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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

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( ५ )
फिर भी बहिरन्तर साक्ष्यों के आधार पर उनका कनिष्ककालीन होना सिद्ध
होता है । इस संदर्भ में निम्नलिखित तर्क परीक्ष्य हैं—
( १ ) चीनदेश के प्रसिद्ध प्रवासी ह्वेनसांग ने सौमान्तिक सम्प्रदाय का
प्रथम आचार्य कुमारजीव या कुमारलब्ध को माना है। इनके अनुसार उस समय
चारों दिशाओं में बौद्ध धर्म के चार आचार्य थे । पूर्व में अश्वघोष, दक्षिण में
देव, पश्चिम में नागार्जुन तथा उत्तर में कुमारजीव नामक संस्थापक
आचार्य थे ।
( २ ) अनेक विद्वान् इस सिद्धान्त के पक्षधर हैं कि सम्राट् कनिष्क द्वारा
कुण्डलवन विहार में एक संगीति बुलाई गई थी । उस संगीति का पुण्य गौरव
अश्वघोष को प्राप्त है । एक चीनी परम्परा के अनुसार उस संगीति के सभापति
वसुमित्र तथा उपसभापति अश्वघोष थे ।
( ३ ) कुछ आलोचक शालिवाहन संवत् का आरम्भ कनिष्क की देन
मानते हैं । यह संवत् ७८ ई० से प्रारम्भ हुआ था । इस समय अश्वघोष का
अस्तित्व माना जाता है । सौन्दरनन्द महाकाव्य की भूमिका में डॉ० हरप्रसाद
शास्त्री ने अश्वघोष का समय ईसा के प्रथम शताब्दी का अन्तिम चरण
माना है ।
( ४ ) अपने 'संस्कृत-साहित्य का इतिहास' पृ० ५१६ में बलदेव उपाध्याय
ने अश्वघोष का समय एक से पचपन ईसवी के बीच का समय माना है ।
( ५ ) अपने सौन्दरनन्द की भूमिका में ई० एच० जान्स्टन ने अति-
प्रामाणिक ढंग से अश्वघोष का स्थितिकाल माना है ।
( ६ ) 'महाप्रज्ञापारमिताशास्त्र' नामक बौद्धग्रन्थों का चीनी अनुवाद—
सांग इंग की निर्वाण-तिथि ५०० वर्ष पश्चात् अश्वघोष की स्थिति को स्वीकार
करता है; किन्तु उसके भाष्यकार हुई ईन निर्वाण-तिथि के ३७० वर्ष बाद कवि
की सत्ता स्वीकार करता है ।
( ७ ) अश्वघोषकृत 'बुद्धचरित' का चीनी अनुवाद उपलब्ध है । यह
अनुवाद ईसा के पंचमशती के प्रारंभ का है । निश्चय ही भारत में पर्याप्त प्रचार
के बाद ही इसके चीनी अनुवाद की संभावना की जा सकती है । इससे भी यह
प्रमाणित होता है कि अश्वघोष का स्थितिकाल ई० ५०० से बहुत पहले
का होगा ।
( ८ ) नागार्जुन के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी 'जग्गय्यपेटस्तूप' से
मिलती है । यह स्तूप ईसा के तृतीय शती का है । नागार्जुन के किसी मित्र ने
इसे उत्कीर्णित किया था । अश्वघोष इनसे दो सरणि पूर्व हुए थे । नागार्जुन
सातवाहन नरेश के मित्र थे, जो बौद्धनागार्जुन ही थे और ये गौतमीपुत्र
'यज्ञश्री' के समकालीन थे । 'बौद्धधर्म के २५०० वर्ष पूर्व' नामक ग्रन्थ के