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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages
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१८४ राजयोग

व्याख्या—हममे से अनेको ने मन को लाड-प्यार के लडके के समान कर डाला है। वह जो कुछ चाहता है, उसे वही दे दिया करते है। इसीलिए क्रियायोग का सतत अभ्यास आवश्यक है, जिससे मन को सयत करके अपने वश मे लाया जा सके। इस सयम के अभाव मे ही योग के सारे विघ्न उपस्थित होते है और उनसे फिर क्लेश की उत्पत्ति होती है। उन्हे दूर करने का उपाय है—क्रियायोग द्वारा मन को वशीभूत कर लेना, उसे अपना कार्य न करने देना।

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३॥

सूत्रार्थ—अविद्या, अस्मिता (अहकार), राग, द्वेष और अभिनिवेश (जीवन के प्रति ममता)—(ये पाँचों) क्लेश हैं।

व्याख्या—ये ही पचकलेश है, ये पाँच बन्धनो के समान हमे इस ससार मे बाँध रखते हैं। अविद्या ही शेष चार क्लेशों की जननीस्वरूप है। यह अविद्या ही हमारे दुख का एकमात्र कारण है। भला और किसकी शक्ति है, जो हमें इस प्रकार दुख में रख सके ? आत्मा तो नित्य आनन्दस्वरूप है। उसे अज्ञान—भ्रम—माया के सिवाय और कौन दुखी कर सकता है ? आत्मा के ये समस्त दुख केवल भ्रम मात्र है।

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥४॥

सूत्रार्थ—अविद्या ही उन शेष चार का उत्पादक क्षेत्रस्वरूप है। वे कभी लीनभाव से, कभी सूक्ष्मभाव से, कभी अन्य वृत्ति के द्वारा विच्छिन्न अर्थात् अभिभूत होकर और कभी प्रकाशित होकर रहते हैं।

व्याख्या—अविद्या ही अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश का कारण है। ये सस्कारसमूह विभिन्न मनुष्यो के मन में विभिन्न अवस्थाओ में रहते हैं। कभी-कभी वे प्रसुप्त रूप से

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पातंजल-योगसूत्र—२ १८५

रहते हैं। तुम लोग अनेक समय 'शिशु के समान भोला'—यह वाक्य सुनते हो; परन्तु सम्भव है, इस शिशु के भीतर ही देवता या असुर का भाव विद्यमान हो, जो धीरे-धीरे समय पाकर प्रकाशित होगा। योगी में पूर्व कर्मों के फलस्वरूप ये संस्कार सूक्ष्म भाव से रहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वे अत्यन्त सूक्ष्म अवस्था में रहते हैं और योगीगण उन्हें दबाकर रख सकते हैं। उनमें उन सस्कारो को प्रकाशित न होने देने की शक्ति रहती है। कभी-कभी कुछ प्रबल सस्कार अन्य कुछ संस्कारो को कुछ समय तक के लिए दबाकर रखते हैं, किन्तु ज्योही वह दबा रखनेवाला कारण चला जाता है, त्योही वे पहले के सस्कार फिर से उठ जाते हैं। इस अवस्था को विच्छिन्न कहते हैं। अन्तिम अवस्था का नाम है उदार। इस अवस्था मे संस्कार-समूह अनुकूल परिस्थितियो का सहारा पाकर बडे प्रबल भाव से शुभ या अशुभ रूप से कार्य करते रहते हैं।

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥५॥

सूत्रार्थ—अनित्य, अपवित्र, दुःखकर और आत्मा से भिन्न पदार्थ में (क्रमशः) नित्य, पवित्र, सुखकर और आत्मा की प्रतीति 'अविद्या' है।

व्याख्या—इन समस्त सस्कारो का एकमात्र कारण है अविद्या। हमें पहले यह जान लेना होगा कि यह अविद्या क्या है। हम सभी सोचते हैं, "मै शरीर हूँ—शुद्ध, ज्योतिर्मय, नित्य, आनन्दस्वरूप आत्मा नही।" यह अविद्या है। हम लोग मनुष्य को शरीर के रूप मे ही देखते और जानते हैं। यह महान् भ्रम है।

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतैवास्मिता ॥६॥

सूत्रार्थ—दृक्-शक्ति और दर्शन-शक्ति का एकीभाव ही अस्मिता है।

व्याख्या—आत्मा ही यथार्थ द्रष्टा है; वह शुद्ध, नित्य-

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१८६ राजयोग

पवित्र, अनन्त और अमर है। और दर्शन-शक्ति अर्थात् उसके व्यवहार मे आनेवाले यन्त्र कौन-कौनसे है ? चित्त, बुद्धि अर्थात् निश्चयात्मिका वृत्ति, मन और इन्द्रियां—ये उसके यन्त्र है। ये सब बाह्य जगत् को देखने के लिए उसके यन्त्रस्वरूप है, और उसकी इन सब के साथ एकरूपता को अस्मितारूप अविद्या कहते है। हम कहा करते है, 'मै चित्तवृत्ति हूँ', 'मै क्रुद्ध हुआ हूँ', 'मै सुखी हूँ'। पर सोचो तो सही, हम कैसे क्रुद्ध हो सकते हैं, कैसे किसी के प्रति घृणा कर सकते हैं ? आत्मा के साथ हमे अपने को अभिन्न समझना चाहिए। आत्मा का तो कभी परिणाम नही होता। यदि आत्मा अपरिणामी हो, तो वह कैसे इस क्षण सुखी, और दूसरे ही क्षण दु खी हो सकती है ? वह निराकार, अनन्त और सर्वव्यापी है। उसे कौन परिणामी बना सकता है? आत्मा सर्व प्रकार के नियमो के अतीत है। उसे कौन विकृत कर सकता है? ससार में कोई भी, आत्मा पर किसी प्रकार का कार्य नही कर सकता ।' तो भी हम लोग अज्ञानवश अपने आप को मनोवृत्ति के साथ एक-रूप कर लेते हैं और सोचा करते है कि हम सुख या दुःख का अनुभव कर रहे है।

सुखानुशयी रागः ॥७॥

सूत्रार्थ—जो मनोवृत्ति केवल सुखकर पदार्थ के ऊपर रहना चाहती है, उसे राग कहते हैं।

व्याख्या—हम किसी-किसी विषय मे सुख पाते है। जिसमें हम सुख पाते है, मन एक प्रवाह के समान उसकी ओर दौडता रहता है। सुख-केन्द्र की ओर दौडनेवाले मन के इस प्रवाह को ही राग या आसक्ति कहते हैं। हम जिस विषय मे सुख नहीं पाते, उधर हमारा मन कभी भी आकृष्ट नही होता। हम लोग

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पातंजल-योगसूत्र-२ १८७

कभी-कभी नाना प्रकार की विचित्र चीजों में सुख पाते हैं, तो भी राग की जो परिभाषा दी गई है, वह सर्वत्र ही लागू होती है। हम जहां सुख पाते है, वही आकृष्ट हो जाते हैं।

दुःखानुशयी द्वेषः ॥८॥

सूत्रार्थ—दुखकर वस्तु पर पुनः-पुनः स्थितिशील एक विशेष अन्तःकरण-वृत्ति को द्वेष कहते हैं।

व्याख्या—जिसमें हम दुख पाते है, उसे तत्क्षण त्याग देने का प्रयत्न करते हैं।

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥९॥

सूत्रार्थ—जो (पहले के मृत्यु के अनुभवों से) स्वभावत चला आ रहा है एवं जो विवेकशील पुरुषों में भी विद्यमान देखा जाता है, वह अभिनिवेश अर्थात् जीवन के प्रति ममता है।

व्याख्या—जीवन के प्रति यह ममता जीवमात्र मे प्रकट रूप से देखी जाती है। इस पर उत्तर-काल सम्बन्धी बहुत से मतो को स्थापित करने का प्रयत्न किया गया है। मनुष्य ऐहिक जीवन से इतना प्यार करता है कि उसकी यह आकाक्षा रहती है कि वह भविष्य में भी जीवित रहे। यह कहने की आवश्यकता नही कि इस युक्ति का कोई विशेष मूल्य नही है—पर इसमें सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि पाश्चात्यो के मतानुसार इस जीवन के प्रति ममता से भविष्य-जीवन की जो सम्भावना सूचित होती है, वह केवल मनुष्य के बारे में सत्य है, दूसरे प्राणियो के बारे मे नही। भारत में, पूर्वसंस्कार और पूर्वजीवन को प्रमाणित करने के लिए यह अभिनिवेश एक युक्तिस्वरूप हुआ है। मान लो, यदि समस्त ज्ञान हमे प्रत्यक्ष अनुभूति से प्राप्त हुए हों, तो यह निश्चित है कि हमने जिसका कभी प्रत्यक्ष-अनुभव नही किया,-

१८८ राजयोग

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१८८ राजयोग

उसकी कल्पना भी कभी नही कर सकते, अथवा उसे समझ भी नही सकते। मुरगी के बच्चे अण्डे में से बाहर आते ही दाना चुगना आरम्भ कर देते हैं। बहुधा ऐसा भी देखा गया है कि यदि कभी मुरगी के द्वारा बतक का अण्डा सेया गया, तो बतक का बच्चा अण्डे मे से बाहर आते ही पानी मे चला गया, और उसकी मुरगी-माँ इधर सोचती है कि शायद बच्चा पानी में डूब गया। यदि प्रत्यक्ष-अनुभूति ही ज्ञान का एकमात्र उपाय हो, तो इन मुरगी के बच्चो ने कहाँ से दाना चुगना सीखा ? अथवा बतक के इन बच्चो ने यह कैसे जाना कि पानी उनका स्वाभाविक स्थान है ? यदि तुम कहो कि वह सहज प्रेरणा (instinct) मात्र है, तो उससे कुछ भी बोध नही होता, वह तो केवल एक शब्द का प्रयोग मात्र हुआ—वह कोई स्पष्टीकरण तो है नही। यह सहज प्रेरणा क्या है ? हम लोगो में भी ऐसी बहुतसी सहज प्रेरणाएँ है। उदाहरणार्थ, आपमे से अनेक महिलाएँ पियानो बजाती है, आपको यह अवश्य स्मरण होगा, जब आपने पहले-पहल पियानो सीखना आरम्भ किया था, तब आपको सफेद और काले परदो में, एक के बाद दूसरे में कितनी सावधानी के साथ उँगलियाँ रखनी पडती थी, किन्तु कुछ वर्षो के अभ्यास के बाद अब शायद आप किसी मित्र के साथ बातचीत भी कर सकती हैं और साथ ही आपकी उँगलियाँ भी पियानो पर अपने आप चलती रहती है। अर्थात् वह अब आप लोगो की सहज प्रेरणा मे परिणत हो गया है—वह आप लोगो के लिए अब पूर्ण रूप से स्वाभाविक हो गया है। हम जो अन्य सब कार्य करते हैं, उनके बारे में भी ठीक ऐसा ही है। अभ्यास से वह सब सहज प्रेरणा में परिणत हो जाता है, स्वाभाविक हो जाता है। और

पातंजल-योगसूत्र-२ १८९

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पातंजल-योगसूत्र-२ १८९

जहाँ तक हम जानते हैं, आज जिन क्रियाओं को हम स्वाभाविक या सहज प्रेरणा से उत्पन्न कहते हैं, वे सब पहले विचारपूर्वक ज्ञान की क्रियाएँ थी और अब निम्नभावापन्न होकर इस प्रकार स्वाभाविक हो पड़ी हैं। योगियो की भाषा मे, सहज ज्ञान या सहज प्रेरणा विचार की निम्नभावापन्न क्रमशकुचित अवस्था मात्र है। विचार-जनित ज्ञान अवनतभावापन्न होकर स्वाभाविक सस्कार के रूप मे परिणत हो जाता है। अतएव यह बात पूर्णरूपेण युक्तिसगत है कि हम इस जगत् में जिसे सहज प्रेरणा कहते है, वह विचार-जनित ज्ञान की निम्नावस्था मात्र है। पर चूंकि यह विचार प्रत्यक्ष-अनुभूति बिना नही हो सकता, इसलिए समस्त सहज प्रेरणाएँ पहले की प्रत्यक्ष-अनुभूतियो के फल हैं। मुरगी के बच्चे चील से डरते हैं, बतक के बच्चे पानी पसन्द करते हैं, ये दोनो पहले की प्रत्यक्ष-अनुभूतियो के फलस्वरूप है। अब प्रश्न यह है कि यह अनुभूति जीवात्मा की है, अथवा केवल शरीर की ? बतक अभी जो कुछ अनुभव कर रही है, वह उस बतक के पूर्वजो की अनुभूति से आया है, अथवा वह उसकी अपनी प्रत्यक्ष-अनुभूति है ? आधुनिक वैज्ञानिक कहते है, वह केवल उसके शरीर का धर्म है, पर योगीगण कहते है कि वह मन की अनुभूति है और वह शरीर के भीतर से होकर आ रही है। इसी को पुनर्जन्मवाद कहते हैं।

हमने पहले देखा है कि हमारा समस्त ज्ञान—प्रत्यक्ष, विचारजनित या सहज—एकमात्र प्रत्यक्ष-अनुभूतिरूप ज्ञान की प्रणाली से होकर ही आ सकता है; और जिसे हम सहज ज्ञान या सहज प्रेरणा कहते है, वह हमारी पूर्व प्रत्यक्ष-अनुभूति का फल है, वह पूर्व अनुभूति ही आज अवनतभावापन्न होकर सहज

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३९० राजयोग

प्रेरणा के रूप में परिणत हो गई है और यह सहज प्रेरणा फिर से विचारजनित ज्ञान में परिणत हो जाती है। सारे संसार भर में यही क्रिया चल रही है। इस पर ही भारत में पुनर्जन्मवाद की एक प्रधान युक्ति स्थापित हुई है। पूर्वानुभूत बहुतसे भय के संस्कार कालान्तर में इस जीवन के प्रति ममता के रूप में परिणत हो जाते हैं। यही कारण है कि बालक बिलकुल बचपन से ही अपने आप डरता रहता है, क्योकि उसके मन में दुःख का पूर्व अनुभूतिजनित संस्कार विद्यमान है। अत्यन्त विद्वान् मनुष्यो में भी—जो जानते हैं कि यह शरीर एक दिन चला जायगा, जो कहते हैं कि 'आत्मा की मृत्यु नहीं, हमारे तो सैकडो शरीर हैं, अतएव भय किस बात का'—ऐसे विद्वान् पुरुषो में भी, उनकी सारी विचारजनित धारणाओ के बावजूद भी हम इस जीवन के प्रति प्रगाढ ममता देखते हैं। जीवन के प्रति यह ममता कहाँ से आई ? हमने देखा है कि यह हमारे लिए सहज या स्वाभाविक हो गई है। योगियो की दार्शनिक भाषा में कह सकते हैं कि वह संस्कार के रूप में परिणत हो गई है। ये सारे संस्कार सूक्ष्म (तनु) और गुप्त (प्रसुप्त) होकर मन के भीतर मानो सोए हुए पड़े हैं। मृत्यु के ये सब पूर्व अनुभव— वह सब जिसे हम सहज प्रेरणा या सहज ज्ञान कहते हैं—मानो अवचेतन अर्थात् ज्ञान की निम्न भूमि में पहुँच गए हैं। वे चित्त में ही वास करते हैं। वे वहाँ निष्क्रिय रूप से अवस्थान करते हो, ऐसी बात नहीं, वरन् भीतर-ही-भीतर कार्य करते रहते हैं।

स्थूल रूप में प्रकाशित चित्तवृत्तियो को हम समझ सकते हैं और उनका अनुभव कर सकते हैं, उनका दमन अधिक सुगमता से किया जा सकता है। पर इन सब सूक्ष्मतर संस्कारो का

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पातंजल-योगसूत्र—२ १९१

दमन कैसे होगा ? उन्हें कैसे दबाया जाय ? जब मैं क्रुद्ध होता हूँ, तब मेरा सारा मन मानो क्रोध की एक बड़ी तरंग में परिणत हो जाता है। मैं वह अनुभव कर सकता हूँ, उसे देख सकता हूँ, उसे मानो हाथ में लेकर हिला-डुला सकता हूँ, उसके साथ अनायास ही, जो इच्छा हो वही कर सकता हूँ, उसके साथ लड़ाई कर सकता हूँ, पर यदि मैं मन के अत्यन्त गहरे प्रदेश में न जा सकूँ, तो कभी भी मैं उसे जड़ से उखाड़ने में सफल न हो सकूँगा। कोई मुझे दो कड़ी बातें सुना देता है, और मैं अनुभव करता हूँ कि मेरा खून गरम होता जा रहा है। उसके और भी कुछ कहने पर मेरा खून उबल उठता है और मैं अपने आपे से बाहर हो जाता हूँ, क्रोध-वृत्ति के साथ मानो अपने को एक कर लेता हूँ। जब उसने मुझे सुनाना आरम्भ किया था, उस समय मुझे अनुभव हो रहा था कि मुझमें क्रोध आ रहा है। उस समय क्रोध अलग था और मैं अलग; किन्तु जब मैं क्रुद्ध हो उठा, तो मैं ही मानो क्रोध में परिणत हो गया। इन वृत्तियों को जड़ से—उनकी सूक्ष्मावस्था से ही उखाड़ना पड़ेगा, वे हमारे ऊपर कार्य कर रही है, यह समझने के पहले ही उन पर संयम करना पड़ेगा। संसार के अधिकतर मनुष्यों को तो इन वृत्तियों की सूक्ष्मावस्था के अस्तित्व तक का पता नहीं। जिस अवस्था में ये वृत्तियाँ अवचेतन अर्थात् ज्ञान की निम्न भूमि से थोड़ी-थोड़ी करके उदित होती हैं, उसी को वृत्ति की सूक्ष्मावस्था कहते हैं। जब किसी सरोवर की तली से एक बुलबुला ऊपर उठता है, तब हम उसे देख नहीं पाते; केवल इतना ही नहीं, जब वह सतह के बिलकुल नजदीक आ जाता है, तब भी हम उसे देख नहीं पाते, पर जब वह ऊपर उठकर फट जाता है और एक लहर फैला देता है, तभी हम उसका

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१९२ राजयोग

अस्तित्व जान पाते हैं। इसी प्रकार जब हम इन वृत्तियों को उनकी सूक्ष्मावस्था में ही पकड़ सकेंगे, तभी हम उन्हें रोकने में समर्थ हो सकेंगे। उनके स्थूल रूप धारण करने के पहले ही यदि हम उनको पकड़ न सके, उनको संयत न कर सके, तो फिर किसी भी वासना पर सम्पूर्ण रूप से जय प्राप्त कर सकने की आशा नहीं। वासनाओं को संयत करने के लिए हमें उनके मूल में जाना पड़ेगा। तभी हम उनके बीज तक को दग्ध कर डालने में सफल होंगे। जैसे भूने हुए बीज जमीन में बो देने पर फिर अंकुरित नहीं होते, उसी प्रकार ये वासनाएँ भी फिर कभी उदित न होंगी।

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥१०॥

**सूत्रार्थ—**उन सूक्ष्म संस्कारों को प्रतिप्रसव यानी प्रतिलोम-परिणाम के द्वारा (अर्थात् चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन द्वारा) नाश करना पड़ता है।

**व्याख्या—**ध्यान के द्वारा जब चित्तवृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं, तब जो बच रहता है, उसे सूक्ष्म संस्कार या वासना कहते हैं। उसको नष्ट करने का उपाय क्या है? उसे प्रतिप्रसव अर्थात् प्रतिलोम-परिणाम के द्वारा नष्ट करना पड़ता है। प्रतिलोम-परिणाम का अर्थ है—कार्य का कारण में लय। चित्तरूप कार्य जब समाधि के द्वारा अस्मितारूप अपने कारण में लीन हो जाता है, तभी चित्त के साथ ये सब संस्कार भी नष्ट हो जाते हैं।

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥११॥

**सूत्रार्थ—**ध्यान के द्वारा उनकी (स्थूल) वृत्तियाँ नष्ट करनी पड़ती हैं।

**व्याख्या—**ध्यान ही इन बड़ी तरंगों की उत्पत्ति को रोकने का एक प्रधान उपाय है। ध्यान के द्वारा मन की ये वृत्तिरूप-

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पातंजल-योगसूत्र-२ १९३

लहरे दब जाती हैं। यदि तुम दिन-पर-दिन, मास-पर-मास, वर्ष-पर-वर्ष, इस ध्यान का अभ्यास करो—जब तक वह तुम्हारे स्वभाव मे न भिद जाय, जब तक तुम्हारे इच्छा न करने पर भी वह ध्यान आप-से-आप न आने लगे—तो क्रोध, घृणा आदि वृत्तियाँ संयत हो जायेंगी।

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥१२॥

सूत्रार्थ—कर्मसंस्कारो के समुदाय की जड़ ये सब पूर्वोक्त क्लेश ही हैं; वर्तमान या भविष्य में होने वाले जीवन में वे फल प्रसव करते हैं।

व्याख्या—कर्माशय का अर्थ है इन सस्कारो की समष्टि। हम जो भी कार्य करते है, वह मानस-सरोवर मे एक लहर उठा देता है। हम सोचते है कि इस काम के समाप्त होते ही वह लहर भी चली जायगी, पर वास्तव में वैसा नही होता। वह तो बस सूक्ष्म आकार भर धारण कर लेती है, पर रहती वही है। जब हम उस कार्य को स्मरण मे लाने का प्रयत्न करते है, त्योही वह फिर से उठ आती है और लहर-रूप धारण कर लेती है। इससे यह स्पष्ट है कि वह मन के ही भीतर छिपी हुई थी, यदि ऐसा न होता, तो स्मृति ही सम्भव न होती। अतएव हर एक काम, हर एक विचार, वह चाहे शुभ हो चाहे अशुभ, मन के सबसे गहरे प्रदेश में जाकर सूक्ष्मभाव धारण कर लेता है और वही सचित रहता है। सुखकर या दुखकर सभी प्रकार के विचार को क्लेश कहते है, क्योकि योगियो के मतानुसार दोनो से ही अन्त में दुःख उत्पन्न होता है। इन्द्रियो से जो सब सुख मिलते हैं, वे अन्त में दुःख ही लाते है, क्योकि भोग से और अधिक भोग की तृष्णा होती है और इसका अनिवार्य फल होता है—दुःख। मनुष्य की वासना का कोई अन्त नही, वह लगातार वासना-पर-

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१९४ राजयोग

वासना रखता जाता है और जब ऐसी अवस्था में पहुँचता है, जहाँ उसकी वासना पूर्ण नहीं होती, तो फल होता है—दुःख। इसीलिए योगीगण शुभ-अशुभ समस्त संस्कारों की समष्टि को क्लेश कहते हैं, वे सब आत्मा की मुक्ति में बाधक होते हैं।

हमारे सारे कार्यों के सूक्ष्म मूलस्वरूप संस्कारों के बारे में भी ऐसा ही समझना चाहिए। वे कारणस्वरूप होकर इहजीवन अथवा परजीवन में फल प्रसव करते हैं। विशेष स्थलों में ये संस्कार, विशेष प्रबल रहने के कारण, बहुत शीघ्र अपना फल दे देते हैं, अत्युत्कट पुण्य या पाप कर्म इहजीवन में ही अपना फल सामने ला देता है। योगीगण कहते हैं कि जो मनुष्य इहजीवन में ही अत्यन्त प्रबल शुभ संस्कार उपार्जन कर सकते हैं, उन्हें मृत्यु तक वाट जोहने की आवश्यकता नहीं होती, वे तो इसी जीवन में अपने शरीर को देव-शरीर में परिणत कर सकते हैं। योगियों के ग्रन्थों में इस प्रकार के कई दृष्टान्तों का उल्लेख मिलता है। ये व्यक्ति अपने शरीर के उपादान तक को बदल डालते हैं। ये लोग अपने शरीर के परमाणुओं को ऐसे नए ढंग से ठीक कर लेते हैं कि उनको फिर और कोई बीमारी नहीं होती, और हम लोग जिसे मृत्यु कहते हैं, वह भी उनके पास नहीं फटक सकती। ऐसी घटना न होने का तो कोई कारण नहीं है। शरीरविधानशास्त्र खाद्य का अर्थ बतलाते हैं—सूर्य से शक्ति-ग्रहण। वह शक्ति पहले वनस्पति में प्रवेश करती है, उस वनस्पति को कोई पशु खा लेता है, फिर उस पशु को कोई मनुष्य। इसे वैज्ञानिक भाषा में व्यक्त करना हो, तो कहना पड़ेगा कि हमने सूर्य से कुछ शक्ति ग्रहण करके उसे अपने अंगीभूत कर लिया। यदि यही बात हो, तो इस शक्ति

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पातंजल-योगसूत्र--२ १९५

को अपने अन्दर लेने के लिए केवल एक ही तरीका क्यो रहना चाहिए ? पौधे हमारी तरह शक्तिग्रहण नही करते; और हम जिस प्रकार शक्ति सग्रह करते हैं, धरती उस प्रकार नही करती। पर तो भी सभी किसी-न-किसी प्रकार से शक्तिसग्रह करते ही हैं। योगियो का कहना है कि वे केवल मन की शक्ति के द्वारा शक्तिसग्रह कर सकते हैं। वे कहते हैं कि हम बिना किसी साधारण उपाय का अवलम्बन किए ही यथेच्छ शक्ति भीतर ले सकते हैं। जैसे एक मकडी अपने ही उपादान से जाला बनाकर उसमे बद्ध हो जाती है और जाले के तन्तुओ का सहारा लिए बिना कही नही जा सकती, उसी प्रकार हमने भी अपने ही उपादान से इस स्नायु-जाल की सृष्टि की है और अब उस स्नायु-प्रणाली का बिना अवलम्बन किए कोई काम ही नही कर सकते। योगी कहते है, हम क्यो उसमे बद्ध हो ?

इस तत्व को और एक उदाहरण देकर समझाया जा सकता है। हम पृथ्वी के किसी भी भाग में विद्युत्-शक्ति भेज सकते हैं, पर उसके लिए हमे तार की जरूरत पड़ती है। किन्तु प्रकृति तो बिना तार के ही बडे परिमाण मे यह शक्ति भेजती रहती है। हम भी वैसा क्यों न कर सकेगे ? हम चारो ओर मानस-विद्युत् भेज सकते हैं। हम जिसे मन कहते हैं, वह बहुत कुछ विद्युत्-शक्ति के ही सदृश है। स्नायु के बीच मे जो एक तरल पदार्थ प्रवाहित होता है, उसमे बडे परिमाण मे विद्युत्-शक्ति है, इसमें कोई सन्देह नही, क्योकि विद्युत् के समान उसके भी दोनो ओर विपरीत शक्तिद्वय दिखाई पडती है, तथा विद्युत् के अन्यान्य सब धर्म उसनें भी देखे जाते है। इस विद्युत्-शक्ति को अभी हम केवल स्नायुओ में से ही प्रवाहित कर सकते

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१९६ राजयोग

है। पर बात यह है कि स्नायुओ की सहायता लिए बिना ही हम इसे क्यो नही प्रवाहित कर सकेगे ? योगी कहते है, हाँ, यह पूरी तरह से सम्भव है, और सम्भव ही नही, वरन् इसे कार्य में भी परिणत किया जा सकता है। और जब तुम इसमे कृत-कार्य हो जाओगे, तब सारे ससार भर मे अपनी इस शक्ति को परिचालित करने मे समर्थ हो जाओगे । तब तुम किसी स्नायु-यन्त्र की सहायता लिए बिना ही किसी भी स्थान मे, किसी भी शरीर द्वारा कार्य कर सकोगे । जब तक आत्मा इस स्नायु-यन्त्ररूप प्रणाली के भीतर से काम करती रहती है, हम कहते है, कि मनुष्य जीवित है, ओर जब इन यन्त्रो का कार्य बन्द हो जाता है, तो कहते है कि मनुष्य मर गया । पर जब मनुष्य इस प्रकार के स्नायु-यन्त्र की सहायता से, या बिना उसकी सहायता के भी, कार्य करने मे समर्थ हो जाता है, तब उसके लिए जन्म और मृत्यु का कोई अर्थ नही रह जाता । ससार मे जितने शरीर है, वे सब-के-सब तन्मात्रायो से बने हुए हैं, उनमें भेद है केवल तन्मात्राओ के विन्यास की प्रणाली मे । यदि तुम्ही उस विन्यास के कर्ता हो, तो तुम इच्छानुसार शरीर की रचना कर सकते हो । यह शरीर तुम्हारे सिवाय और किसने बनाया है ? अन्न कौन खाता है ? यदि कोई और तुम्हारे लिए भोजन करता रहे, तो तुम कोई अधिक दिन जीवित न रहोगे । उस अन्न से रुधिर भी कौन तैयार करता है ? अवश्य तुम्ही । उस रुधिर को शुद्ध करके कौन धमनियो में प्रवाहित करता है ? तुम्ही । हम शरीर के मालिक हैं और उसमे वास करते हैं। उसका किस प्रकार पुनर्गठन किया जाय, बस इसी ज्ञान को हम खो बैठे हैं। हम यन्त्र के समान अवनतस्वभाव हो गए है। हम शरीर के परमाणुओ को.

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पातंजल-योगसूत्र-२ ११७

त्रिविन्यासप्रणाली भूल गए हैं। अतः आज हम जिसे यन्त्रवत् किए जा रहे हैं, उसी को अब जान-बूझकर करना होगा। हम ही तो मालिक हैं—कर्ता हैं, अतः हमी को इस विन्यासप्रणाली को नियमित करना होगा। और जब हम इसमें कृतकार्य हो जायेंगे, तब अपनी इच्छानुसार शरीर का पुनर्गठन कर लेंगे, और तब हमारे लिए जन्म, मृत्यु, आधि-व्याधि कुछ भी न रह जायगा।

सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥१३॥

सूत्रार्थ—(मन में इस संस्काररूप) मूल के विद्यमान रहने तक उसका फलभोग (मनुष्य आदि विभिन्न) जाति, (भिन्न-भिन्न) आयु और सुख-दुःख के भोग (के रूप में) होता रहता है।

**व्याख्या—**संस्काररूप जड़ अर्थात् कारण भीतर में विद्यमान रहने के कारण वे ही व्यक्तभाव धारण कर फल के रूप में परिणत होते हैं। कारण का नाश होकर कार्य अर्थात् फल का उदय होता है, फिर कार्य सूक्ष्मभाव धारण कर बाद के कार्य का कारणस्वरूप होता है। वृक्ष बीज को उत्पन्न करता है, बीज फिर बाद के वृक्ष की उत्पत्ति का कारण होता है। हम इस समय जो कुछ कर्म कर रहे हैं, वे समस्त पूर्वसंस्कार के फल-स्वरूप हैं। ये ही कर्म फिर संस्कार के रूप में परिणत होकर भावी कार्य का कारण हो जायेंगे। बस इसी प्रकार कार्य-कारण-प्रवाह चलता रहता है। इसीलिए यह सूत्र कहता है कि कारण विद्यमान रहने से उसका फल या कार्य अवश्यमेव होगा। यह फल पहले जाति के रूप में प्रकाशित होता है—कोई लोग मनुष्य होंगे, तो कोई देवता, कोई पशु, तो कोई असुर। फिर, यह कर्म आयु को भी नियमित करता है। एक मनुष्य पचास वर्ष जीवित रहता है, तो दूसरा सौ वर्ष, और कोई दो वर्ष के बाद

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१९८ राजयोग

ही चल बसता है। यह जो आयु की विभिन्नता है, वह पूर्वकर्म द्वारा ही नियमित होती है। फिर इसी प्रकार, किसी को देखने पर प्रतीत होता है कि मानो सुख-भोग के लिए ही उसका जन्म हुआ है—यदि वह वन में भी चला जाय, तो वहां भी सुख मानो उसके पीछे-पीछे जाता है। और कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा होता है कि उसके पीछे दुःख मानो छाया के समान लगा रहता है। यह सब उनके अपने-अपने पूर्वकर्म का फल है। योगियों के मतानुसार पुण्यकर्म सुख लाते हैं और पापकर्म दुःख। जो मनुष्य कुकर्म करता है, वह क्लेश के रूप में अपने किए का फल अवश्य भोगता है।

ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥१४॥

सूत्रार्थ—वे (जाति, आयु और भोग) हर्ष और शोकरूप फल के देनेवाले होते हैं, क्योंकि उनके कारण हैं पुण्य और पाप कर्म।

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥१५॥

सूत्रार्थ—परिणाम-काल में परिणाम (नतीजा) रूप जो दुःख है, भोग-काल में भोग में विघ्न होने की आशंकारूप जो दुःख है, अथवा सुख के संस्कार से उत्पन्न होनेवाला तृष्णारूप जो दुःख है—उस सबका जन्मदाता होने के कारण, तथा गुणवृत्तियों में अर्थात् सत्त्व, रज और तम में परस्पर विरोध होने के कारण विवेकी पुरुष के लिए सब-का-सब दुःखरूप ही है।

व्याख्या—योगीगण कहते हैं कि जिनमें विवेकशक्ति है, जिनमें थोड़ीसी भी अन्तर्दृष्टि है, वे सुख और दुःख नामवाली सर्वविध वस्तुओं के अन्तस्तल तक को देख लेते हैं और जान लेते हैं कि ये सुख और दुःख आपस में मानो गुंथे हुए हैं, एक ही

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पातजल-योगसूत्र-२ १९९

दूसरे मे परिणत हो जाता है और इनसे संसार मे कोई भी अछूता नही रहता—ये सबके पास आते हैं। वे विवेकी पुरुष देखते है कि मनुष्य सारा जीवन मृगजल के पीछे दौड़ता रहता है और कभी अपनी वासनाओ को पूर्ण नही कर पाता। एक समय महाराज युधिष्ठिर ने कहा था, 'जीवन मे सबसे आश्चर्य-जनक घटना तो यह है कि हम प्रतिक्षण प्राणियो को कालकवलित होते देखते हैं, फिर भी सोचते है कि हम कभी नही मरेंगे।' चारो ओर मूर्खो से घिरे रहकर हम सोचते है कि हमी एकमात्र पण्डित है। चारो ओर सब प्रकार की चचलता के दृष्टान्तो से घिरे रहकर हम सोचते है कि हमारा प्यार ही एकमात्र स्थायी प्यार है। यह कैसे हो सकता है ? प्यार भी स्वार्थपरता से भरा है। योगी कहते हैं, 'अन्त में हम देखेंगे कि दोस्तो का प्रेम, सन्तान का प्रेम, यहाँ तक कि पति-पत्नी का प्रेम भी धीरे-धीरे क्षीण होकर नाश को प्राप्त हो जाता है।' नाश ही इस ससार का धर्म है—वह किसी भी वस्तु को अछूता नही रखता। जब मनुष्य ससार की समस्त वासनाओ मे, यहाँ तक कि प्यार में भी निराश हो जाता है, तभी मानो आश्चर्यचकित के समान वह समझ पाता है कि यह ससार भी कैसा भ्रम है, कैसा स्वप्न के समान है। तभी वैराग्य की एक किरण उसके हृदय मे फैलती है, तभी वह जगदातीत सत्ता की मानो थोड़ीसी झलक पाता है। इस ससार को छोडने पर ही पारलौकिक तत्त्व हृदय मे उद्भासित होता है, इस ससार के सुख में आसक्त रहते तक यह कभी सम्भव नही होता। ऐसे कोई महात्मा नही हुए, जिन्हे यह उच्चावस्था प्राप्त करने के लिए इन्द्रिय-सुख-भोग त्यागना न पड़ा हो। दुःख का कारण है—प्रकृति की विभिन्न शक्तियो का

> द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥१७॥

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२०० | राजयोग

आपस में विरोध। प्रत्येक अपनी-अपनी ओर खींचती है, और इस प्रकार स्थायी सुख असम्भव हो जाता है।

हेयं दुःखमनागतम् ॥१६॥

सूत्रार्थ— जो दुःख अभी तक नहीं आया, उसका त्याग करना चाहिए।

व्याख्या— कर्म का कुछ अंश हम पहले ही भोग चुके हैं, कुछ अंश हम वर्तमान में भोग रहे हैं, और शेष अंश भविष्य में फल प्रदान करेगा। हमने जिसका भोग कर लिया है, वह तो अब समाप्त हो चुका। हम वर्तमान में जिसका भोग कर रहे हैं, उसका भोग तो हमें करना ही पड़ेगा, केवल जो कर्म भविष्य में फल देने के लिए बच रहा है, उसी पर हम जय प्राप्त कर सकते हैं अर्थात् उसका नाश कर सकते हैं। इसीलिए हमें अपनी पूरी शक्ति उस कर्म के नाश के लिए प्रयुक्त कर देनी चाहिए, जिसने अभी तक कोई फल पैदा नहीं किया है।

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥१७॥

सूत्रार्थ— यह जो हेय है, अर्थात् जिस दुःख का त्याग करना होगा, उसका कारण है द्रष्टा और दृश्य का संयोग।

व्याख्या— इस द्रष्टा का अर्थ क्या है?—मनुष्य की आत्मा—पुरुष। दृश्य क्या है?—मन से लेकर स्थूल भूत तक सारी प्रकृति। इस पुरुष और मन के संयोग से ही समस्त सुख-दुःख उत्पन्न हुए हैं। तुम्हें याद होगा, इस योगदर्शन के मतानुसार पुरुष शुद्धस्वरूप है, ज्योंही वह प्रकृति के साथ संयुक्त होता है और प्रकृति में प्रतिबिम्बित होता है, त्योंही वह सुख अथवा दुःख का अनुभव करता हुआ प्रतीत होता है।

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥१८॥

सूत्रार्थ— प्रकाश, क्रिया और स्थिति जिसका स्वभाव है, भूत और

पातंजल-योगसूत्र-२ २०१

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पातंजल-योगसूत्र-२ २०१

इन्द्रियां जिसका (प्रकट) स्वरूप है, (पुरुष के) भोग और मुक्ति के लिए ही जिसका प्रयोजन है, वह दृश्य है।

व्याख्या—दृश्य अर्थात् प्रकृति भूतो और इन्द्रियों की समष्टि है; भूत कहने से स्थूल, सूक्ष्म सब प्रकार के भूतो का बोध होता है, और इन्द्रिय से आँख आदि समस्त इन्द्रियाँ तथा मन आदि का भी बोध होता है। उनके धर्म तीन प्रकार के हैं; जैसे—प्रकाश, कार्य और स्थिति यानी जड़त्व, इन्ही को दूसरे शब्दो मे सत्त्व, रज और तम कहते है। समग्र प्रकृति का उद्देश्य क्या है? यही कि पुरुष समुदाय भोग करके विशेषज्ञ हो जाय। पुरुष मानो अपने महान् ईश्वरीय भाव को भूल गया है। इस सम्बन्ध में एक बड़ी सुन्दर कहानी है—

किसी समय देवराज इन्द्र शूकर बनकर कीचड मे रहते थे, उनके एक शूकरी थी—उस शूकरी से उनके बहुतसे बच्चे पैदा हुए थे। वे बडे सुख से समय बिताते थे। कुछ देवता उनकी यह दुरावस्था देखकर उनके पास आकर बोले, "आप देवराज है, समस्त देवगण आपके शासन के अधीन है। फिर आप यहाँ क्यों हैं?" परन्तु इन्द्र ने उत्तर दिया, "मै बडे मजे मे हूँ। मुझे स्वर्ग की परवाह नही, यह शूकरी और ये बच्चे जब तक हैं, तब तक स्वर्ग आदि कुछ भी नही चाहिए।" देवगण यह सुनकर तो किंकर्तव्य-विमूढ हो गए—उन्हे कुछ सूझ न पडा। कुछ दिनो बाद उन्होने मन-ही-मन एक सकल्प किया कि वे एक-के-बाद-एक सब बच्चो को मार डालेगे। एक दिन उन्होने आकर एक बच्चे को मार डाला, फिर दूसरे को, और इस प्रकार सभी बच्चे मार डाले गए। अन्त में देवगणो ने उस शूकरी को भी मार डाला। जब इन्द्र का सारा परिवार इस प्रकार नष्ट हो गया, तो इन्द्र कातर होकर विलाप

२०२ राजयोग

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२०२ राजयोग

करने लगे। तब देवताओ ने इन्द्र की शूकर-देह को भी चीर डाला। तब तो इन्द्र उस शूकर-देह से बाहर होकर हँसने लगे और सोचने लगे, 'मे भी कैसा भयकर स्वप्न देख रहा था। कहाँ मे देवराज, और कहाँ इस शूकर-जन्म को ही एकमात्र जन्म समझ बैठा था, यही नही, वरन् सारा ससार शूकर-देह धारण करे, ऐसी कामना कर रहा था।' पुरुष भी बस इसी प्रकार प्रकृति के साथ मिलकर भूल जाता है कि वह शुद्धस्वभाव और अनन्तस्वरूप है। पुरुष को अस्तित्वशाली नही कहा जा सकता, क्योकि वह स्वय अस्तित्वस्वरूप है। आत्मा को ज्ञानसम्पन्न नही कहा जा सकता, क्योकि आत्मा स्वय ज्ञानस्वरूप है। उसे प्रेम-सम्पन्न नही कहा जा सकता, क्योकि वह स्वय प्रेमस्वरूप है। आत्मा को अस्तित्वशाली, ज्ञानयुक्त अथवा प्रेममय कहना सर्वथा भूल है। प्रेम, ज्ञान और अस्तित्व पुरुष के गुण नही, वे तो उसका स्वरूप हैं। जब वे किसी वस्तु मे प्रतिबिम्बित होते हैं, तब चाहो तो उन्हे उस वस्तु के गुण कह सकते हो। किन्तु वे पुरुष के गुण नही हैं, वे तो उस महान् आत्मा, उस अनन्त पुरुष का स्वरूप हैं, जिसका न जन्म है, न मृत्यु और जो अपनी महिमा में विराजमान है। किन्तु वह यहाँ तक स्वरूपभ्रष्ट हो गया है कि यदि तुम उसके पास जाकर कहो कि तुम शूकर नही हो, तो वह चिल्लाने लगता है और काटने दौडता है।

इस माया के बीच, इस स्वप्नमय जगत् के बीच हमारी भी ठीक वही दशा हो गई है। यहाँ है केवल रोना, केवल दुख,- केवल हाहाकार। अजीब तमाशा है यहाँ का। यहाँ सोने के कुछ गोले लुढका दिए जाते है और बस सारा ससार उनके लिए पागलो के समान छूट पडता है। तुम कभी भी किसी नियम के

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पातंजल-योगसूत्र-२ २०३

बद्ध नहीं थे। प्रकृति का बन्धन तुम पर किसी काल मे नहीं है। योगी तुम्हे यही शिक्षा देते है, धैर्यपूर्वक इसको सीखो। योगी यह समझने देते हैं कि पुरुष किस प्रकार इस प्रकृति के साथ अपने को मिलाकर--अपने को मन और जगत् के साथ एकरूप करके अपने आप को दुःखी समझने लगता है। योगी यह भी कहते है कि इस दुखमय संसार से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय है--प्रकृति के सारे सुख-दु ख भोगकर अभिज्ञता प्राप्त कर लेना। भोग अवश्यम्भावी है, वह तो करना ही होगा, अतएव जितनी जल्दी वह कर लिया जाय, उतना ही मगल है। हमने अपने आपको इस जाल. मे फँसा लिया है, हमे इसके बाहर आना होगा। हम स्वय-इस फन्दे मे फँस गए हैं, और अब अपने ही प्रयत्न से उससे मुक्ति प्राप्त करनी पडेगी। अतएव, पति-पत्नी सम्बन्धी, मित्र सम्बन्धी तथा और भी जो सब छोटी-छोटी प्रेम की आकाक्षाएँ है, सभी को भोग कर डालो। यदि अपना स्वरूप तुम्हे सदा याद रहे, तो तुम शीघ्र ही निर्विघ्न इसके पार हो जाओगे। यह कभी न भूलना कि यह अवस्था बिलकुल अल्प समय के लिए है और हमे इसके भीतर से बाध्य होकर जाना पड रहा है। भोग--सुख--दुःख का यह अनुभव ही--हमारा एकमात्र महान् शिक्षक है, लेकिन स्मरण रहे, ये सब भोग मार्ग की केवल सामयिक घटनाएँ मात्र हैं, वे क्रमश हमें एक ऐसी अवस्था मे ले जाते है, जहाँ ससार की समस्त वस्तुएँ बिलकुल तुच्छ हो जाती हैं। तब पुरुष विश्वव्यापी विराट् के रूप मे प्रकाशित हो जाती है और तब यह सारा विश्व सिन्धु मे एक बिन्दु-सा प्रतीत होने लगता है और अपनी ही इस क्षुद्रता के कारण--इस शून्यता के कारण न जाने कहाँ विलीन हो जाता है। सुख-दुःख का भोग तो