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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

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मायासे कौन तरता है ?
कस्तरति कस्तरति मायाम्, यः संगांस्त्यजति यो
महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति ॥ ४६ ॥
४६-( प्रश्न ) कौन तरता है? ( दुस्तर ) मायासे कौन
तरता है? ( उत्तर ) जो सब संगोंका परित्याग करता है, जो
महानुभावोंकी सेवा करता है और जो ममतारहित होता है।
नदीमें तैरनेवाले मनुष्यके लिये सबसे अधिक आवश्यक
काम होता है हाथों और पैरोंसे नदीके जलको फेंकते जाना,
निरन्तर जलको काटते रहना; तभी नया तैराक नदीके पार जा
सकता है। जलको फेंकना छोड़ दे तो तत्काल डूब जाय। इसी
प्रकार इस महाभयावनी दुस्तर मायानदीको तैरकर जो उस पार
जाना चाहते हैं, उन्हें अहंकार और विषयासक्तिरूपी जलको
बराबर अलग फेंकते रहना चाहिये। अहंकार और आसक्तिरूपी
जलसे ही यह मायानदी भरी है; जो अहंकार और आसक्तिको
दूर नहीं फेंक सकता, इनका त्याग नहीं करना चाहता, वह इस
मायानदीके जलमें रमकर अतलतलमें डूब जायगा। इसलिये
संगत्याग अवश्य करना चाहिये; परन्तु हाथ-पैर मारते-मारते
भी उनके थक जानेकी अथवा श्वास टूट जानेकी सम्भावना
है, अतएव बीच-बीचमें ऐसा अवलम्बन चाहिये जहाँ कुछ देर
ठहरकर वह विश्राम ले सके। इस मायानदीमें भी केवल
संगत्यागसे काम नहीं चलता, इसमें भी विश्रामस्थल चाहिये। वे
विश्रामस्थल सन्तोंके सुधामय वचन ही हैं, जिनके सहारेसे नवीन
बल प्राप्त होता है और उस बलसे मनुष्य मायासमुद्रके पार पहुँच
जा सकता है। वस्तुतः सन्तसेवी साधकको अपने बलसे तैरना
पड़ता ही नहीं, वह तो सन्त महानुभावोंकी कृपारूपी सुदृढ़