प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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जहाजपर सवार होकर अनायास ही तर जाता है। इसीलिये देवर्षि
महानुभावोंकी सेवा करनेको कहते हैं।
श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं—
निमज्ज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम्।
सन्तो ब्रह्मविदः शान्ता नौर्दृढेवाप्सु मज्जताम्॥
(११।२६।३२)
‘जलमें डूबते हुए लोगोंके लिये दृढ़ नौकाके समान इस
भयंकर संसार-सागरमें गोते खानेवालोंके लिये ब्रह्मवेत्ता शान्तचित्त
सन्तजन ही परम अवलम्बन हैं।’
महानुभाव सन्तोंकी सेवासे पाप-ताप और मोह अनायास ही
दूर हो जाते हैं।
यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम्।
शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस्तथा॥
(११।२६।३१)
‘जिस प्रकार भगवान् अग्निदेवका आश्रय लेनेपर शीत, भय
और अन्धकार तीनोंका नाश हो जाता है, इसी प्रकार सन्त
पुरुषोंके सेवनसे पापरूपी शीत, जन्म-मृत्युरूपी भय और
अज्ञानरूपी अन्धकार—ये कोई भी नहीं रहते।’
निर्मल हरिभक्तिकी प्राप्तिके लिये तो महापुरुषोंकी चरणसेवा
ही प्रधान है। श्रीमद्भागवतमें भक्तराज प्रह्लाद और ज्ञानिप्रवर
अवधूतशिरोमणि जडभरतके वचन हैं—
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः।
महीयसां पादरजोऽभिषेकं
निष्किंचनानां न वृणीत यावत्॥
(७।५।३२)