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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 496 में से

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( ७ )
भदन्त अपने युग के युगद्रष्टा, क्रान्तिकारी विचारक, महान् सन्त एवं
जीवन-सर्जक एक बौद्ध संन्यासी थे । वैसे तो बौद्धधर्म, परोपकार, अध्यात्म-
साधना में ही उनका जीवन-प्रवाह था, लेकिन कला, दर्शन, साहित्य, काव्य,
धर्मनीति, मोक्षोपाय और आयुर्वेदविज्ञान में भी वे अद्भुत एवं अद्वितीय थे ।
अपने महाकाव्यों में उन्होंने जो कुछ लिखा, पहले अपने जीवन में उन्होंने
उनका प्रयोग किया। वे सब उनके जीवन की आत्यन्तिक गहराइयों और
अनुभूतियों से उद्भूत हैं। उन्होंने जागतिक जीवन की गहनतम समस्याओं की
जड़ों का स्पर्श किया है। कामासक्त मानव-जीवन को उसकी समग्रता में
जानने, जीने और उससे मुक्तिपथ के वे जीवन्त यात्री थे ।
अश्वघोष ने 'बुद्धचरित' और 'सौन्दरनन्द' नामक प्रबन्ध काव्यों में बुद्ध
के जीवन के मार्मिक प्रसंगों और रससिक्त प्रकरणों को रूपान्तरित किया था
चरितकाव्यों की यह साहित्यिक परम्परा अवदानों में फूटी। दार्शनिक चिन्तन
की सशक्त लहरें उमड़ पड़ीं। जो प्रश्न नहीं रह गये थे, जिनके उत्तर सर्वथा
मान्य हो गये थे, उन्हें फिर से उठाया गया, उनके समाधान ढूंढ़े जाने लगे ।
अश्वघोष ने वैदिक धर्मों के विचारकों में आलोचनात्मक दृष्ट उत्पन्न की ।
उनके जीवन की यह सबसे बड़ी उपलब्धि थी ।
हम यहाँ यह बतलाने को उत्सुक नहीं है कि अश्वघोष ने अपने जीवन में
ज्ञान, दर्शन या धर्म की बातें कब, कहाँ और किस गहराई से कही हैं; यहाँ
हम इस बात को भी स्पष्ट करना नहीं चाहते हैं कि उनकी कृतियों में, उनके
जीवनवृत्तों में कितनी बारीकियाँ हैं। यहाँ हम उनके सम्बन्ध में यही स्पष्ट
करना चाहते हैं कि अश्वघोष ने अपने जीवन की समग्र अनुभूतियों को, अपने
युग के सम्पूर्ण परिवेश को अपनी कृतियों में छिपाकर रख दिया है। गहराई
से यदि इनकी कृतियों का अध्ययन किया जाय तो आज से हजारों साल पहले
निर्मित इन काव्यों, महाकाव्यों या प्रकरणों में तत्कालीन भारतीय समाज का
अत्यन्त स्पष्ट चित्र सामने उभर कर आ जाता है। खान-पान, रहन-सहन,
जीवन-यापन, वाणिज्य-व्यवसाय, विषय-वासना, त्याग-भोग, रोग-शोक, सत्य-
असत्य, शासन-व्यवस्था, आचार-अनाचार, विचार-अविचार, तर्क-वितर्क तथा
ज्ञान-प्रहाण तक का साफ-साफ अतिस्पष्ट चित्र सामने झलक उठता है।
इनकी कृतियों की भाषा अलंकारों से लदी नहीं है। सभी बातें सीधी-सादी
भाषा में कही गई है। इनका जीवन कितना साफ और स्वच्छ है—उसकी
प्रतिमूत्ति इनकी कृति है। इन्होंने मनुष्य को एक दयनीय प्राणी माना है। वह
यदि पापी है तो अपने पूर्वजन्म के अविद्याजनित संस्कारों के कारण। ये
अविद्याजनित संस्कार जन्म-जन्मान्तर से मानव के पीछे लगे हैं और आगे भी
जन्म-जन्मान्तर तक लगे ही रहेंगे। इससे छुटकारा पाना तब तक कठिन है,