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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 203 of 307

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Page 203

१८६ राजयोग

पवित्र, अनन्त और अमर है। और दर्शन-शक्ति अर्थात् उसके व्यवहार मे आनेवाले यन्त्र कौन-कौनसे है ? चित्त, बुद्धि अर्थात् निश्चयात्मिका वृत्ति, मन और इन्द्रियां—ये उसके यन्त्र है। ये सब बाह्य जगत् को देखने के लिए उसके यन्त्रस्वरूप है, और उसकी इन सब के साथ एकरूपता को अस्मितारूप अविद्या कहते है। हम कहा करते है, 'मै चित्तवृत्ति हूँ', 'मै क्रुद्ध हुआ हूँ', 'मै सुखी हूँ'। पर सोचो तो सही, हम कैसे क्रुद्ध हो सकते हैं, कैसे किसी के प्रति घृणा कर सकते हैं ? आत्मा के साथ हमे अपने को अभिन्न समझना चाहिए। आत्मा का तो कभी परिणाम नही होता। यदि आत्मा अपरिणामी हो, तो वह कैसे इस क्षण सुखी, और दूसरे ही क्षण दु खी हो सकती है ? वह निराकार, अनन्त और सर्वव्यापी है। उसे कौन परिणामी बना सकता है? आत्मा सर्व प्रकार के नियमो के अतीत है। उसे कौन विकृत कर सकता है? ससार में कोई भी, आत्मा पर किसी प्रकार का कार्य नही कर सकता ।' तो भी हम लोग अज्ञानवश अपने आप को मनोवृत्ति के साथ एक-रूप कर लेते हैं और सोचा करते है कि हम सुख या दुःख का अनुभव कर रहे है।

सुखानुशयी रागः ॥७॥

सूत्रार्थ—जो मनोवृत्ति केवल सुखकर पदार्थ के ऊपर रहना चाहती है, उसे राग कहते हैं।

व्याख्या—हम किसी-किसी विषय मे सुख पाते है। जिसमें हम सुख पाते है, मन एक प्रवाह के समान उसकी ओर दौडता रहता है। सुख-केन्द्र की ओर दौडनेवाले मन के इस प्रवाह को ही राग या आसक्ति कहते हैं। हम जिस विषय मे सुख नहीं पाते, उधर हमारा मन कभी भी आकृष्ट नही होता। हम लोग