राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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उसकी कल्पना भी कभी नही कर सकते, अथवा उसे समझ भी नही सकते। मुरगी के बच्चे अण्डे में से बाहर आते ही दाना चुगना आरम्भ कर देते हैं। बहुधा ऐसा भी देखा गया है कि यदि कभी मुरगी के द्वारा बतक का अण्डा सेया गया, तो बतक का बच्चा अण्डे मे से बाहर आते ही पानी मे चला गया, और उसकी मुरगी-माँ इधर सोचती है कि शायद बच्चा पानी में डूब गया। यदि प्रत्यक्ष-अनुभूति ही ज्ञान का एकमात्र उपाय हो, तो इन मुरगी के बच्चो ने कहाँ से दाना चुगना सीखा ? अथवा बतक के इन बच्चो ने यह कैसे जाना कि पानी उनका स्वाभाविक स्थान है ? यदि तुम कहो कि वह सहज प्रेरणा (instinct) मात्र है, तो उससे कुछ भी बोध नही होता, वह तो केवल एक शब्द का प्रयोग मात्र हुआ—वह कोई स्पष्टीकरण तो है नही। यह सहज प्रेरणा क्या है ? हम लोगो में भी ऐसी बहुतसी सहज प्रेरणाएँ है। उदाहरणार्थ, आपमे से अनेक महिलाएँ पियानो बजाती है, आपको यह अवश्य स्मरण होगा, जब आपने पहले-पहल पियानो सीखना आरम्भ किया था, तब आपको सफेद और काले परदो में, एक के बाद दूसरे में कितनी सावधानी के साथ उँगलियाँ रखनी पडती थी, किन्तु कुछ वर्षो के अभ्यास के बाद अब शायद आप किसी मित्र के साथ बातचीत भी कर सकती हैं और साथ ही आपकी उँगलियाँ भी पियानो पर अपने आप चलती रहती है। अर्थात् वह अब आप लोगो की सहज प्रेरणा मे परिणत हो गया है—वह आप लोगो के लिए अब पूर्ण रूप से स्वाभाविक हो गया है। हम जो अन्य सब कार्य करते हैं, उनके बारे में भी ठीक ऐसा ही है। अभ्यास से वह सब सहज प्रेरणा में परिणत हो जाता है, स्वाभाविक हो जाता है। और