राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातंजल-योगसूत्र-२ १८७
कभी-कभी नाना प्रकार की विचित्र चीजों में सुख पाते हैं, तो भी राग की जो परिभाषा दी गई है, वह सर्वत्र ही लागू होती है। हम जहां सुख पाते है, वही आकृष्ट हो जाते हैं।
दुःखानुशयी द्वेषः ॥८॥
सूत्रार्थ—दुखकर वस्तु पर पुनः-पुनः स्थितिशील एक विशेष अन्तःकरण-वृत्ति को द्वेष कहते हैं।
व्याख्या—जिसमें हम दुख पाते है, उसे तत्क्षण त्याग देने का प्रयत्न करते हैं।
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥९॥
सूत्रार्थ—जो (पहले के मृत्यु के अनुभवों से) स्वभावत चला आ रहा है एवं जो विवेकशील पुरुषों में भी विद्यमान देखा जाता है, वह अभिनिवेश अर्थात् जीवन के प्रति ममता है।
व्याख्या—जीवन के प्रति यह ममता जीवमात्र मे प्रकट रूप से देखी जाती है। इस पर उत्तर-काल सम्बन्धी बहुत से मतो को स्थापित करने का प्रयत्न किया गया है। मनुष्य ऐहिक जीवन से इतना प्यार करता है कि उसकी यह आकाक्षा रहती है कि वह भविष्य में भी जीवित रहे। यह कहने की आवश्यकता नही कि इस युक्ति का कोई विशेष मूल्य नही है—पर इसमें सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि पाश्चात्यो के मतानुसार इस जीवन के प्रति ममता से भविष्य-जीवन की जो सम्भावना सूचित होती है, वह केवल मनुष्य के बारे में सत्य है, दूसरे प्राणियो के बारे मे नही। भारत में, पूर्वसंस्कार और पूर्वजीवन को प्रमाणित करने के लिए यह अभिनिवेश एक युक्तिस्वरूप हुआ है। मान लो, यदि समस्त ज्ञान हमे प्रत्यक्ष अनुभूति से प्राप्त हुए हों, तो यह निश्चित है कि हमने जिसका कभी प्रत्यक्ष-अनुभव नही किया,-