारुणिकदेवपञ्चस्तोत्र (वही, ग्युंद ६८, फो० १५७-५८) ।