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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 496 में से

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प्राणिमात्र इनके लिए समान थे । सबकी भलाई और कल्याण के लिए
यह महाकाव्य सतत प्रयत्नशील है । विषयोन्माद का परित्याग, इन्द्रिय-विजय,
तप और साधना, दया, दान, सत्य, शौच, निर्भयता, मृदुता, साधुता और मुक्ति
के लिए सतत प्रयत्नशील रहना ही इस महाकाव्य का अन्तिम लक्ष्य है । शुद्ध
आजीविका और सदाचरण—इसकी प्राणशक्ति है ।
( ३ ) शारिपुत्र-प्रकरण
डॉ० ल्यूडर्स को मध्य एशिया (तुर्फान) में कुछ ग्रन्थ प्राप्त हुए । उनमें
तीन नाटक भी थे । उन तीन नाटकों में एक खण्डित नाटक की पाण्डुलिपि
भी थी । इनका सम्पादन एवं प्रकाशन प्रो० ल्यूडर्स ने किया । इसका नाम
शारिपुत्र-प्रकरण है । यही नाटक 'शारद्वतीपुत्र-प्रकरण' के नाम से भी मिलता
है । इस प्रकार के रूपकों में प्रकरण भी एक प्रकार का रूपक ही होता है ।
यह कृति भी अश्वघोष की ही मानी जाती है । क्योंकि इसकी पुष्पिका में भी
साकेतक सुवर्णाक्षी-पुत्र अश्वघोष का नाम अंकित है । एतदतिरिक्त इसके एक
पद्य का अविकल रूप बुद्धचरित में उपलब्ध है । अश्वघोष ने अपने सूत्रालङ्कार
नामक ग्रंथ में अनेकों बार शारिपुत्र-प्रकरण की चर्चा की है । इस रूपक से यह
पता चलता है कि किस प्रकार बुद्ध ने तरुण मौद्गल्यायण और उसके पुत्र को
अपने धर्म का अनुयायी बनाया था । इस प्रकरण का कथानक बुद्धचरित में
वर्णित कथा से कुछ भिन्न है; क्योंकि शिष्य जैसे ही तथागत के पास पहुँचते हैं,
वैसे ही इन्होंने इसकी भविष्यवाणी कर दी है ।
इसके अतिरिक्त इस रूपक में मध्यवर्गीय अन्य पात्रों के जीवन के साथ
लुच्चे, लफंगे, वेश्याएँ, चोर, जुआरी, शराबी प्रभृति लोगों के समाज का भी
चित्रण होता है, जिनका प्रौढ़ और परिष्कृत रूप शूद्रक के 'मृच्छकटिकम्' में
उपलब्ध होता है । इस प्रकरण में विदूषक का भी प्रयोग हुआ है । विदूषक
का ऐसा प्रयोग दूसरे 'गणिकारूपक' में भी उपलब्ध है । किन्तु इस प्रकरण
की कथा शृङ्गार से शान्त की ओर प्रवाहित है । दूसरा गणिकारूपक वेश्या,
विदूषक ब्राह्मण, सोमदत्त नामक नायक, राजकुमार, दासी, दास, दुष्ट आदि
से युक्त है । दोनों रूपकों में प्राकृत का प्रयोग है, जो डॉ० कीथ के मतानुसार
साहित्यिक प्राकृत से पुरानी है । द्रष्टव्य—डॉ० कीथ का 'संस्कृत ड्रामा'
पृ० ८८, १९५४ का लीथोग्राफिक संस्करण ।
फिर भी यह प्रकरण संस्कृत के मालतीमाधव की शैली से अधिक साम्य
रखता है । नाट्यशास्त्र के अनुसार प्रकरण के समस्त अंकों से यह अंक
सुसज्जित है । इसका नायक शारिपुत्र धीरोदात्त है । इसमें बुद्ध तथा इनके शिष्य
संस्कृत बोलते हैं तथा विदूषक एवं हीनपात्र प्राकृत भाषा का प्रयोग करते
हैं । ऐसे बौद्धधर्मानुयायी शारिपुत्र के साथ विदूषक के रखने से यह अनुमान