प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
Page 83 of 178
Read in contextप्रेमरूपा भक्तिमें प्रधान बाधा कुसंगति है ८१
यद्यसद्भिः पथि पुनः शिश्नोदरकृतोद्यमैः।
आस्थितो रमते जन्तुस्तमो विशति पूर्ववत्॥
सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिः श्रीर्ह्रीर्यशः क्षमा।
शमो दमो भगश्चेति यत्संगाद्याति संक्षयम्॥
तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु।
संगं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च॥
(३।३१।३२-३४)
‘जो मनुष्य शिश्नोदरपरायण (स्त्री और धनमें ही आसक्त)
नीच पुरुषोंका संग करके उनके अनुसार बर्ताव करने लगता है
वह उन्हींकी भाँति अन्धकारमय नरकोंमें जाता है। क्योंकि
दुष्टसंगसे सत्य, पवित्रता, दया, मननशीलता, बुद्धि, लज्जा, श्री,
कीर्ति, क्षमा, मनका वशमें रहना, इन्द्रियोंका वशमें रहना और
ऐश्वर्य आदि सब गुण नष्ट हो जाते हैं। अतएव उन अशान्तचित्त,
मूर्ख, नष्टबुद्धि, स्त्रियोंके हाथके खिलौने बने हुए, शोचनीय,
असाधु दुष्ट मनुष्योंका संग कभी नहीं करना चाहिये।’
अतएव दुःसंगका त्याग तो सभीके लिये आवश्यक है, पर
भगवत्प्रेमकी इच्छा करनेवालोंको तो दुःसंगका त्याग बड़ी ही
सावधानीसे करना चाहिये। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे
कहा है—
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
‘हे विभीषण! नरकमें रहना अच्छा है, परन्तु विधाता कभी
दुष्टका संग न दे।’ दुष्ट-संगसे केवल दुराचारी मनुष्योंका ही संग
नहीं समझना चाहिये। इन्द्रियोंका कोई भी विषय, जो हमारे मनमें
असत् विचार तथा विषयोंकी लालसा उत्पन्न करे और
भगवत्प्राप्तिके मार्गसे हमारे चित्तको चलायमान कर दे, दुःसंग
हो सकता है। हमें न कोई ऐसी चेतन वस्तु या जड दृश्य देखना