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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

About this granth

Prem Darshan (प्रेम-दर्शन) is Hanuman Prasad Poddar's detailed Hindi commentary on the Narada Bhakti Sutra. The sutra, a short text of eighty-four aphorisms attributed to the sage Narada, defines bhakti as supreme love for God ("sa tvasmin paramapremarupa"). Poddar (1892–1971), known as Bhaiji, was the founding editor of the magazine Kalyan and a central figure of the Gita Press.

The commentary groups the sutras into four sections: the nature and marks of supreme devotion; the means to devotion, giving up ego and the value of holy company; the indescribable nature of loving devotion and the difference between secondary and primary bhakti; and the eleven forms of attachment to God and the pre-eminence of bhakti. Opening essays introduce Narada, the nature of devotion as love, and single-minded love, and Poddar draws often on the gopis and the saints to illustrate the sutras.

This is the Gita Press, Gorakhpur edition; the copy records its fortieth reprint in Samvat 2077. At about 178 pages, it is an accessible guide for readers on the path of devotion.

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७४ प्रेम-दर्शन
जाता है। यदि कहीं ऐसे महापुरुष मिल भी जाते हैं तो उनका
पहचानना बहुत कठिन होता है। क्योंकि बाह्य आचार तो ढोंगी और
नाटकके पात्र भी किसी अंशमें वैसा ही दिखला सकते हैं। आँखोंसे
आँसुओंका बहना, रोना, हँसना और चिल्लाना ही प्रेमीके लक्षण
नहीं हैं। अनेक बाह्य कारणोंसे भी ऐसा हो सकता है। फिर कोई-
कोई सच्चे प्रेमी ऐसे भी हो सकते हैं, जो इन लक्षणोंवाली स्थितिसे
भी आगे बढ़ चुके हों और जिनके बाह्य आचार साधारण समझसे
बाहर हों। प्रेमीजन तो किसीको कहने जाते ही नहीं कि हमें प्रेमी
मानो और कहनेसे मानता भी कौन है। अतएव ऐसे निःस्पृही
भगवज्जनोंकी पहचान बहुत ही कठिन है, इसीसे उनके संगको दुर्गम
बतलाया गया है। परन्तु सौभाग्यसे यदि कहीं ऐसे महात्मा पुरुष
मिल जाते हैं तो उनका बिना जाने मिल जाना भी कभी व्यर्थ नहीं
हो सकता; क्योंकि वह अमोघ है। जब साधारण सदाचारी, विद्वान्
साधुओंका समागम ही अन्तःकरणकी शुद्धिका कारण होकर पाप,
ताप और दैन्यका निवारण करनेमें समर्थ होता है; तब जिनका हृदय
भगवत्प्रेमसे छलकता है, जो प्रेम और आनन्दकी मूर्ति हैं, जिनके
स्मरणमात्रसे ही पापोंका नाश होता है, उन भगवदीय प्रेमी महात्माओंके
दर्शनका महान् फल अवश्य ही प्राप्त होता है।
जैसे अमावस्याकी अँधेरी रातमें सोया हुआ आदमी यदि
सूर्योदय होनेपर भी सोता ही रहे तो उसको न जागनेतक
प्रकाशका अनुभव नहीं होता, परन्तु प्रकाश तो सूर्योदयके साथ-
साथ हो ही जाता है। और जैसे कोई धनी पुरुष अपने किसी
प्रेमी दरिद्र आदमीके नामपर अपनी करोड़ोंकी सम्पत्ति ट्रांसफर
करवा देता है, तो वह दरिद्र उसी समयसे धनी तो हो जाता है;
परन्तु जबतक उसको इस बातका पता नहीं लगता तबतक वह
अपनेको दरिद्र ही समझता है। इसी प्रकार किन्हीं भगवत्प्रेमी

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प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ७५
महापुरुषके अज्ञात संगसे भी पाप और अज्ञानरूपी अन्धकारका
नाश होकर ज्ञानरूप सूर्यका प्रकाश और प्रेमरूप परमनिधि तो
मिल जाती है, परन्तु जबतक इस बातका पता नहीं लगता
तबतक इस लाभसे अपरिचित रहनेके कारण मनुष्य आनन्दको
प्राप्त नहीं होता। अवश्य ही इस स्थितिका परिचय मिलनेमें
अधिक विलम्ब नहीं होता। इसीसे महत्संगको अमोघ (अवश्य
फलदायी) बतलाया गया है।
लभ्यतेऽपि तत्कृपयैव ॥ ४० ॥
४०-उस (भगवान्)-की कृपासे ही (महत्पुरुषोंका)
संग भी मिलता है।
अवश्य ही ऐसे सन्तका मिलन हरि-कृपासे ही होता है।
भगवान् जिसपर कृपा करके अपनाना चाहते हैं, उसीके पास,
प्रेमपाशमें अपनेको बाँध रखनेकी शक्तिवाले, अपने ही स्वरूपभूत
प्रेमी भक्तको भेजते हैं। वस्तुतः भगवत्कृपा और महान् पुरुषोंका
संग एक-दूसरेके आश्रित हैं। महत्पुरुषोंके संग बिना भगवत्कृपाका
अनुभव नहीं होता और भगवत्कृपा बिना ऐसे महापुरुष नहीं
मिलते। श्रीविभीषणको भी श्रीहनूमान्‌जीके मिलनेपर ही भगवत्कृपाका
अनुभव हुआ, इसीसे उन्होंने कहा—
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरि कृपा मिलहिं नहि संता॥
तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् ॥ ४१ ॥
४१-क्योंकि भगवान्‌में और उनके भक्तमें भेदका
अभाव है।
भगवान्‌के भक्त भगवत्स्वरूप ही हैं (ब्रह्मविद् ब्रह्मैव
भवति) जो भक्तोंका सेवन करते हैं वे भगवान्‌का ही सेवन
करते हैं। भक्त भगवान्‌के हृदयमें बसते हैं और भगवान् भक्तके
हृदयमें। भगवान्‌ने कहा है—

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साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।
मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥
(श्रीमद्भा० ९।४।६८)
'साधु मेरे हृदय हैं और मैं उनका हृदय हूँ। वे मेरे सिवा और
किसीको नहीं जानते तथा मैं उन्हें छोड़कर और किसीको नहीं
जानता।' भरत रामको भजते हैं और राम भरतको—
भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही॥
श्रीभगवान्‌ने प्रेमस्वरूपा गोपियोंके सम्बन्धमें कहा है—
मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्रद्धां मन्मनोगतम्।
जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति तत्त्वतः॥
'हे अर्जुन ! मेरा माहात्म्य, मेरी पूजा, मेरी श्रद्धा और मेरे मनकी
बात तत्त्वसे केवल गोपियाँ ही जानती हैं और कोई नहीं जानता।'
ऐसे प्रेमी भक्तोंमें और भगवान्‌में क्या अन्तर है? भगवान्‌ने कहा
ही है—
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
(गीता ९।२९)
'जो प्रेमसे मुझको भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।' ऐसे
भक्त भगवत्प्रेममें इस प्रकार तल्लीन रहते हैं कि वे अपने बाह्य
रूपको भूलकर साक्षात् भगवत्-स्वरूपका अनुभव करने लगते
हैं। गोपियाँ भगवान्‌को ढूँढ़ती हुई ऐसी तन्मय हो गयीं कि वे
उन्हींकी लीला करने लगीं—
मोहन लाल रसालकी लीला इनहीं सोहैं।
केवल तन्मय भई कछु न जानें हम को हैं॥
(नन्ददासजी)
तदेव साध्यतां तदेव साध्यताम्॥ ४२॥
४२- (अतएव) उस (महत्संग)-की ही साधना करो,
उसीकी साधना करो।

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प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ७७
अतएव भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके लिये ऐसे भगवत्प्रेमी महापुरुषोंके
संगकी ही प्रबल इच्छा करो। भगवत्कृपासे प्रेमी सन्त मिल
जायँगे और सन्त-मिलनके प्रतापसे ही हम पाप-तापसे छूटकर
निर्मल भगवत्प्रेमको प्राप्त कर सकेंगे। इसमें एक बड़ा रहस्य है।
मान लीजिये, एक महान् प्रतापी राजा है और साथ ही वह बड़ा
भारी प्रेमी भी है; परन्तु प्रेम हरेकके साथ नहीं होता। राजा
राजसभामें और अपने राज्यमें अपना प्रभाव और ऐश्वर्य तो खूब
दिखला सकता है, परन्तु अपने मुँहसे अपने प्रेमका रहस्य
किसीके सामने नहीं कह सकता। हम प्रजाके रूपमें विधिके
अनुसार उससे मिलकर विधिवत् बातें कर सकते हैं, परन्तु न
तो प्रेमका रहस्य पूछ सकते हैं और न वह हमें बतला ही सकता
है। उसके प्रेमका गुह्य रहस्य जानना या उसके प्रेमराज्यमें प्रवेश
करना हो तो उसके किसी अनन्य प्रेमीका—जिसके साथ राजाका
व्यक्तिगत प्रेमका निर्मल (राज्यविधिसे अतीत) सम्बन्ध है और
जिसके साथ वह परस्पर खुली प्रेमचर्चा करता है—संग करना
होगा और उसके हृदयमें अपना विश्वास पैदा करके उसके द्वारा
राजाके प्रेमका रहस्य जानना होगा और उसीके द्वारा राजाके
निकट अपना प्रेमसन्देश पहुँचाना होगा तथा अपनी पात्रता सिद्ध
करनी होगी। जब राजा हमें पात्र समझ लेगा तो हमें भी उसीकी
भाँति प्रेमगोष्ठीमें शामिल कर लेगा। इसी प्रकार भगवान् भी
अपने प्रेमका रहस्य अपने मुँहसे नहीं बतलाते। भगवान्‌ने
उद्धवको प्रेमशिक्षा दिलानेके लिये गोपियोंके पास भेजा था।
प्रियतमका प्रेमरहस्य और उसके प्रेमकी गुह्यतम बातें जैसे उसकी
प्रियतमाके द्वारा ही उसकी विश्वस्त सखियोंको मिलती है, इसी
प्रकार भगवान्‌के प्रेमका रहस्य भी भगवत्प्रेमी भक्तोंके द्वारा ही
साधकको मिलता है और मिलता भी है उसीको, जिसको

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७८ प्रेम-दर्शन
भगवान् पात्र समझकर कृपा करके अपने प्रेमका भेद देना चाहते
हैं। क्योंकि प्रेमी भक्त प्रेमास्पद प्रियतम भगवान्‌की इच्छा या
आज्ञा बिना उनके प्रेमका रहस्य किसीके सामने नहीं खोल
सकते। पहले साधकको पात्र बनना होता है। जब भगवान्‌के
निर्मल अत्युच्च प्रेमकी एकान्त आकांक्षा उसके मनमें उत्पन्न हो
जाती है तब उसका हृदय भगवत्प्रेमके लिये रोने लगता है। उसके
हृदयका आर्तनाद अन्तर्यामी आनन्दमय प्रभु सुनते हैं और तब
कृपा करके वे अपने किसी प्रेमी भक्तको आदेश या संकेत करके
उसके समागममें भेज देते हैं। वहाँ पहले उसके प्रेमकी परीक्षा
होती है। यदि उसका प्रेम कामनाशून्य और अनन्य होता है और
वह अपने आचरण और व्यवहारसे उस प्रेमी भक्तके हृदयमें
पात्रताका विश्वास पैदा कर देता है, तब वे उसका सन्देश
भगवान्‌के पास पहुँचाते हैं और भगवान्‌की आज्ञा प्राप्त करके
क्रमशः प्रेमका रहस्य उसके सामने खोलते हैं और धीरे-धीरे,
ज्यों-ज्यों उसकी पात्रता बढ़ती है, त्यों-ही-त्यों भगवान्‌की
आज्ञासे वे उसे भगवान्‌के प्रेमराज्यमें उत्तरोत्तर आगे बढ़ाकर ले
जाते हैं और अन्तमें उसपर भगवान्‌की पूर्ण कृपा होनेसे वह
भगवत्प्रेमको प्राप्त कर लेता है। राजा या उसका प्रेमी तो
अन्तर्यामी न होनेसे किसीके धोखेमें भी आ सकता है, परन्तु
भगवान् और भगवान्‌की इच्छासे नियुक्त होनेवाले प्रेमी भक्त
कभी धोखा नहीं खाते। अतएव जिसको भगवत्प्रेमकी प्राप्तिकी
इच्छा हो, उसे देवर्षिके बतलाये हुए साधनोंमें तत्पर होकर पहले
पात्र बनना चाहिये, जिससे उसपर भगवान्‌की कृपा हो और वह
भगवत्प्रेमी पुरुषोंके संगका पात्र समझा जाय। साथ ही ऐसे
भगवत्प्रेमी पुरुषोंके संगकी इच्छा प्रबलरूपसे बढ़ानी चाहिये,
क्योंकि इनके संग बिना भगवत्प्रेमकी प्राप्ति महान् कठिन है।

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प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ७९
इसीसे भगवान् अपने निर्मल प्रेमके प्रचारार्थ ऐसे भक्तोंको,
मुक्तिके पूर्ण अधिकारी होनेपर भी, उनके मनमें प्रेमकी वासना
जागृत रखकर उन्हें सायुज्य मुक्ति नहीं देते, और इसीसे प्रेमी
भक्तगण इस प्रेम-लीला-सुखको छोड़कर मुक्तिकी कभी चाह
नहीं करते। वे मुक्त होकर भी केवल प्रेमवितरणके लिये ही
संसारमें आया करते हैं या निवास करते हैं। वे अहैतुक कृपालु
होते हैं। हमारी तीव्र इच्छा पावेंगे तो भगवत्कृपासे भगवान्‌का
संकेत प्राप्तकर अपने पुण्यमय दर्शन-स्पर्श-भाषण और अपनी
महती कृपासे हमें अवश्य प्रेमदान करेंगे। क्योंकि वे तो प्रेमी
जनोंकी खोजमें ही रहते हैं। उनका काम ही प्रेमदान करना है।
अतएव उन्हीं भगवत्संगी प्रेमी महानुभावोंका संग प्राप्त करो,
उन्हींकी कृपाकी इच्छा करो।
ם ם

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प्रेमरूपा भक्तिमें प्रधान बाधा
कुसंगति है
दुःसंगः सर्वथैव त्याज्यः ॥ ४३ ॥
४३-दुःसंगका सर्वथा ही त्याग करना चाहिये।
सत्संगका महत्त्व बतलाकर अब देवर्षि दुःसंगका निषेध करते
हैं। जिस प्रकार सत्संगसे भगवत्कथा, भगवच्चर्चा, भगवन्नाम,
भगवत्प्रीति, सदाचार, शास्त्र, विवेक, वैराग्य, सत्-अभ्यास, सेवा,
सरलता, नम्रता, क्षमा, तितिक्षा, शौच, दया, अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य,
निरभिमानता और शान्ति आदिके प्रति प्रवृत्ति होती है और मनुष्य
सदाचारपरायण परमभक्त बन सकता है; इसी प्रकार इसके विपरीत
दुःसंगसे विषयवार्ता, जगच्चर्चा, लोकनिन्दा, भोगप्रीति, दुराचार,
उच्छृंखलता, अविवेक, विषयलोलुपता, दुष्ट अभ्यास, मान, दम्भ,
घमंड, क्रोध, असहिष्णुता, अपवित्रता, निर्दयता, हिंसा, असत्य,
इन्द्रियलम्पटता, अभिमान और अशान्ति आदिके प्रति प्रवृत्त होकर
मनुष्य पापपरायण और अत्यन्त विषयासक्त हो जाता है। दुःसंगसे
आसुरी सम्पत्तिके सभी दुर्गुण और दुराचारोंका विकास और विस्तार
होता है। दुःसंगसे मनुष्यके समस्त सद्गुणोंका विनाश होकर उसका
सर्वनाश हो जाता है। परम सुशीला, स्नेहमयी, प्रेमप्रतिमा देवी
कैकेयी मन्थराकी कुसंगतिके कारण ही महाराज दशरथके, भरतके,
अपने और तमाम अयोध्यावासियोंके परम शोकका कारण बनी थीं
और इसीसे उन्हें अन्तमें दुःखप्रद वैधव्यका सहन करना और प्राणप्रिय
भरतका अप्रीतिभाजन होकर रहना पड़ा था। शकुनिकी कुसंगति ही
महाभारतके भयानक संहारमें एक प्रधान कारण हुई। श्रीमद्भागवतमें
भगवान् कपिलदेव माता देवहूतिजीसे कहते हैं—

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प्रेमरूपा भक्तिमें प्रधान बाधा कुसंगति है ८१
यद्यसद्भिः पथि पुनः शिश्नोदरकृतोद्यमैः।
आस्थितो रमते जन्तुस्तमो विशति पूर्ववत्॥
सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिः श्रीर्ह्रीर्यशः क्षमा।
शमो दमो भगश्चेति यत्संगाद्याति संक्षयम्॥
तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु।
संगं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च॥
(३।३१।३२-३४)
‘जो मनुष्य शिश्नोदरपरायण (स्त्री और धनमें ही आसक्त)
नीच पुरुषोंका संग करके उनके अनुसार बर्ताव करने लगता है
वह उन्हींकी भाँति अन्धकारमय नरकोंमें जाता है। क्योंकि
दुष्टसंगसे सत्य, पवित्रता, दया, मननशीलता, बुद्धि, लज्जा, श्री,
कीर्ति, क्षमा, मनका वशमें रहना, इन्द्रियोंका वशमें रहना और
ऐश्वर्य आदि सब गुण नष्ट हो जाते हैं। अतएव उन अशान्तचित्त,
मूर्ख, नष्टबुद्धि, स्त्रियोंके हाथके खिलौने बने हुए, शोचनीय,
असाधु दुष्ट मनुष्योंका संग कभी नहीं करना चाहिये।’
अतएव दुःसंगका त्याग तो सभीके लिये आवश्यक है, पर
भगवत्प्रेमकी इच्छा करनेवालोंको तो दुःसंगका त्याग बड़ी ही
सावधानीसे करना चाहिये। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे
कहा है—
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
‘हे विभीषण! नरकमें रहना अच्छा है, परन्तु विधाता कभी
दुष्टका संग न दे।’ दुष्ट-संगसे केवल दुराचारी मनुष्योंका ही संग
नहीं समझना चाहिये। इन्द्रियोंका कोई भी विषय, जो हमारे मनमें
असत् विचार तथा विषयोंकी लालसा उत्पन्न करे और
भगवत्प्राप्तिके मार्गसे हमारे चित्तको चलायमान कर दे, दुःसंग
हो सकता है। हमें न कोई ऐसी चेतन वस्तु या जड दृश्य देखना

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८२ प्रेम-दर्शन

चाहिये, न ऐसी बात सुननी चाहिये, न ऐसी चर्चा करनी चाहिये,
न वैसे स्थानमें जाना चाहिये, न वैसी पुस्तक या पत्रिका पढ़नी
चाहिये, न वैसा चित्र देखना चाहिये, न वैसी वस्तु खानी, सूँघनी
या स्पर्श करनी चाहिये और न वैसा विचार ही करना चाहिये,
जिससे हमारे चित्तमें विषयचिन्तनकी प्रबलता हो जाय। याद
रखना चाहिये कि मनुष्यमें अच्छे और बुरे भावोंकी उत्पत्ति और
वृद्धिमें कम-से-कम ये दस बातें प्रधान कारण होती हैं—स्थान,
अन्न, जल, परिवार, अड़ोस-पड़ोस, दृश्य, साहित्य, आलोचना,
आजीविकाका कार्य और उपासना। यदि ये सब सात्त्विक होते
हैं तो इनके सेवनसे सात्त्विकता बढ़ती है। इन्हींका सेवन सत्संग
है और यदि ये राजस या तामस हैं तो इनका सेवन दुःसंग है
और उससे अज्ञानकी वृद्धि होकर तमाम दोषोंका विकास हो
जाता है। अतएव दुःसंगका सब प्रकारसे सर्वथा त्याग करना
चाहिये।
कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशसर्वनाशकारणत्वात् ॥ ४४॥
४४-क्योंकि वह (दुःसंग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश,
बुद्धिनाश एवं सर्वनाशका कारण है।
भगवत्सम्बन्धी तत्त्व-रहस्य तथा लीला-कथाओंको छोड़कर
इन्द्रियोंको भोगके समय तृप्ति देनेवाले लौकिक विषयोंका
चिन्तन ही सर्वनाशकी जड़ है। चित्त निरन्तर या अधिक
समयतक जिस विषयका चिन्तन करता है, उसीमें उसकी
आसक्ति होती है। दुःसंगसे—सांसारिक विषयों और विषयी
पुरुषोंके शरीर, वाणी और मनद्वारा किये हुए संगसे स्वाभाविक
ही विषयासक्ति बढ़ती है। आसक्तिसे कामना होती है, यह
कामना ही समस्त पापोंका मूल है; कामनाकी तृप्तिसे अधिक
प्राप्तिके लिये लोभ उत्पन्न होता है और अतृप्तिसे वही कामना

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प्रेमरूपा भक्तिमें प्रधान बाधा कुसंगति है ८३
क्रोधके रूपमें परिणत हो जाती है। इसीलिये श्रीमद्भगवद्गीतामें
भगवान् श्रीकृष्णने राग या आसक्तिरूपी रजोगुणसे उत्पन्न
कामको ही पापोंके होनेमें प्रधान कारण बतलाया है। अर्जुनने
पूछा कि 'भगवान् ! मनुष्य न चाहता हुआ भी जबरदस्ती पकड़ा-
सा जाकर किसकी प्रेरणासे पाप करता है?' इसके उत्तरमें
भगवान् स्पष्ट कहते हैं—
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ३।३७)
'रजोगुणसे उत्पन्न यह काम ही क्रोध है, इस महापापी
कामका पेट कभी नहीं भरता; इस विषयमें तुम इस कामको ही
(पाप करानेवाला) अपना शत्रु मानो।' यद्यपि कामसे लोभ और
क्रोध दोनों ही उत्पन्न होते हैं परन्तु संसारमें मनमानी थोड़ी ही
कामनाओंकी पूर्ति होती है; अधिकांशमें तो विफलता ही प्राप्त
होती है। विफलतामें क्रोध उत्पन्न होता है; क्रोधकी उत्पत्ति हो
जानेपर मनुष्य विवेक-विचारशून्य हो जाता है। उसे हिताहित
कुछ भी नहीं सूझता, वह पिशाचकी भाँति केवल विनाशका ही
प्रयत्न करता है। इस मोहमें उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है, और
स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धि मारी जाती है। बुद्धिके नष्ट होनेपर वह
इस लोक और परलोकके कल्याणपथसे गिर जाता है—उसका
सर्वनाश हो जाता है। ठीक यही बात श्रीभगवान्‌ने भी गीताके
अध्याय २, श्लोक ६२-६३ में कही है—
ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

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८४ प्रेम-दर्शन
'विषयोंके चिन्तनसे मनुष्यकी विषयोंमें आसक्ति होती है,
आसक्तिसे कामना उत्पन्न होती है, (कामकी तृप्तिमें बाधा
होनेसे) उस कामसे ही क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोधसे सम्मोह
होता है, सम्मोहसे स्मृतिभ्रंश, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे
(पुरुषका) सर्वनाश हो जाता है।'
सर्वनाशके कारणभूत विषयोंका चिन्तन होनेमें विषय और विषयी
पुरुषोंका संग ही प्रधान है, यही दुःसंग है; अतएव इसका सर्वथा
त्याग करना चाहिये।
तरंगायिता अपीमे संगात्समुद्रायन्ति ॥ ४५ ॥
४५-ये (काम-क्रोधादि) पहले तरंगकी तरह (क्षुद्र
आकारमें) आकर भी (दुःसंगसे विशाल) समुद्रका आकार
धारण कर लेते हैं।
जबतक दोषोंका समूल विनाश न हो जाय, तबतक तनिक-से
दोषसे डरते ही रहना चाहिये; जैसे ईंधनमें दबी हुई जरा-सी चिनगारी
हवाके जोरसे विशाल अग्निका रूप धारण कर लेती है, इसी प्रकार
दबा हुआ जरा-सा भी दोष कुसंग पाते ही पनपकर विशाल रूप
धारण कर लेता है। पहले-पहल जब मनमें काम-क्रोधका विकार
उत्पन्न होता है तो उसकी एक लहर-सी ही आती है, परन्तु कुसंग
पाते ही वह लहर समुद्र बन जाती है; फिर चारों ओरसे सारे हृदयपर
उसीका अधिकार हो जाता है, सद्विचारके प्रवेशकी भी गुंजाइश नहीं
रह जाती; उससे सर्वनाश ही होता है। अतएव यह नहीं समझना
चाहिये कि हमारे अन्दर सद्गुण अधिक हैं और दोष कम हैं, इससे
कुसंगसे हमारी क्या हानि होगी! वरं सदा-सर्वदा अत्यन्त सावधानीके
साथ सब प्रकारसे कुसंगका त्याग ही करना चाहिये।
□ □

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मायासे कौन तरता है ?
कस्तरति कस्तरति मायाम्, यः संगांस्त्यजति यो
महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति ॥ ४६ ॥
४६-( प्रश्न ) कौन तरता है? ( दुस्तर ) मायासे कौन
तरता है? ( उत्तर ) जो सब संगोंका परित्याग करता है, जो
महानुभावोंकी सेवा करता है और जो ममतारहित होता है।
नदीमें तैरनेवाले मनुष्यके लिये सबसे अधिक आवश्यक
काम होता है हाथों और पैरोंसे नदीके जलको फेंकते जाना,
निरन्तर जलको काटते रहना; तभी नया तैराक नदीके पार जा
सकता है। जलको फेंकना छोड़ दे तो तत्काल डूब जाय। इसी
प्रकार इस महाभयावनी दुस्तर मायानदीको तैरकर जो उस पार
जाना चाहते हैं, उन्हें अहंकार और विषयासक्तिरूपी जलको
बराबर अलग फेंकते रहना चाहिये। अहंकार और आसक्तिरूपी
जलसे ही यह मायानदी भरी है; जो अहंकार और आसक्तिको
दूर नहीं फेंक सकता, इनका त्याग नहीं करना चाहता, वह इस
मायानदीके जलमें रमकर अतलतलमें डूब जायगा। इसलिये
संगत्याग अवश्य करना चाहिये; परन्तु हाथ-पैर मारते-मारते
भी उनके थक जानेकी अथवा श्वास टूट जानेकी सम्भावना
है, अतएव बीच-बीचमें ऐसा अवलम्बन चाहिये जहाँ कुछ देर
ठहरकर वह विश्राम ले सके। इस मायानदीमें भी केवल
संगत्यागसे काम नहीं चलता, इसमें भी विश्रामस्थल चाहिये। वे
विश्रामस्थल सन्तोंके सुधामय वचन ही हैं, जिनके सहारेसे नवीन
बल प्राप्त होता है और उस बलसे मनुष्य मायासमुद्रके पार पहुँच
जा सकता है। वस्तुतः सन्तसेवी साधकको अपने बलसे तैरना
पड़ता ही नहीं, वह तो सन्त महानुभावोंकी कृपारूपी सुदृढ़

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८६ प्रेम-दर्शन
जहाजपर सवार होकर अनायास ही तर जाता है। इसीलिये देवर्षि
महानुभावोंकी सेवा करनेको कहते हैं।
श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं—
निमज्ज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम्।
सन्तो ब्रह्मविदः शान्ता नौर्दृढेवाप्सु मज्जताम्॥
(११।२६।३२)
‘जलमें डूबते हुए लोगोंके लिये दृढ़ नौकाके समान इस
भयंकर संसार-सागरमें गोते खानेवालोंके लिये ब्रह्मवेत्ता शान्तचित्त
सन्तजन ही परम अवलम्बन हैं।’
महानुभाव सन्तोंकी सेवासे पाप-ताप और मोह अनायास ही
दूर हो जाते हैं।
यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम्।
शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस्तथा॥
(११।२६।३१)
‘जिस प्रकार भगवान् अग्निदेवका आश्रय लेनेपर शीत, भय
और अन्धकार तीनोंका नाश हो जाता है, इसी प्रकार सन्त
पुरुषोंके सेवनसे पापरूपी शीत, जन्म-मृत्युरूपी भय और
अज्ञानरूपी अन्धकार—ये कोई भी नहीं रहते।’
निर्मल हरिभक्तिकी प्राप्तिके लिये तो महापुरुषोंकी चरणसेवा
ही प्रधान है। श्रीमद्भागवतमें भक्तराज प्रह्लाद और ज्ञानिप्रवर
अवधूतशिरोमणि जडभरतके वचन हैं—
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः।
महीयसां पादरजोऽभिषेकं
निष्किंचनानां न वृणीत यावत्॥
(७।५।३२)

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मायासे कौन तरता है ? ८७
रहूगणैतत्तपसा न याति
न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा।
नच्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै-
र्विना महत्पादरजोऽभिषेकम्॥
(५।१२।१२)
प्रह्लाद कहते हैं कि 'हे पिता! जिन भगवान् श्रीहरिके
चरणोंका स्पर्श समस्त अनर्थोंकी निवृत्ति करनेवाला है, उन
श्रीहरिचरणोंमें तबतक प्रेम नहीं होता जबतक अकिंचन (सब
कुछ भगवान्‌को अर्पण कर चुकनेवाले) साधु महान् पुरुषोंकी
चरणधूलिसे मस्तकका अभिषेक न किया जाय।'
महात्मा जडभरत राजा रहूगणसे कहते हैं—
'हे रहूगण! यह भगवत्तत्त्वका ज्ञान और भगवत्प्रेम तप, यज्ञ,
दान, गृहस्थाश्रमद्वारा परोपकार, वेदाध्ययन और जल, अग्नि एवं
सूर्यकी उपासनासे नहीं मिलता। यह तो महापुरुषोंके चरणोंकी
धूलिमें स्नान करनेसे अर्थात् उनकी चरणसेवासे ही मिलता है।'
परन्तु इतना स्मरण रहे कि महापुरुषोंकी सेवाका अर्थ केवल
उनके समीप रहना या उनके शरीरकी सेवा करना ही नहीं है।
उसकी भी यथायोग्य आवश्यकता और सार्थकता है; परन्तु
जबतक हम उनके आज्ञानुसार क्रिया नहीं करते, उनके इशारेपर
नहीं चलते एवं उनकी रुचिके अनुसार अपना जीवन निर्माण नहीं
करते तबतक सेवामें त्रुटि ही समझनी चाहिये। अतएव इस
बातको समझकर सर्वदा और सर्वथा महानुभावोंकी सेवा करनी
चाहिये।
परन्तु इसमें ममता एक बड़ी बाधा है। ममताके बन्धनसे
सन्तसेवा ही नहीं हो सकती। घर मेरा, शरीर मेरा, परिवार मेरा,
धन मेरा, सम्बन्धी मेरे, मकान मेरा, जमीन मेरी—इस प्रकार

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८८ प्रेम-दर्शन
मेरे-मेरेके अनगिनत बन्धनोंमें जीव बँधा है, इन ममताके
बन्धनोंको तोड़ना होगा। अवश्य ही सत्संग और सन्तोंकी
सेवारूपी दिव्य मणिदीपकके प्रकाशसे ममतारूपी अन्धकारमयी
रात्रिका अन्धकार बहुत कम हो जाता है, तथापि पहले सन्तसंगमें
जानेके लिये भी तो ममताको कम करनेकी आवश्यकता है।
अतएव संसारके इन ममत्वके विषयोंको दुःखरूप, अनित्य और
अज्ञानमूलक समझकर इनके प्रति मेरे भावको सर्वथा त्याग
करना चाहिये। यह समझना चाहिये कि संसारमें मेरा कुछ भी
नहीं है। जिस शरीरको मनुष्य मेरा ही नहीं वरं 'मैं' कहता है
वह भी नष्ट हो जाता है, तब फिर अन्य वस्तुओंमें मेरापन
समझना तो मूर्खता ही है। मायासे तरनेके लिये इस मेरेपनका
नाश जरूर करना चाहिये। जो ऐसा करता है वह मायासे तर
जाता है।
यो विविक्तस्थानं सेवते, यो लोकबन्धमुन्मूलयति, निस्त्रैगुण्यो
भवति, योगक्षेमं त्यजति ॥ ४७ ॥
४७-जो निर्जन स्थानमें निवास करता है, जो लौकिक
बन्धनोंको तोड़ डालता है, जो तीनों गुणोंसे परे हो जाता है
और जो योग तथा क्षेमका परित्याग कर देता है।
मायासे तरनेके लिये पूर्वसूत्रमें तीन उपाय बतलाये गये हैं,
अब इस सूत्रमें चार उपाय बतलाये जाते हैं और अगले दो सूत्रोंमें
क्रमशः पाँच उपाय या लक्षण और बतलायेंगे।
ममताका त्याग दिन-रात ममत्वकी वस्तुओंके बीचमें रहनेसे
नहीं होता; संगसे तो ममता उलटी बढ़ती है; अतएव साधकको
एकान्त-सेवन करना चाहिये। श्रीभगवान्‌ने भी गीतामें—
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥
(१३।१०)

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मायासे कौन तरता है ? ८९

—'एकान्त स्थानमें रहने और मनुष्योंकी भीड़-भाड़में प्रीति
न रखनेकी आज्ञा दी है।' मनुष्य कितना भी साधन करनेकी
चेष्टा करे, परन्तु जबतक वह विषय-वासनासे जकड़े हुए
जनसमुदायमें और मोहक विषयोंसे भरे हुए स्थानोंमें रहेगा
तबतक भगवान्‌में उसका मन लगना बहुत कठिन है; इसीलिये
साधकको एकान्त देशमें रहकर भक्तिका साधन करना बतलाया
गया है। साथ ही भगवान्‌के साथ प्रेमका बन्धन बाँधनेके लिये
लोकबन्धनको तोड़ना आवश्यक है। एकान्त देशसेवनसे लोकसंग
छूट जानेके कारण लोकबन्धन स्वयमेव ही ढीला हो जायगा।
इसके अतिरिक्त भगवान्‌के रहस्य, प्रभाव और तत्त्वके साथ
मृत्युमय और दुःखालय इस लोककी तुलना करके बारम्बार
विचार करनेपर लोकबन्धन आप ही टूट जाता है।
इसके बाद भक्तिके साधकको सत्त्व, रज और तम—इन तीनों
गुणोंसे परे होना पड़ेगा। संसारका प्रकाश इन गुणोंसे ही होता है।
गुणोंका ही कार्य यह संसार है, अतएव इस संसारके पदार्थोंमें अनासक्ति
या विरक्ति होना ही निस्त्रैगुण्य या असंसारी होना है। जो मनुष्य
विषयासक्त और विषयकामी है, वही गुणबद्ध है और जो भगवदासक्त
और भगवत्प्रेमी है वही निस्त्रैगुण्य है। जो निस्त्रैगुण्य होगा वह
योगक्षेमकी चिन्ता क्यों करने लगा ? संसारमें तो उसका कोई प्रलोभन
ही नहीं है, क्योंकि वह निस्त्रैगुण्य है और मोक्षकी सिद्धिसे भी वह
निःस्पृह है; क्योंकि वह भगवान्‌का प्रेमी है। अप्राप्तकी प्राप्तिको
'योग' और प्राप्तके संरक्षणको 'क्षेम' कहते हैं। इसमें केवल
भोजनाच्छादनका भाव ही नहीं है; पारमार्थिक अर्थमें तो योगका
अर्थ है भगवत्-प्राप्ति या भगवत्-प्राप्तिका सफल साधन, और
क्षेमका अर्थ है भगवत्-प्राप्तिके साधनका संरक्षण। प्रेमी भगवद्भक्त
इन दोनों ही अर्थोंमें योगक्षेमकी परवा नहीं करता, वह तो भगवत्-

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९० प्रेम-दर्शन
प्रेममें ही मस्त रहकर भगवत्-प्रेरणासे सदा-सर्वदा भगवदनुकूल
स्वाभाविक कर्म करता रहता है। भक्तका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही
चलाते हैं। श्रीभगवान्‌ने गीतामें स्वयं कहा है—
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
(९।२२)
‘जो अनन्य भक्त निरन्तर मेरा चिन्तन करते हुए मेरी निष्काम
उपासना करते हैं उन नित्य मुझमें लगे रहनेवाले भक्तोंका योगक्षेम मैं
स्वयं वहन करता हूँ।’*
भोजनादिकी चिन्ता तो साधारण विश्वासी भक्तको भी नहीं
करनी चाहिये; जो भोजनादिके लिये भगवान्‌का भरोसा न रखकर
न्याय और सत्यमार्गका तथा सदाचारका त्यागकर पापकी शरण लेते
हैं वे तो एक प्रकारसे नास्तिक ही हैं। कहा है—

  • श्रीजगन्नाथपुरीमें एक सरल हृदयके सदाचारी ब्राह्मण सपरिवार रहते थे। उनको
    गीतासे बड़ा प्रेम था, वह दिन-रात गीताका अध्ययन और मनन किया करते थे। अवश्य
    ही उनका सकाम भाव अभी दूर नहीं हुआ था, परन्तु थे वे बड़े विश्वासी। एक दिन
    वे गीताके प्रत्येक शब्दका क्रियात्मक अर्थ देखना चाहते थे। पाठ करते समय जब
    उपर्युक्त श्लोकका ‘वहाम्यहम्’ शब्द आया, तब ब्राह्मण सोचने लगे कि क्या भगवान्
    अपने भक्तके लिये आवश्यक वस्तुएँ स्वयं ढोकर उसके घर पहुँचा आते हैं; नहीं, नहीं!
    ऐसा नहीं हो सकता, भगवान् किसी दूसरे साधनसे संग्रह करा देते होंगे। यह विचारकर
    ब्राह्मणने ‘वहाम्यहम्’ का अर्थ ठीक न बैठते देख गीताके उक्त पदको काटकर उसकी
    जगह ऊपर ‘करोम्यहम्’ लिख दिया। ब्राह्मण भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते थे।
    भगवान्‌की अपार माया है; एक दिन मूसलाधार वृष्टि होने लगी। ब्राह्मणदेवता उस दिन
    घरसे न निकल सकनेके कारण दिनभर सपरिवार भूखे ही रहे। दूसरे दिन वर्षा बन्द
    होनेपर ब्राह्मण भीखके लिये चले। उनके घरसे जानेके थोड़ी ही देर बाद एक खूनसे
    लथपथ अत्यन्त ही सुन्दर बालक ब्राह्मणके घरपर आकर ब्राह्मणीसे बोला—
    ‘पण्डितजी महाराजने यह प्रसाद भेजा है।’ ब्राह्मणी बालकके मनोहर बदनको देखकर
    और उसके मीठे वचन सुनकर मुग्ध हो गयी, परन्तु उसके शरीरसे खून बहता देखकर
    उसे बहुत ही दुःख हुआ। उसने आँसूभरे नेत्रोंसे पूछा—‘तुमको किस निठुरने मारा है?’
    बालकने ब्राह्मणीके पतिका नाम लेकर कहा कि ‘मुझको ब्राह्मणदेवताने मारा है।’
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मायासे कौन तरता है ? ९१
भोजनाच्छादने चिन्तां वृथा कुर्वन्ति वैष्णवाः।
योऽसौ विश्वम्भरो देवः स किं दासानुपेक्षते ॥
'वैष्णव आहारादिके लिये व्यर्थ ही चिन्ता करते हैं। जो
भगवान् समस्त विश्वके सब जीवोंका भरण-पोषण करते हैं वे
क्या अपने सेवकोंको कभी भूल सकते हैं?
यः कर्मफलं त्यजति, कर्माणि संन्यस्यति ततो निर्द्वन्द्वो
भवति ॥ ४८ ॥
४८-जो कर्मफलका त्याग करता है, कर्मोंका भी त्याग
करता है और तब सब कुछ त्यागकर जो निर्द्वन्द्व हो जाता है।
योगक्षेमकी चिन्ताका त्याग करनेवाला कर्मफलका त्यागी
होता ही है, अथवा योगक्षेमके त्यागके लिये भी कर्मफलके
त्यागकी आवश्यकता होती है। वस्तुतः अब यहाँसे प्रेमी भक्तके
लक्षणोंका आरम्भ हो गया है। ये भक्तिके साधकोंके लिये आदर्श
साधन हैं और सिद्ध प्रेमी भक्तोंके स्वाभाविक गुण ! भक्त जो कुछ
ब्राह्मणी तो अचरजमें डूब गयी; कहने लगी—'वह तो बड़े सीधे-सादे, अक्रोधी और
परम भागवत हैं; तुम-सरीखे नयनमनलुभावन बालकको वह क्यों मारने लगे ?'
बालकने कहा—'मैं सच कहता हूँ माँ! उन्होंने ही एक शूलसे मेरे बदनको काट डाला
है, उन्होंने क्यों ऐसा किया, इस बातको तो वही जानें।'
इतना कहकर और प्रसाद रखकर बालक वहाँसे चल दिया; ब्राह्मणीको
अन्यमनस्क होनेके कारण उसको जानेका पता नहीं लगा। वह कुछ भी न समझकर
अति दुःखित चित्तसे स्वामीके घर आनेकी बाट देखने लगी। समयपर ब्राह्मण घर आये।
ब्राह्मणीने विनयके साथ, किन्तु रोष और विषादभरे शब्दोंमें सारा वृत्तान्त ब्राह्मणको कह
सुनाया। पण्डितजी गृहिणीकी बात सुनकर अवाक् हो गये। गीताके श्लोकपर हरतालकी
कलम फेरनेकी घटनाको स्मरणकर वह व्याकुल हो उठे। उनकी आँखोंसे आँसुओंकी
धारा बहने लगी। ब्राह्मण अब समझे कि सचमुच ही भगवान् अपने विश्वासी भक्तके
लिये स्वयं सिरपर ढोकर आहारादि पहुँचाते हैं। गीता श्रीभगवान्‌का अंग है। गीताका
श्लोक काटनेसे भगवान्‌के शरीरपर चोट लगी है। ब्राह्मण अपनी करनीपर पश्चात्ताप
करते-करते मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। भगवान्‌ने उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया।
कुछ समय बाद उठकर वे भगवान्‌से क्षमा-प्रार्थना करने लगे और भावविह्वल होकर
गीताके चारों ओर 'वहाम्यहम्' 'वहाम्यहम्' लिखने लगे !

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९२ प्रेम-दर्शन
करता है वह भगवान्के लिये ही करता है, उसे उसका अपने
लिये कुछ भी फल नहीं चाहिये। उसकी न कर्ममें आसक्ति है
और न उसके फलमें; वह तो यन्त्रवत् कर्म करता रहता है। परन्तु
जहाँतक उसे यह स्मरण रहता है कि मैं यन्त्र हूँ, भगवान्के लिये
कर्म करता हूँ, वहाँतक वह कर्मफलका ही त्यागी कहा जा
सकता है; कर्मका त्यागी तो तब होगा जब उसे यह भी पता नहीं
रहेगा कि मैं भी कुछ करता हूँ। जब मन-बुद्धिके पूर्ण समर्पणसे
भगवान् उसके अहंकारको सर्वथा हरण करके स्वयं ही उसके
हृदयमन्दिरमें बैठकर कर्म करने-कराने लगेंगे, तब वह कर्मोंका
सम्पूर्ण त्यागी होकर सर्वथा निर्द्वन्द्व हो जायगा। फिर उसे सुख-
दुःख, हानि-लाभ, अपना-पराया, मैं-तू आदि द्वन्द्वोंसे कोई
प्रयोजन ही नहीं रह जायगा। परन्तु जबतक ऐसी स्वाभाविक
स्थिति न हो तबतक साधनरूपसे कर्मफलत्याग और भगवत्-
विरोधी अथवा अनावश्यक कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके निर्द्वन्द्व
होनेकी चेष्टा करनी चाहिये। श्रीभगवान् कहते हैं—
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥
(गीता २।४५)
'हे अर्जुन! वेद तीनों गुणोंके प्रकाशरूप संसारको प्रकाश
करनेवाले हैं; अतएव निस्त्रैगुण्य अथवा असंसारी (निष्कामी),
सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित, योगक्षेमकी इच्छा न करनेवाला,
नित्य सत्त्वमें स्थित और परमात्मपरायण हो जाओ।'
वेदानपि संन्यस्यति, केवलमविच्छिन्नानुरागं
लभते॥ ४९॥

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मायासे कौन तरता है ? ९३
४९-जो वेदोंका भी भलीभाँति परित्याग कर देता है और
जो अखण्ड असीम भगवत्प्रेम प्राप्त कर लेता है।
साधनकी दृष्टिसे उपर्युक्त श्रीमद्भगवद्गीताके श्लोक
(२।४५)-के अनुसार तीनों गुणोंके प्रकाशरूप संसारको प्रकट
करनेवाले वेदोंके त्यागसे निष्कामी बननेका अर्थ बहुत ही
ठीक है। सकाम भावका त्याग ही वेदत्याग है। परन्तु देवर्षि
नारद यहाँ जिस प्रेमावस्थाका वर्णन कर रहे हैं, उस अवस्थामें
तो भक्त केवल एक अविच्छिन्न अखण्ड भगवत्प्रेमके महान्
सागरमें डूबकर तन्मय हो जाता है; इससे वेदोंका आश्रय
स्वयमेव ही छूट जाता है, उससे फिर लौकिक-वैदिक कोई-
सी भी क्रिया यथाविधि नहीं हो सकती। सारे नियमोंका
अपने-आप टूट जाना ही इस प्रेमका एक नियम है। यह भी
शास्त्रविधि ही है। इस स्थितिमें वेद अपने अनुयायीको वेदोंका
परमफल प्राप्त करते देखकर, उसकी चरम तृप्तिपर स्वयं
तृप्त होकर उसे छोड़ देते हैं। यह वेदत्याग तिरस्कारमूलक
नहीं है, वरं तृप्तिमूलक है। वह जान-बूझकर वेदोंको नहीं
छोड़ता, वेद ही उसे पूर्णकाम समझकर अपना आधिपत्य
उसपरसे उठा लेते हैं। इस अवस्थामें वह प्रेमी भक्त विधि-
निषेधमय वेदोंको लाँघकर बस, केवल एक अनिर्वचनीय
हरिप्रेममें ही मतवाला रहता है; वह भगवत्प्रेमकी एक जीती-
जागती मूर्ति होता है। स्वयं भगवान् ही उसके शरीरमें दिव्य
प्रेमके रूपमें प्रकट होकर लीला करते हैं।
स तरति स तरति स लोकांस्तारयति ॥५०॥
५०-वह तरता है, वह तरता है, वह लोकोंको तार देता है।